sulabh swatchh bharat

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

ममता की छांव में शिक्षा के फूल

दिन भी कूड़ा बीनने और गली-गली चक्कर काटने वाले बच्चों को जब ममता की छांव मिली तो उनके सपनों में नए रंग भर गए

64 साल की उम्र में जया बत्रा ने समाज सेवा का ऐसा संकल्प लिया है जिसे देख आस-पास के लोग चकित हैं। बत्रा कहती हैं कि उनकी जिंदगी के बचे सारे दिन उन झुग्गी झोपड़ी के बच्चे-बच्चियों को समर्पित हैं, जिसे शायद हमारे समाज ने मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा है। वे पार्क  में बच्चों को पढ़ाती ही नहीं हैं, बल्कि इस बात से चिंतित रहती हैं कि कहीं उन बच्चों को समाज में खुद को हीन भावना से ग्रसित न होना पड़े। इसे दूर करने के लिए वे अपने कुछ मित्रों और परिचितों की आर्थिक  मदद से पूरा करने की कोशिश करती है। दिल्ली से सटे इंदिरापुरम के अवंतीबाई पार्क उर्फ हाथी पार्क उनकी कर्मस्थली के रूप में इन दिनों लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए उन्होंने एक  फाउंडेशन की नींव भी रखी है, जिसका नाम है-‘जया प्रयास हेल्प फाउंडेशन’।

64 साल की यह महिला झुग्गी झोपड़ी और कूड़ा बीनने वाले बच्चों को विटामिन युक्त दूध पिलाकर शिक्षा का अलख जगा रही हैं। उनकी कोशिश है कि वे बच्चे, जिनके माता पिता झुग्गी-झोपड़ी में रहकर जीवन-यापन करते हैं या वे बच्चे जो सुबह से शाम तक कूड़ा बीनने को अपना भाग्य समझते हैं, उन्हें देश के बड़े लोगों के बच्चों की तरह सभी मूलभूत सुविधाएं मिले, वे भी पढ़े-लिख कर एक  सभ्य नागरिक  बनें और घर परिवार और देश दुनिया का नाम रोशन करें। देश की राजधानी दिल्ली से सटे इंदिरापुरम का यह हाथी पार्क का खुला मैदान इन दिनों इस प्रकार के बच्चों के लिए अच्छे स्कूल की शक्ल अख्तियार कर चुका है। इन छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों को शिक्षा के साथ-साथ खेलकूद के वे तमाम उपकरण दिलाने के लिए जया प्रयासरत हैं, जो शायद इन बच्चों को शायद ही कभी नसीब हो पाते। गुरुकुल की तरह पेड़ों की छांव में जया इन बच्चों से ऐसे घुली मिली हैं, जैसे उनके पास इन बच्चों के भविष्य संवारने के सिवा और कुछ नहीं है।

रविवार सुबह इस भीड़-भाड़ वाले पार्क  में जहां अन्य दिनों की तरह लोग सैर करने आते हैं, तभी जया बच्चों की भीड़ के बीच हाथ में गर्म दूध से भरी बाल्टी और स्टील का ग्लास लेकर यह पूछती दिखती हैं कि सभी बच्चे को दूध और प्रोटीनेक्स मिल गया न? कोई बच्चा दूध लेने और पीने से छूटे नहीं और किसी का आपस में झगड़ा नहीं हो इसका भी वे बारीकी से ध्यान रखती हैं। वह बच्चों को पोलियो का ड्राप दिया गया या नहीं इसकी जानकारी भर नहीं रखती, बल्कि पोलियो दवा पिलाने वाले को पार्क में लाकर बच्चों को दवा भी पिलाती हैं। बत्रा पार्क में घूम फिर कर उनके पास से देखने आए किसी को भी आगे बढ़कर कुछ बताने में वे दिलचस्पी नहीं लेतीं, बल्कि जब उन्हें इस बात के लिए कुरेदा जाता है कि वे इस उम्र में इतना बड़ा काम किस लिए कर रही हैं तो वे तीन साल का हिसाब-किताब देकर ही चुप हो जाती हैं। इस संवाददाता ने भी जब बत्रा को कुरेदने की कोशिश की तो पहले तो हिचकिचाई और बाद में पुख्ता होने के बाद कहा कि दिल्ली के दिलशाद गार्डन के ग्रीन फील्ड स्कूल में 30-35 साल की शैक्षिक सेवा के दौरान उन्हें एक ही चीज सालती रही कि आखिर शिक्षा के मामले में बच्चों में भेदभाव क्यों? कोई बच्चा एयरकंडीशन बस से स्कूल जा रहा है। खेलने के लिए जूडो कराटे, टेबल टेनिस, फुटबाल, स्केटिंग के साथ अन्य तमाम योग के अलावा रस्साकसी, रिले रेस, कुर्सी रेस, बोरा रेस और संगीत में व्यस्त रहता है तो उन्हीं उम्र के सैकड़ों बच्चे झुग्गी-झोपड़ी से निकलकर कूड़ा बीनने और मजदूरी करने को अभिशप्त हैं। पढ़ाई क्या होती है और पढ़ाई के क्या साधन हो सकते हैं, जिससे उनका भविष्य भी संवरे इसे सोचने और समझने के लिए शायद उनके पास न तो समय होता है और न ही कोई समय पर समझाने वाला। बत्रा कहती हैं कि मेरे पति एक बड़े मीडिया हाउस में काम करते थे। कभी-कभार फुरसत के क्षण में वे कहते थे कि समाजसेवा भी हमारे जीवन का एक  हिस्सा है। तब यह बात समझ में ज्यादा नहीं आती थी। कारण उस समय मेरे भी दो बच्चे थे। एक बेटा नमन बत्रा और बेटी अन्नपूर्णा बत्रा। पर जैसे ही पति का असमय निधन हुआ और बेटा और बेटी को पढ़ाने का जिम्मा मेरे ऊपर आया तब लगा कि वे (पति) सही कहते थे। बेटा नमन और बेटी अन्नपूर्णा को अच्छी शिक्षा दिलाने के बाद जब होटल मैनेजमेंट में नौकरी मिली तो वह खुद को बिल्कुल अकेला महसूस करने लगीं। फिर पति की बात याद आई और तब तय किया कि अब जीवन के जो बचे समय हैं वह इन बच्चों को सौंप दिया जाए। मेरे दोनों बच्चे पांच सितारा होटलों में अच्छे पदों पर हैं।

