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मंगलवार, 25 जून 2019

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राष्ट्र और राष्ट्रपिता दोनों के विश्वासपात्र

28 सप्ताह पहले
करीब 100 साल पहले अहमदाबाद में जब महात्मा गांधी और सरदार पटेल दोनों मिले तो उम्मीद थी कि राजनीति पर गरम बहस होगी, लेकिन यहां तो धर्म-कर्म पर काफी देर तक चर्चा होती रही। पर 41 साल के बेहद सख्त मिजाज के बैरिस्टर में उस मुलाकात के बाद कुछ बेहद स्थाई बदलाव आए। गांधी के शब्द उनके कानों में तब तक गूंजते रहे, जब तक वो सत्याग्रह आंदोलन में खुद शामिल नहीं हो गए। हालांकि बेहद व्यावहारिक इंसान होने की वजह से वो अपने झुकाव के बावजूद खुलकर आंदोलन में 1917 में जाकर शामिल हुए। उसी साल चंपारण आंदोलन के बाद गांधी देश के राजनीतिक मसीहा बन चुके थे। बैरिस्टर उसके बाद गांधी के विश्वासपात्र बन गए और आगे चलकर धीरे-धीरे गांधी के दायां हाथ हो गए। जो भी ...
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चरित्र और अनुशासन

28 सप्ताह पहले
नैतिकता एक शाश्वत मूल्य है। इसकी अपेक्षा हर युग में रहती है। सतयुग में भी ऋषि-मुनि होते थे। वे धर्म और नैतिकता की चर्चा किया करते थे। रामराज्य भी इसका अपवाद नहीं था। उस समय भी धर्म के उपदेशक थे। जिस युग में धर्म और नीति के पांव लड़खड़ाने लगे हों, सांप्रदायिकता, धार्मिक असहिष्णुता, जातिवाद, छुआछूत, बेरोजगारी, कालाबाजारी, मिलावट, दहेज आदि बीमारियां सिर उठाए खड़ी हों, उस समय तो नैतिकता की आवाज उठाना और इसकी जरूरत को रेखांकित करना और अधिक जरूरी हो गया है। आज सब कुछ है- ट्रेन है, प्लेन है, कारखाने हैं, मिलें हैं, स्कूल हैं, कॉलेज हैं, भोगोपभोग की तमाम सामग्रियां हैं। पर अच्छा आदमी नहीं है। इस एक कमी के कारण सब उपलब्धियां बेकार हो रही...
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ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया

29 सप्ताह पहले
दलाई लामा मानते हैं कि राजेंद्र बाबू महात्मा बुद्ध के अवतार थे। हम ऐसा मानें न मानें पर अपने व्यवहार के चलते काफी सारे भारतीय भी उनको ‘देवता’ कहते थे। बिहार में और खासकर भोजपुरी भाषी समाज में देवता कहना आदर देने का एक तरीका भी है। अपने ज्ञान, मर्यादापूर्ण व्यवहार, अहंकार रहित आचरण, सादगी और सरलता के लिए विख्यात राजेंद्र प्रसाद सही मायनों में चंपारण सत्याग्रह की पैदाइश थे और जिस तरह पारस के संपर्क में आकर लोहा सोना बन जाता है, गांधी जी के संपर्क और दस महीने साथ काम करने के अनुभव ने राजेंद्र प्रसाद का जीवन सदा के लिए बदल दिया। राजेंद्र बाबू में सीखने-समझने और उन बातों को आचरण में उतारने की क्षमता शायद औरों से ज्यादा थी...
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टॉल्सटॉय को याद करना क्यों जरूरी?

29 सप्ताह पहले
दुनिया की अनेक बुनियादी समस्याओं के समाधान प्राप्त करने के लिए 21वीं शताब्दी में महात्मा गांधी के विचारों को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पर एक ऐसे विचारक भी थे, जिन्हें महात्मा गांधी भी अपना गुरु मानते थे और गांधी जी के जिस जीवन दर्शन को आज बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, उसे अपनाने में उन्हें इस विचारक से बहुत प्रेरणा मिली थी। ये विचारक व दार्शनिक थे लियो टॉल्सटॉय। विश्व स्तर पर उन्हें सबसे अधिक ख्याति अपने उपन्यासों ‘वार एंड पीस’ व ‘एना केरानीना’ से मिली और इसमें कोई संदेह नहीं कि ये महान साहित्यिक उपलब्धियां हैं। पर टॉल्सटॉय अपने जीवन में आगे बढ़ने पर स्वयं इन जीनियस उपलब्धियों को कम महत्व दे...
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धर्म, तरुण और जे. कृष्णमूर्ति

