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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

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बेघरों और अशक्तों का 'गुरुकुल'

20 सप्ताह पहले
जब मानसिक रूप से अशक्त रिंकू की देखभाल उसकी अकेली मां (सिंगल मदर) नहीं कर पाई तो वह उसे भारत के सबसे तेजी से उभरते शहर और चमकदार शीशे से लैस सैकड़ों बहुराष्ट्रीय कंपनी के ठिकाने गुरुग्राम के बाहरी क्षेत्र में स्थित बंधवाड़ी गांव के एक बेघर आश्रयगृह ले गई। जब छह माह की गर्भवती सरिता देवी को उसके पति ने ठुकरा दिया, तो उसे भी एक अदालत ने सभी के लिए खुले इसी आश्रयगृह में भेजा था।  अब दोनों के पास न केवल अपना एक घर है, बल्कि अर्थ सेवियर्स फाउंडेशन (ईएसएफ) में अपना एक नया परिवार भी है। ईएसएफ को गुरुकुल भी कहा जाता है। मानसिक रूप से कमजोर 300 लोगों समेत उनके जैसे 450 बेघर भी गुरुग्राम की चमक-धमक से दूर यहां दो एकड़ में बसे ...
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शब्दों में उतरी गंगा

28 सप्ताह पहले
दुनिया भर में नदियों के साथ संस्कृति का एक सजल पक्ष सामान्य रूप से जुड़ा है। नदियों का यह सजल पक्ष उस हस्तक्षेप का भी नाम है, जो जीवन और संस्कार को दूर तक प्रभावित करती है। लेखक-पत्रकार अमरेंद्र राय की पुस्तक ‘गंगा तीरे’ इसी हस्तक्षेप के दिलचस्प सांस्कृतिक धरातलों और विवरणों की खोज है। इस पूरी पुस्तक में राय एक ऐसे यात्री की तरह दिखते हैं, जो गंगा को उसके प्रवाह में ही नहीं, मन से लेकर परंपरा तक पर छाए उसके प्रभाव के रूप में भी देखता है। कमाल यह कि यह देखना भी बहुत प्रयासपूर्व नहीं, बल्कि स्वाभाविक मालूम पड़ता है। गंगा को भजने और गाने की परंपरा देश में नई नहीं है। जो नया है, वह है गंगा के नाम पर सांस्कृतिक पाख...
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डॉ.पाठक की संपूर्णता का व्याख्यान है ‘कुलकमल’

30 सप्ताह पहले
‘कुलकमल’ नामक मैथिली महाकाव्य संस्कृत और मैथिली साहित्य के विद्वान पंडित गंगा प्रसाद झा की सद्यः प्रकाशित कृति है। सुलभ-स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रेखांकित करता हुआ यह काव्य मिथिला, बिहार और देश की अनेक ज्वलंत समस्याओं पर हमारा ध्याना खींचता है। प्रस्तुत महाकाव्य का नायक डॉ. पाठक धीरोदात्त गुण से संपन्न हैं। इन्होंने देश में ही नहीं, विश्व में स्वच्छता का परचम लहराया है। एतदर्थ कवि ने ‘कुलकमल’ से इनकी उपमा कही है। कमल कीचड़ में खिलता है, किंतु यह स्वच्छता का प्रतीक है। डॉ. पाठक का जन्म एक कुलीन मैथिल ब्राह्मण-परिवार हुआ, किंतु वे समा...
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रामबाण वाग्यां रे होय ते जाणे

34 सप्ताह पहले
प्रथम भाग 8. चोरी और प्रायश्चित मांसाहार के समय के और उससे पहले के कुछ दोषों का वर्णन अभी रह गया है। ये दोष विवाह से पहले के अथवा उसके तुरंत बाद के हैं। अपने एक रिश्तेदार के साथ मुझे बीड़ी पीने को शौक लगा। हमारे पास पैसे नहीं थे। हम दोनों में से किसी का यह खयाल तो नहीं था कि बीड़ी पीने में कोई फायदा है, अथवा गंध में आनंद है। पर हमें लगा सिर्फ धुआं उड़ाने में ही कुछ मजा है। मेरे काकाजी को बीड़ी पीने की आदत थी। उन्हें और दूसरों को धुआं उड़ाते देखकर हमें भी बीड़ी फूंकने की इच्छा हुई। गांठ में पैसे तो थे नहीं, इसीलिए का...
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यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका

35 सप्ताह पहले
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी इस यात्रा को एक बेहतर सुअवसर में बदलते हुए कहा कि भारत, संयुक्त राज्य को अपनी ‘लुक ईस्ट, लिंक वेस्ट’ नीति का एक अभिन्न हिस्सा मानता है। पहली बार संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री ने एक डिजिटल पहल के तहत ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के साथ बातचीत की, जो अखबार में संयुक्त संपादकीय के तौर पर प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था - एक बेहतर कल के रिश्तों के पथप्रदर्शक के लिए ‘चलें साथ-साथ’। मोदी ने लिखा, ‘अमेरिका को भारत एक ‘प्राकृतिक वैश्विक भागीदार’ के रूप देखता है। दोनों देशों ने रक्षा, व्यापार, खुफिया, आतंकवाद, अफग...
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त्याग न टके रे वैराग बिना...

39 सप्ताह पहले
प्रथम भाग 3. बाल-विवाह मैं चाहता हूं कि मुझे यह प्रकरण न लिखना पड़ता। लेकिन इस कथा में मुझको ऐसे कितने कड़वे घूंट पीने पड़ेंगे। सत्य का पुजारी होने का दावा करके मैं और कुछ कर ही नहीं सकता। यह लिखते हुए मन अकुलाता है कि तेरह साल की उम्र में मेरा विवाह हुआ था। आज मेरी आंखों के सामने बारह-तेरह वर्ष के बालक मौजूद है। उन्हें देखता हूं और अपने विवाह का स्मरण करता हूं तो मुझे अपने ऊपर दया आती है और इन बालकों को मेरी स्थिति से बचने के लिए बधाई देने की इच्छा होती है। तेरहवें वर्ष में हुए अपने विवाह के समर्थन में मुझे एक भी नैति...
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बचपन का मोहन

40 सप्ताह पहले
प्रथम भाग 1. जन्म     जान पड़ता है कि गांधी-कुटुंब पहले तो पंसारी का धंधा करनेवाला था। लेकिन मेरे दादा से लेकर पिछली तीन पीढ़ियों से वह दीवानगीरी करता रहा है। ऐसा मालूम होता है कि उत्तमचंद गांधी अथवा ओता गांधी टेकवाले थे। राजनीतिक खटपट के कारण उन्हें पोरबंदर छोड़ना पड़ा और उन्होंने जूनागढ़ राज्य में आश्रय लिया था। उन्होंने नवाब साहब को बाएं हाथ से सलाम किया। किसी ने इस प्रकट अविनय का कारण पूछा, तो जवाब मिला : ‘दाहिना हाथ तो पोरबंदर को अर्पित हो चुका है।‘ ओता गांधी के एक के बाद दूसरा...
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सत्य के प्रयोग

41 सप्ताह पहले
चार या पांच वर्ष पहले निकट के साथियों के आग्रह से मैंने आत्मकथा लिखना स्वीकार किया और उस आरंभ भी कर दिया था। किंतु फुल-स्केप का एक पृष्ठ भी पूरा नहीं कर पाया था कि इतने में बंबई की ज्वाला प्रकट हुई और मेरा काम अधूरा रह गया। उसके बाद तो मैं एक के बाद एक ऐसे व्यवसायों में फंसा कि अंत में मुझे यरवडा का अपना स्थान मिला। भाई जयरामदास भी वहां थे। उन्होंने मेरे सामने अपनी यह मांग रखी कि दूसरे सब काम छोड़कर मुझे पहले अपनी आत्मकथा ही लिख डालनी चाहिए। मैंने उन्हें जवाब दिया कि मेरा अभ्यास-क्रम बन चुका है और उसके समाप्त होने तक मैं आत्मकथा का आरंभ नही कर सकूंगा। अगर मुझे अपना पूरा समय यरवडा में बिताने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो मैं जरूर आत्...
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सिद्धांत से ज्यादा संवाद पर यकीन