बत्रा कहती हैं कि इस समय मुझे किसी भी चीज की कमी नहीं है जिसके लिए कोई काम किया जाए लिहाजा मैंने घर के पास बने इस पार्क के आसपास लावारिस हालत में घूमते हुए बच्चों को जमाकर इन्हें पढ़ाने और इन बच्चों के भविष्य को संवारने की चुनौती को स्वीकार किया। ये बच्चे कभी कूड़ा बीनते थे। आज अच्छे कपड़े और जूते पहनकर शाम में ट्यूशन के लिए दूसरे शिक्षकों के पास हमारे सहयोग से जा रहे हैं। कुछ बच्चों ने यहां से निकलकर पब्लिक स्कूल में दाखिला लिया है। कुछ बड़ी क्लास में हैं और उनका सारा खर्चा हम लोग अपने स्तर से उठाते हैं। शुरू-शुरू में दिक्कतें आई पर जैसे-जैसे क्लास शुरू हुई मदद के लिए कई लोग आगे आ गए और अभी भी आ रहे हैं।  कई लोगों ने आर्थिक मदद भी की है। बच्चों को पढ़ाने के लिए कई पढ़ी लिखी महिलाएं अवैतनिक साथ दे रही हैं। इनमें देवयानी चक्रवर्ती, मंजू सिंह और अनिता वत्स शामिल हैं। अनिता के पति जेएन वत्स भी मदद कर रहे हैं। जेएन वत्स एक  नेशनल इंश्योरेंस कंपनी में चीफ मैनेजर से रिटायर हैं। गेडस वाइस क्लब के अध्यक्ष उमेश गुप्ता, समाजसेवा को तत्पर प्रमोद जोशी, योग शिक्षक स्वाति और इंदिरापुरम एटीएस हाउसिंग सोसाइटी सीनियर सीटिजन क्लब ने जाड़े के नए ब्रांडेड कपड़े, स्पोटर्स जूते, दूध पिलाने और मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल में बच्चों को फिल्म दिखाने, पांच सितारा होटल में खाना खिलाने के लिए आर्थिक मदद की है। इसके अलावा कुछ लोगों ने बच्चों को एडाप्ट कर उसकी पढ़ाई के तमाम खर्चे देने का वायदा भी किया है।

24 घंटे इन बच्चों के ही बारे में सोचने वाली बत्रा कहती हैं कि इन बच्चों को कोर्स की पढ़ाई के साथ चंदन और गजेंद्र स्केटिंग सिखाते हैं। उमेश गुप्ता जूडो-कराटे सहित अन्य खेलकूद के उपकरण, तो स्वाति ने योग के लिए ड्रेस उपलब्ध कराए हैं। शाम में बच्चे को ट्यूशन पढऩे और फिर उनके स्कूली ड्रेस, भोजन और विटामिन की व्यवस्था में ही दिन रात लगी रहने वाली बत्रा के प्रयास से इन बच्चों को दो बार पांच सितारा होटलों में भोजन करने और अन्य बड़े सांस्कृतिक  कार्यक्रम में शिरकत करने का मौका मिल चुका है।



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो