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बुधवार, 19 जून 2019

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थाइलैंड की लोककथा - ज्यादा चालाक कौन था?

123 सप्ताह पहले
क्ले और पिआ मंदिर में रहने वाले लड़के थे। एक दिन क्ले की मां उससे मिलने आई और उसको जेब खर्च के लिए पांच भात दे गई। क्ले ने बहुत सोचा कि उसे कहां रखा जाए। अंत में उसने उसे जमीन में गाड़ देने की सोची। उसने पैसे गाड़ दिए और उस जगह पर निशानी के लिए एक नोटिस लिख कर लगा दिया, 'यह वह जगह नहीं है जहां पांच भात गड़े हुए हैं।’ काम से निबट कर वह सैर करने निकला। इतने में पिआ उधर से निकला तो उसको नोटिस देखकर आश्चर्य हुआ। उसने जमीन खोदकर पैसे निकाले और लेकर चलता बना। लेकिन क्योंकि वह दिखाना था कि उसको भी लिखना आता है, उसने चलने के पहले क्ले के नोटिस पर जो लिखा था उसे मिटा कर लिख दिया, 'पैसे पिआ ने नहीं लिए।’ कुछ देर सैर करने के बाद क्ले को अपने भात (पैसे)की चि...
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जेसी कुमारप्पा - अनर्थ से बचाएगा गांधी का 'अर्थ’

124 सप्ताह पहले
मानवाधिकार की वकालत आजकल खूब होती है और यह वकालत घर-परिवार से लेकर शिक्षा और अर्थ के क्षेत्र में भी कई तार्किक दरकारों को अमल में लाने का दबाव पैदा कर रही है। हालांकि यह भी एक विरोधाभास ही है कि एक ऐसे दौर में जिसके लिए चरम उपभोग का परम दौर’ जैसा जुमला इस्तेमाल किया जाता है, मनुष्य के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर कई तरह की मुहिम चल रही है, संघर्ष हो रहे हैं, मानवीय गरिमा और अस्मिता की स्फीति के जघन्य आख्यान भी उसी दौर में लिखे जा रहे हैं। बात गांधी की करें तो वे स्वराज से लेकर व्यक्ति और समाज तक हर जगह मानवीय अस्मिता की बात करते थे। उनके लिए इस अस्मिता की कसौटी हर बार एक ही थी-अहिंसा और अंत...
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भिखारी का ईनाम

126 सप्ताह पहले
एक भिखारी को बाज़ार में चमड़े का एक बटुआ पड़ा मिला। उसने बटुए को खोलकर देखा। बटुए में सोने की सौ अशर्फियां थी। तभी भिखारी ने एक सौदागर को चिल्लाते हुए सुना - 'मेरा चमड़े का बटुआ खो गया है! जो कोई उसे खोजकर मुझे सौंप देगा, मैं उसे ईनाम दूंगा!’ भिखारी बहुत ईमानदार आदमी था। उसने बटुआ सौदागर को सौंपकर कहा-'ये रहा आपका बटुआ। क्या आप ईनाम देंगे?’ 'ईनाम!’ सौदागर ने अपने सिक्के गिनते हुए हिकारत से कहा -'इस बटुए में तो दो सौ अशर्फियां थीं! तुमने आधी रकम चुर...
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काबायान का शिकार

126 सप्ताह पहले
बहुत दिनों से काबायान और उसके ससुर हिरन का शिकार करनेकी सोच रहे थे। आखिर एक दोपहर काबायान ने अपने ससुर को आवाज दी-'पा, चलिए, आज हिरन के शिकार पर चलें। हम दोनों मिलकर गड्ढा खोदेंगे, मुझे उम्मीद है कि रात में उसमें हिरन जरूर फंस जाएगा। फिर हम उसे आधा-आधा बांट लेंगे।ï’ 'नहीं, तुम्हें अकेले गड्ढïा खोदना, मैं तो चिडिय़ों के लिए जाल डालूंगा,’ काबायान के ससुर ने उत्तर दिया। 'ठीक है, लेकिन याद रखिए कि अगर हिरन फंसा तो मैं उसकी एक बोटी भी नहीं दूंगा,’...
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ओम पुरी - 'अर्द्ध सत्य’ से पूर्ण सत्य तक

