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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

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नशे से मुक्ति का सफर

107 सप्ताह पहले
यह कथा है देश की एक ऐसी दलित बेटी की जिसने आजादी के 68 वर्षों के बाद भी देश के भीतर गुलाम बनकर नारकीय जीवन जी रहे डेढ़ दर्जन से अधिक गांवों के हजारों वनवासियों को जीने का अधिकार दिलवाकर एक नया जीवन तो दिया ही, साथ ही नशाखोरी के प्रति बड़ा अभियान चलाकर हजारों लोगों को शराब के नशे से दूर कर दिया। फर्क सिर्फ इतना था कि 1947 के पहले हम अंग्रेजों और मुगल शासकों के गुलाम थे और ये ग्रामीण आजाद देश के भीतर अंग्रेजी सरकार द्वारा बनाए गए वन प्रबंधन नियमों के तहत गुलाम थे। इन्हीं गुलाम महिलाओं में एक वो भी थी, जिसका नाम भानुमती है। 38 वर्ष पूर्व मऊ जिले से ब्याह कर भानुमती सिर्फ इसीलिए लाई गई थी कि वह अपने पति और ससुराल वालों के साथ गुलामी की बेगारी प्रथा के कामों में हाथ बंटाए। शादी के...
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प्रिया हिंगोरानी - महिलाएं आत्मनिर्भर बनें, अपने दम पर जिएं

109 सप्ताह पहले
पिछले 26-27 सालों से आप इस प्रोफेशन में हैं, पुरुषों के प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र में बतौर महिला आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?इसमें कोई शक नहीं हमेशा से यह 'मैन डोमिनेडेट फील्ड रहा है।मैंने वर्ष 1990 में जब ज्वॉइन किया था, तो खुद को साबित करने के लिए हम लोगों को डबल मेहनत करनी पड़ी। तब तो कोई लेडी लॉ ऑफिसर भी नहीं थी, जज भी&...
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अंशु गुप्ता- आत्मसम्मान का खास ध्यान

111 सप्ताह पहले
गूंज’ को कई मायनों में सिर्फ  कपड़े इक्कठा कर जरूरतमंदों तक पहुंचाने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है, जबकि इसका काम बहुत ही व्यापक है। हमारा काम शहरों और गांवों में बंटा हुआ है। शहर के लोग अपने घरों से कपड़ों समेत कई उपयोग में न आने वाले सामान को 'गूंज’  में देकर जाते हैं। फिर यह 'गूंज’ की जिम्मेदारी होती है कि उसे अच्छी तरह प्रयोग में लाने और पहनने लायक बनाया जाए।  बेशक कपड़ों को आमतौर पर झुग्गियों आदि में दान के रूप में दे दिया जाता है, लेकिन 'गूंज’ का यह मानना है कि प्राप्तकर्ता का आत्म सम्मान भी बरकरार रहना चाहिए। और देखा गया है कि कई गांव वालों में इतनी गैरत होती...
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आत्मसम्मान का खास ध्यान

111 सप्ताह पहले
'गूंज’ को कई मायनों में सिर्फ  कपड़े इक्कठा कर जरूरतमंदों तक पहुंचाने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है, जबकि इसका काम बहुत ही व्यापक है। हमारा काम शहरों और गांवों में बंटा हुआ है। शहर के लोग अपने घरों से कपड़ों समेत कई उपयोग में न आने वाले सामान को 'गूंज’  में देकर जाते हैं। फिर यह 'गूंज’ की जिम्मेदारी होती है कि उसे अच्छी तरह प्रयोग में लाने और पहनने लायक बनाया जाए। बेशक कपड़ों को आमतौर पर झुग्गियों आदि में दान के रूप में दे दिया जाता है, लेकिन 'गूंज’ का यह मानना है कि प्राप्तकर्ता का आत्म सम्मान भी बरकरार रहना चाहिए। और देखा गया है कि कई गांव वालों में इतनी गैरत होती ...
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नवाजुद्दीन सिद्दिकी - गरीबों के नवाज

112 सप्ताह पहले
ओम जी जैसी हालत न हो जाए जी हां, यह है अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकी। हाल में हुई मुलाकात के दौरान उनकी यह दो टूक बातें सुनने को मिली। इन दिनों बीच-बीच में हताशा उन्हें घेरने लगती है। करिअर को लेकर भी कई सवाल उनके मन को परेशान करते हैं। कभी उन्हें ऐसा लगता है कि बॉलीवुड के मौजूदा दौर में वे अनफिट हैं। अपनी इसी मनोदशा के साथ वह वर्सोवा के अपने घर में बड़ी मुश्किल से पकड़ में आए। शाम होने को है। वह सारी रात होने वाली शूटिंग में जाने की तैयारी कर रहे हैं। काफी दिनों से वह अच्छी तरह से सो नहीं पाए थे। चिंता काम की नहीं, इस बात की है कि उनके प्रिय अभिनेता ओम पुरी अब...
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परिणति चोपड़ा - 'मनीष को मैं किसी भी वक्त डिस्टर्ब कर सकती हूं’

114 सप्ताह पहले
क्या वजह है कि हर बार मनीष शर्मा ही आपके तारणहार बनते हैं? इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनीष हमेशा मेरे लिए मददगार रहे हैं। वरना मैं यशराज में मीडिया मैनेजर की नौकरी कर रही होती। मनीष वह पहले शख्स थे,जिन्होंने अपनी फिल्म में मुझे लेने का मन बनाया था। उसके बाद भी वह बराबर मेरी मदद कर रहे हैं। अब मेरी नई फिल्म 'मेरी प्यारी बिंदु’ के वह निर्माता हैं। लेकिन आपकी इस नई फिल्म के वह सिर्फ  निर्माता है?
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अक्षय कुमार - खिलाड़ी कुमार अब होंगे संजीदा