57 सप्ताह पहले
विज्ञान दुरूह नहीं, बल्कि खासा दिलचस्प है। हमारे दौर में इस बात को जिस शख्सियत ने अपने कार्य और विचार से सबसे प्रभावशाली तरीके से समझाया, वे थे महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग। हॉकिंग ने विज्ञान के क्षेत्र में अपने काम से दुनियाभर में करोड़ों युवाओं को विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित किया। अलबत्ता हॉकिंग ने विज्ञान की नजर से ही भगवान, पृथ्वी पर इंसानों का अंत और एलियनों के अस्तित्व पर अपनी बात पुरजोर अंदाज में रखी। यह निर्भीकता इसीलिए भी अहम है क्योंकि गैलिलियो की तरह हॉकिंग को भी इपने इन बयानों के लिए धार्मिक संस्थाओं की ओर से विरोध का सामना भी करना पड़ा था।
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बच्चे 'वरियर’ नहीं, 'वारियर’ बनें

62 सप्ताह पहले
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो फरवरी, 2016 को ‘मन की बात’ में परीक्षा और शिक्षा को लेकर कई सारी बातें कही थीं। उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि शिक्षा सीखने का नाम है और परीक्षा को लेकर खौफ बच्चों में देखा जाता है, वह अनुचित है। इसी मौके पर उन्होंने परीक्षा को लेकर कुछ लोगों के सुझाव का जिक्र किया था। उनके ही शब्दों में, ‘तमिलनाडु के मिस्टर कामत ने बहुत अच्छे दो शब्द दिए हैं। वे कहते हैं कि स्टूडेंट्स 'वरियर’ न बनें, 'वारियर’ बनें।’ अब इसी शब्द को लेकर ‘एग्जाम वारियर्स’ नाम से बच्चों के लिए उनकी पुस्तक आ गई है। यह पुस्तक ऐसे समय आई है जब परीक्षाओं का वक्त नजदीक है। बच्च...
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आधी दुनिया के सवाल

68 सप्ताह पहले
अगर हम देश की आधी आबादी, यानी महिलाओं की बात करें तो उसके सामने यक्ष प्रश्नों का भंडार है। उनके जीवन से जुड़े इन सवालों के जवाब सदियों से अनसुलझे हैं और अब भी सही समाधान की तलाश में हैं। नमिता सिंह की यह किताब महिलाओं से जुड़े ऐसे ही कुछ यक्ष प्रश्नों को दर्ज करने की कोशिश करती है। नमिता ने सवाल तो बहुत बुनियादी उठाए हैं, लेकिन जरा लचर तरीके से। उत्तर भारत की जाति पंचायतों ने महिलाओं के जीवन को और ज्यादा संकटमय बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिन पंचायतों का निर्माण समाज में न्याय की स्थापना के लिए किया गया था, वे महिलाओं के मामले में अक्सर ही बेहद अन्याय भरे निर्णय लेती हुई नजर आती हैं। नमिता बहुत सारी पंचायतों...
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​सीता से पुनर्परिचय

70 सप्ताह पहले
ईश्वर के रूपों से लेकर उनके किस्से हमारे जीवन में आज भी नैतिकता का रंग भरते हैं। इनमें राम, कृष्ण और शिव जैसे किरदार को लेकर तो भारतीय जनमानस सर्वाधिक आस्थावान है। बात करें महिला पात्रों की तो इसमें जो नाम सबसे पहले ध्यान में आता है, वह है सीता। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरित मानस की सीता को हम, राजा जनक की बेटी, भगवान राम की पत्नी और लव-कुश की मां के रूप में ही ज्यादा जानते हैं। पौराणिक कथाअों और पात्रों को आधुनिक संदर्भ में पेश करने वाले अमीश ने सीता को लेकर जो अौपन्यासिक ताना-बाना बुना है, उसमें सीता के साथ महिला सशक्तिकरण का आधुनिक पक्ष काफी बेहतर तरीके से उभरा है। धार्मिक पात्रों को एक नए, सजीव और विश्वसनीय रूप में ...


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