126 सप्ताह पहले
अपनी जानदार आवाज के लिए मशहूर 66 वर्षीय अभिनेता ओम पुरी ने कहा था, 'अभिनेता के रूप में दिया गया मेरा योगदान मेरे जाने के बाद पता चलेगा और युवा पीढ़ी खासकर फिल्मों का प्रशिक्षण लेने वाले युवा जब मेरी फिल्में देखेंगे तब उन्हें इसका अहसास होगा।’ किसी को पता नहीं था साक्षात्कार में कहे गए उनके ये शब्द अंतिम साबित होंगे और उनके शब्द इतनी जल्दी वास्तविकता में बदल जाएंगे। इस महान अभिनेता के अचानक इस दुनिया से जाने से उनके प्रशंसकों के साथ-साथ पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लोग लोग सदमे में हैं। सही मायने में ओम पुरी भारत के पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने वैश्विक ...
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न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर

127 सप्ताह पहले
कड़े फैसलों के लिए मशहूर जस्टिस तीरथ सिंह ठाकुर अपने सौम्य स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। 3 दिसंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट के 43वें मुख्य न्यायाधीश बनने वाले जस्टिस ठाकुर का जन्म 4 जनवरी 1952 को जम्मू-कश्मीर के रामबन में हुआ था। इनके पिता देवीदास ठाकुर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में जज रह चुके हैं। विरासत में कानूनी ज्ञान हासिल करने वाले टीएस ठाकुर एलएलबी करने के बाद बतौर वकील अक्टूबर, 1972 में अपने करियर की शुरुआत जम्मू कश्मीर से की। वह दीवानी, फौजदारी, टैक्स, संवैधानिक मामलों तथा नौकरी से संबंधित मामलों की वकालत जम्मू एवं कश्मीर हाईकोर्ट में करते रहे। 18 साल तक प्रैक्टिस करने के बाद 1990 में सीनियर एडवोकेट बने उसके चार साल बाद 16 फरवरी...
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अनुपम मिश्र - प्रकृति में लीन हुआ अनुपम पर्यावरणविद

129 सप्ताह पहले
मन से, वचन से, कर्म से, ध्यान से, धारणा से गांधीवादी सिद्ध और प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र 68 वर्ष की आयु में प्रोस्टेड कैंसर से जूझते हुए 19 दिसंबर को दिवंगत हो गए। रहन-सहन में, वस्त्रों तक में साधारण, निर्लिप्त, निराभिमानी। सन 1993 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब’ विश्व की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में से एक है जिसका ब्रेललिपि समेत विश्वकी प्राय: सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। हिंदी के सुख्यात कवि भवानी प्रसाद मिश्र उनके पिताश्री थे और अनुपम थे योग्य पिता के अनुपम संतान। जन्म गांधीवाद के प्रसिद्ध केंद्र सेवाग्राम, वर्धा, महाराष्ट्र में 1984 में, कर्म गांधी शांति प्रतिष्ठान में हुआ कर्मक्षेत्र भी गांधी शांति प्रतिष्ठान, आवास राजघाट के आवासीय परिसर...
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तोता पंडित

130 सप्ताह पहले
जोरावर सिंह का दिमाग एकबारगी खाली हो गया। डी.वाई.एस.पी. के रूप में यह उनका पहला छापा था और पहला ही फुस्स! शहर के बदनाम गुंडे कमाल को दबोचने आए थे। इनफार्मर-विनफार्मर, रेकी-वेकी, लाव-लश्कर हर तरह से चाक-चौबंद मगर पूरा घर फांका। पुलिस के सिपाहियों के बूटों की खट-खट और एक परिंदे की 'टें-टें’ के सिवा कुछ नहीं। 'ये कौन बोल रहा है-कमाल?’ जोरावर सिंहकी भौंहें सिकुड़ीं।’ 'कमाल तो फुर्र हो गया हुजूर,’ पड़ोस के दर्जी शुभान मियां ने कहा,'यह तो कमाल का तोता है-मिट्ठूमियां!’ 'अकेले रहता था कमाल?’ बीवी-वीबी, बच्चे-बच्चे...? 'अब हुजूर ऐसे लोगों की क्या तो बीवी और...
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महात्मा गांधी और हिंदी

133 सप्ताह पहले
भले ही गांधी हिंदी के साहित्यिक मिजाज और समाज से उस हद तक जुड़ नहीं पाए, फिर भी उन्होंने हिंदी के सिवा किसी अन्य भाषा को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के बारे में कल्पना भी नहीं की   हिंदी साहित्य सम्मेलन के कर्णधार गुट ने उन्हें इन्दौर अधिवेशन के लिए सभापति चुना था। उसके अध्यक्ष पद से बोलते हुए अपनी भावना को महात्मा गांधी छुपा नहीं पाए- 'इस मौके पर अपने दुख की भी कुछ कहानी कह दूं। हिं...


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