30 सप्ताह पहले
संस्कृति, चाहे वह पश्चिम की हो या पूर्व की हो, अब उस मुकाम पर पहुंच गई है कि या तो उसमें वास्तविकता आएगी, नहीं तो वह नहीं रहेगी। यह बात आज की सारी सांस्कृतिक संस्थाओं को समझ लेनी चाहिए। इसीलिए तरुण आज विद्रोह में उठ खड़ा हुआ है। तरुण मनुष्य के दिल में भी मुक्ति की कामना है। वह कहता है कि अब तक संस्थाओं और संगठनों (राज्य-संस्था, धर्म-संस्था आदि) ने हमारा नियंत्रण किया है। अब हम इनमें से किसी के भी नियंत्रण में नहीं रहना चाहते। धार्मिक संस्थाओं ने सबसे अधिक नियंत्रण किया है। धर्म की जितनी पकड़ मनुष्य के दिमाग पर है, उतनी और किसी की नहीं। जितने पाप धर्म करवा सकता है उतने और कोई नहीं करवा सकता। क्या मनुष्य का स्वरूप अकर्म है या...
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खुद को जानने में दिलचस्पी लें!

30 सप्ताह पहले
ज्यादातर लोगों को इस बात की जबरदस्त गलतफहमी होती है कि दूसरे लोगों को जान लेने से, समझ लेने से वे बहुत प्रभावशाली हो सकते हैं। दरअसल लोगों की सोच यह है कि अगर आप दूसरों को जान जाते हैं तो आप स्थिति को कुछ हद तक संभाल सकते हैं, नियंत्रित कर सकते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। अगर आप अभी खुद को जान लें तो आप इस दुनिया में बहुत प्रभावशाली बन सकते हैं। अगर आप कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं तो हो सकता है कि आप इसमें कामयाब हो जाएं, क्योंकि आपके पास दिमाग है और आप आकलन कर सकते हैं, किसी के बारे में कोई राय कायम कर सकते हैं, कोई निर्णय ले सकते हैं। देखा जाए तो आपकी राय या फैसलों का दूसरों से कोई लेना-देना नहीं होता है। आपकी राय सिर्फ यह बतात...
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स्वच्छ पर्यावरण की विरासत बचाने की चिंता

31 सप्ताह पहले
मैं यह लेख इंदिरा गांधी का मूल्यांकन या उनका आकलन करने की चाहत में नहीं लिख रहा। यह कोशिश उस व्यक्तित्व की नई तस्वीर को लोक के समक्ष रखने की है, जिन पर लिखा बहुतों ने पर उसे समझने की कोशिश शायद ही किसी ने की। एक नेत्री जिसे किसी ने उसके जटिल व विरोधाभासी व्यक्तित्व के लिए जाना तो किसी की निगाह में एक बेहद करिश्माई और सम्मोहक व्यक्तित्व के रूप में समाईं। कौन थीं इंदिरा? क्या थे उनके महत्वपूर्ण कार्य? यह लेख एक यात्रा है उनके इन आयामों के खोज की और उन पर प्रकाश डालने की जिसने उनके जीवन व कार्यों के मूल्यांकन करनेवालों का ध्यान कभी आकृष्ट नहीं किया। इंदिरा गांधी की संस्थागत शैक्षिक यात्रा अत्यधिक सर्पिल-पथ पर चली थी। उन्होंन...
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अपने दौर की बड़ी पर्यावरणविद

31 सप्ताह पहले
1970 के दशक की एक घटना का हवाला देना चाहूंगा जिससे मैं भी जुड़ा था। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बैंक मैनेजमेंट, बंबई (वर्तमान में मुंबई) ने 6 करोड़ रुपए की लागत से बांद्रा उपनगर के कार्टर रोड पर पथरीली समुद्र तट पर बैंकर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट स्थापित करने का निर्णय लिया। जमीन की जांच के लिए खुदाई शुरू हो चुकी थी। भवन का ढांचा ऊपर उठे हुए चबूतरे पर बनना तय हुआ, जिसमें सामुद्रिक ज्वार-भाटा के स्वच्छंद आवागमन के लिए फाटक लगाया जाना था। प्रशिक्षणार्थियों के लिए षटकोणीय छात्रावास बनाने की परियोजना बनी, ताकि समुद्र के प्राकृतिक सौंदर्य को आसानी से देख सकें। शहर के मानद शेरिफ महबूब नसरुल्लाह व ‘ब्लिट्ज’ अखबार के शक्तिशाली ...
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आबाद रहनी चाहिए किताबों की दुनिया

