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रविवार, 23 सितंबर 2018

आवाम की सेवा में सेना

सेना का काम सीमाओं की रक्षा करना है, लेकिन वह देश की सीमा के भीतर राष्ट्र और समाज के कल्याण के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यों को अंजाम देती है। कानून-व्यवस्था बहाल करने से लेकर राहत-बचाव कार्य में नागरिक प्रशासन की मदद करती है। यही नहीं, वह जम्मू-कश्मीर जैसे अशांत इलाकों में लोक कल्याण के बहुत से कार्य कर रही है। नोटबंदी में मोदी सरकार की मदद के परिप्रेक्ष्य में सेना की इस भूमिका पर यह रिपोर्ट-

जब 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा के साथ ही देश में हर खासोआम के पास नकदी की कमी हो गई। पुराने नोट बदले जाने थे, और नए नोट पाने भी थे। बैंकों और एटीएम केंद्रों पर लंबी-लंबी कतारें लग गईं। नोटबंदी की इस घोषणा से पैदा हुई परेशानी के कारण सरकार भी दबाव में थी। लेकिन इस मौके पर सेना ऐसे किसी विवाद से दूर अपना काम चुपचाप कर रही थी। यह सब भारतीय सेना की परंपरा के अनुरूप था, क्योंकि भारतीय सेना राजनीतिक दांव पेंच से दूर ही रहती है।

नए नोट छापने की सरकार की अपनी सीमाएं थीं, क्योंकि नोट छपाई करने वाली मशीनें रातों-रात बाजार से बाहर हुई मुद्रा के बराबर राशि की भरपाई नहीं कर सकती थीं। लेकिन चुनौती यही नहीं थी, चुनौती यह भी थी कि उन्हें जल्दी से देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाया जाए। जाहिर है कि अन्य माध्यमों से नोट पहुंचाने में विलंब होता और शायद वह उतना व्यवस्थित भी नहीं होता। सरकार को पहले से ही इसका अहसास था। इसीलिए उसने इस कार्य में सेना को लगाया, ताकि जल्दी से देश के विभिन्न हिस्सों में नोट पहुंचाए जा सके। वायु सेना भी कहां पीछे रहने वाली थी, मानो तत्परता तो उसका ध्येय वाक्य हो। वायु सेना ने न केवल हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल किया, बल्कि परिवहन विमानों-एएन-32 और सी-17 विमान को भी इस कार्य में दिन-रात लगा दिया। विमान बड़े-बड़े शहरों के लिए उपयुक्त थे, तो हेलीकॉप्टर छोटे-छोटे या दूरदराज के शहरों के लिए। सेवानिवृत्त होने से पहले वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल अरुप राहा ने दिसंबर के अंत में बताया था कि उस समय तक वायु सेना 35 उड़ान भर चुकी थी। यानी उड़ानों की संख्या इससे ऊपर जा सकती है। इस प्रक्रिया में वायुसेना अब तक 610 टन नोटों की ढुलाई कर चुकी है। वायु सेना ने नोटों की ढुलाई में सिविल प्रशासन की मदद की, तो थल सेना ने भी अपनी सेवा दी। नोटों की जहां पर छपाई हो रही थी, वहां पर सेना के जवानों को तैनात किया गया। आखिर करेंसी नोट छापने वाली इकाइयों और नोटों की सुरक्षा की जरूरत थी। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं थी। सेना के जवानों ने एक ईकाई में नोट छापने में भी हाथ बंटाया। ध्यान देने की बात है कि नए नोटों की जरूरत को पूरा करने के लिए एक से अधिक पाली में छपाई का काम चल रहा था। इस तरह सेना ने राष्ट्र और जनता की सेवा की मिसाल एक बार फिर पेश की। 

सेना को बुलाओ

समझा जा सकता है कि सरकार का सेना पर कितना विश्वास है। यह सब अकस्मात नहीं है। अगर कहीं कानून-व्यवस्था की समस्या हो या प्राकृतिक आपदा, संकट की हर घड़ी में सेना सिविल प्रशासन की मदद के लिए तैयार रहती है। ज्यादा दिन नहीं गुजरे, जब हरियाणा में राज्य प्रशासन की मदद के लिए सेना को बुलाया गया। आरक्षण के लिए जाट समुदाय द्वारा चलाए जाने वाले आंदोलन के कारण पूरे प्रदेश में अफरा-तफरी मच गई थी। सेना के आने पर शांति-व्यवस्था बहाल हुई और लोगों ने राहत की सांस ली। इसी तरह जब प्राकृतिक आपदा सिविल प्रशासन के नियंत्रण के बाहर हो जाती है, तब सेना को ही याद किया जाता है। जून, 2013 में उत्तराखंड आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्य में सेना की भूमिका को कौन भूल सकता है। सेना के जवानों ने जान हथेली पर रख कर राहत-बचाव कार्य को अंजाम दिया। जवान ही नहीं, सेना के बड़े अधिकारी भी व्यक्तिगत रूप से इस पर नजर रख रहे थे। अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर सेना ने एक लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया।