116 सप्ताह पहले
'टॉयलेट-एक प्रेम’ क्या है यह फिल्म? आप इसके टाइटल में मत जाइए। असल में यह एक टोटल कॉमेडी फिल्म है। बस, इसकी कहानी स्वच्छता के साथ जुड़ी हुई है। फिल्म का हीरो एक टॉयलेट का मालिक है और हीरोइन एक झुग्गी-झोपड़ी की लड़की है। दोनों प्यार में पड़ते है और शादी कर लेते है। फिर दोनों एक मकसद के तहत टॉयलेट बनाने में जुट जाते है। उनके इस अभियान में उन्हें जो दिक्कतें आती है, उसमें कॉमेडी का स्टायर भरपूर है। क्या आप इसे प्रचार फिल्म मानते हैं ?
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तारा पाटकर - संस्थापक, रोटी बैंक

117 सप्ताह पहले
भुखमरी के लिए दुनियाभर में बदनाम बुंदेलखंड, 'रोटी बैक’ के जरिए न केवल लोगों की भूख मिटा रहा है, बल्कि हजारों लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत भी बन गया है। दस साथियों के साथ मिलकर इस अनोखे रोटी बैंक की शुरुआत करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता तारा पाटकर से सुलभ स्वच्छ भारत के प्रसन्न प्रांजल की बातचीत   कैसे आया आइडिया? मैंने 20 साल से ज्यादा समय तक पत्रकारिता की है। अक्सर मैं फ...
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गीतांजलि बब्बर और रितुमोनी दास - इस रिश्ते को क्या नाम दें

118 सप्ताह पहले
काम करने वाली इन सामाजिक कार्यकर्ताओं से स्फूर्ति मिश्रा की बातचीत के अंश कट्कथा की स्थापना की प्रेरणा कैसे मिली? गीतांजलि : जब मैं 2011 में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाईजेशन के लिए काम करती थी, तो मेरा जीबी रोड आना-जाना लगा रहता था। मैं यहां काम करने वाली औरतों से परिवार नियोजन, गर्भ निरोधक से जुड़े सवाल पूछती थी। लेकिन मुझे यह बातें पूछना अच्छा नहीं लगता था, क्योंकि न वो औरतें मुझे जानती थीं और न मैंï उन्हें? इसीलिए इतने निजी प्रश्न पूछना अजीब लगता था, लेकिन यही मेरा काम था, इसीलिए करना पड़ता था। एक दिन उनमें से एक ने मुझ...
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डॉ. विन्देश्वर पाठक - ‘पेश करेंगे स्वच्छता की मिसाल’

120 सप्ताह पहले
आप अपनी इस नई जिम्मेदारी को किस रूप में देखते हैं? जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। एंबेसडर का मतलब होता है दूत। यह पद बहुत बड़ी जिम्मेदारी का अहसास कराता है। हम पूरी लगन के साथ काम करेंगे। प्रधानमंत्री जी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिए हर संभव कोशिश करेंगे। रेल मंत्री महोदय ने हम पर जो भरोसा दिखाया है उस पर खरे उतरेंगे। स्वच्छता की मिसाल पेश कर हम उनके नाम को आगे बढ़ाएंगे। हम स्टेशनों को इतना साफ-सुथरा कर देंगे कि गंदगी फैलाने से पहले लोगों के मन में यह ख्याल आएगा कि गंदगी फैलाएंगे तो प्रभु जी देख लेंगे। रेलवे की सफाई कितनी बड़ी चुनौती है? रेलवे देश की लाइफलाइन है। देश में 8 हजार से ज्यादा छोटे-बड़े रेलवे स...
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प्रह्लाद सिंह पटेल, मोदी सरकार आने के बाद विकास की रफ्तार तेज हुई

121 सप्ताह पहले
आप अपने इलाके की सबसे बड़ी समस्या किसे मानते हैं?  जहां तक हमलोगों को मालूम है कि पेड़ों की कटाई यहां की मुख्य समस्या है,इससे बाढ़ और पेयजल की समस्या जटिल है।  नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। मेरे हिसाब से तो जंगल के कारण ही समस्याएं थीं। ज्यादा जंगल होने से विकास रुका पड़ा था। केंद्र में एनडीए की सरकार आने के बाद गति पकड़ी है। यहां भूमिगत जल नहीं है, नदियां बड़ी-बड़ी हैं, लेकिन जल का स्रोत नहीं बन पाईं। मुझे लगता है कि दो-तीन बातें ध्यान रखनी चाहिए, सूखा सिर्फ हमारी गलती के कारण नही है, कहीं न कहीं प्रबंधन में दोष है। पानी नहीं है, ऐसा मैं नहीं मानता। बुंदेलखंड के पिछले 100 वर...
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विजय चड्ढ़ा, सीईओ, भारती फाउंडेशन

125 सप्ताह पहले
आपके मन में कैसे यह विचार आया कि लुधियाना जिले के प्रत्येक गांव के हर घर में शौचालय हो? कैसे आपने 'सत्य भारती अभियान’ की शुरुआत की? भारत के माननीय प्रधानमंत्री के आह्वान के प्रति निष्ठा और जवाबदेही के रूप में 'सत्य भारती अभियान’ की शुरुआत हुई। इस अभियान का मूल उद्देश्य लुधियाना के गांवों में स्वच्छता की सुविधाओं में सुधार लाना है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लुधियाना जिले में शौचालय की उपलब्धता के मामले में शहर और गांव के बीच 13 प्रतिशत का फासला है। ग्रामीण घरों में स्वच्छता की सुविधाओं की कमी न सिर्फ महिलाओं के लिए आक्रोश का एक बड़ा कारण है, बल्कि ...


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