32 सप्ताह पहले
कुछ समय पहले गांधी जयंती पर बिहार के बेगुसराय के गोदरगावां गांव में जाने का मौका मिला था। इस गांव में एक एक अद्भुत संस्था है। इसकी कहानी यह है कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेजी सरकार ने रेल की पटरी उखाड़ने की सजा में इस गांव पर एक सामूहिक जुर्माना लगाया था। स्वतंत्रता मिलने के बाद नई सरकार ने गांव को जुर्माने की रकम वापस कर दी।   गांववालों ने उसी पैसे से यहां एक पुस्तकालय बनवाया। इसीलिए इसका नाम भी रखा ‘विप्लवी पुस्कालय’। मैं चिंतित था कि गांधी और राष्ट्रवाद जैसे विषय पर मैं ग्रामीण श्रोताओं के बीच कैसे बोलूं। लेकिन मुझे आश्चर्य यह हुआ कि इस पुस्तकालय के सभागार में सात सौ से ज्यादा लोग उपस...
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जलाने वाला नहीं, जिलाने वाला प्रेम

32 सप्ताह पहले
प्रेम शब्द से न चिढ़ो। यह हो सकता है कि तुमने जो प्रेम समझा था वह प्रेम ही नहीं था। उससे ही तुम जले बैठे हो और यह भी मैं जानता हूं कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीने लगता है। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं, उस प्रेम का तो तुम्हें अभी पता ही नहीं है। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं वह तो कभी असफल होता ही नहीं। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं उसमें अगर कोई जल जाए तो निखरकर कुंदन बन जाता है, शुद्ध स्वर्ण हो जाता है। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं उसमें जलकर कोई जलता नहीं और जीवंत हो जाता है। व्यर्थ जल जाता है, सार्थक निखर आता है। जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है- दुनिया में दो ही दुख हैं, एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम ...
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प्रकृति और गंगा

34 सप्ताह पहले
दुनिया के शक्तिशाली कहे जाने वाले देश जिस तरह दूसरे देशों के संसाधनों से आर्थिक लूट का खेल चला रहे हैं, बिगड़ते पर्यावरण के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है। महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा था कि धरती हमारे असीमित लालच और भोग का भार नहीं सह सकती है। हमें इस बारे में अब निर्णायक तरीके से सोचना ही होगा। आज संकट साझा है, पूरी धरती का है। अतः प्रयास भी सभी को साझे करने होंगे। समझना होगा कि अर्थव्यवस्था को वैश्विक करने से नहीं, बल्कि ’वसुधैव कुटुंबकम’ की पुरातन भारतीय अवधारणा को लागू करने से ही धरती और इसकी संतानों की सांसें सुरक्षित रहेंगी। यह नहीं चलने वाला कि विकसित को साफ रखने के लिए वह अपना कचरा विकासशील देशों में भेजें। निजी ...
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करुणा की गलत व्याख्या

34 सप्ताह पहले
औरतें कमजोर नहीं हैं और उन्हें कमजोर मानना भी नहीं चाहिए। उनकी स्वाभाविक करुणा और सहानुभूति की अक्सर गलत तरीके से व्याख्या की जाती है और इसे उनकी कमजोरी समझा जाता है। अगर औरत अपने भीतर की ताकत को समेट ले तो वह एक पुरुष से भी ज्यादा है। अगर हम अपनी आंतरिक शक्ति को अपने पक्ष में कर लें तो यह संसार स्वर्ग बन सकता है। युद्ध, संघर्ष और आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्यार और करुणा जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाएगा। हर युग में साहसी महिलाओं का अस्तित्व रहा है, जो क्रांति की शुरुआत करने के लिए पुरुष समाज द्वारा बनाए गए पिंजरों को तोड़कर बाहर आई हैं। भारत में ही कई साहसी महिलाएं रह चुकी हैं, जैसे- रानी पद्माव...


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