देश की सीमा के भीतर ही नहीं, देश की सीमाओं के बाहर भी प्राकृतिक आपदा आने पर सेना अपना कौशल बखूबी दिखाती है। 2015 में नेपाल में भूकंप आने पर भारतीय सेना ने 'आपरेशन मैत्री' के तहत वहां राहत-बचाव का कार्य किया। सेना की दो इकाइयों-थल सेना और वायु सेना-ने इसमें हिस्सा लिया। थल सेना ने चिकित्सकों की 18 टीम, इंजीनियरों के पांच कार्य बल और पांच हेलीकॉप्टर भेजे। घायलों के इलाज से लेकर रास्तों की साफ-सफाई करने, मलबा हटाने और शिविर बनाने तक का काम सेना के जवानों ने किया। मलबे में फंसे लोगों को निकालने और उन्हें अस्पताल पहुंचाने जैसे राहत कार्यों के लिए थल सेना के हेलीकॉप्टरों ने 546 उड़ानें भरी। इसी तरह भारतीय वायु सेना ने 1636 उड़ानें भरी। किसी विदेशी धरती पर वायु सेना का यह अब तक का सबसे बड़ा राहत अभियान था। इस प्रकार सेना ने मानवीय मूल्य की रक्षा तो की ही, दो देशों के बीच मित्रतापूर्ण रिश्तों को और मजबूत बनाने का काम किया।

दिल और दिमाग जीतो

बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा बदल चुकी है। सेना भी उसे नकार नहीं सकती, खासकर सीमा पार आतंकवाद के कारण। यह आतंकवाद मूलत: छद्म युद्ध है। ऐसी परिस्थिति का मुकाबला केवल हथियारों के जरिए नहीं किया जा सकता, सामाजिक धरातल पर भी पहल करनी पड़ती है। मकसद यह होता है कि आतंकवाद या उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में ऐसे कल्याण कार्य किए जाएं कि देश और संविधान के प्रति जनता की आस्था पैदा हो। स्वाभाविक है कि सेना को इससे स्थानीय परिस्थितियों से निपटने में मदद मिलती है, क्योंकि स्थानीय निवासियों में सेना के प्रति सदभाव और विश्वास रहता है। इसी के मद्देनजर जब नब्बे के दशक में कश्मीर घाटी में आतंकवाद और उत्तर पूर्व में उग्रवाद बढ़ा, तो सेना ने जनता का दिलो-दिमाग जीतने के लिए 'ऑपरेशन सदभावÓ चलाया। इसके तहत शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, सामुदायिक विकास, आधारभूत ढांचे का निर्माण, स्वास्थ्य, गुर्जर एवं बक्करवाल समुदाय का विकास, जलापूर्ति, विद्युतीकरण, पशुपालन जैसे कार्यक्रम चलाए हैं। भारत सरकार ने इस मद में 2015-16 के लिए 54.40 करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान भी किया था।

सेना के इन प्रयासों का असर जमीन पर दिखना लाजिमी है। इससे सबसे ज्यादा फायदा जम्मू-कश्मीर के युवाओं और महिलाओं को मिला। कारण यह है कि सद्भावना के तहत अब तक एक लाख से ज्यादा बच्चों को सेना द्वारा संचालित स्कूलों में शिक्षा दी जा चुकी है। अभी राज्य में करीब 14,000 छात्र सेना के स्कूलों में पढ़ रहे हैं। यही नहीं, राज्य से बाहर पढ़ रहे 1000 से ज्यादा छात्रों को सेना छात्रवृत्ति भी दे रही है। पिछले तीन वर्षों में सेना ने करीब 3.68 लाख लोगों को चिकित्सा सहायता प्रदान की है। 4.57 लाख से ज्यादा पशुओं का भी इलाज किया है। राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान करने के लिए सेना ने 200 से भी ज्यादा ऐसे भ्रमण कार्यक्रमों का आयोजन किया है, जिससे वहां के युवा और बुजुर्ग देश के दूसरे हिस्सों के लोगों के साथ संवाद और संपर्क कायम कर सकें।

यह राष्ट्र को भावनात्मक एकता के सूत्र में जोडऩे और अलगाव की भावना को खत्म करने की दृष्टि से अहम है। युवाओं और महिलाओं के कौशल विकास के लिए भी सेना प्रयासरत है। इस लिहाज से सेना राज्य भर में कई व्यावसायिक प्रशिक्षण और महिला सशक्तिकरण केंद्रों को चला रही है।

सेना के इन सद्भावना पूर्ण कार्यों का मूल्यांकन

करने के लिए जरूरी है, यह देखना कि इसमें कितने लोग शामिल होते हैं और इससे कितने लोग फायदा उठाते हैं। दोनों ही मानकों पर इसकी लोकप्रियता और सफलता का अंदाजा लगाया जा सकता है। आंकड़े सदï्भावना के पक्ष में बोलते हैं।

सीमा प्रबंधन के इस मानवीय तरीके से स्थानीय जनता को तो लाभ मिल रहा है, वहीं घाटी में

शांति बहाली में भी यह कारगर है।



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