sulabh swatchh bharat

बुधवार, 19 सितंबर 2018

स्वच्छता का समाजशास्त्र

उत्कल विश्वविद्यालय, ओडिशा के समाजशास्त्र विभाग द्वारा स्वच्छता का समाजशास्त्र विषय पर आयोजित कार्यशाला में डॉ. विन्देश्वर पाठक हुए सम्मानित

स्वच्छता को अब समाजशास्त्र के एक विषय के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि स्वच्छता से जुड़ी सामाजिक अभाव, सफाई, पारिस्थितकी, पानी, सार्वजनिक स्वास्थ्य, लैंगिक समानता आदि जैसी मुख्य समस्याएं एक समाजशास्त्रीय हस्तक्षेप की मांग करती हैं। इस तरह का हस्तक्षेप हमारे समाज की संस्कृति और ज्ञान पर आधारित होना चाहिए।’ ये बातें डॉ. विन्देश्वर पाठक ने उत्कल विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के शिक्षकों और छात्रों को संबोधित करने के दौरान कहीं। विश्वद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने 11 जनवरी को 'स्वच्छता का समाजशास्त्र’ विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया था। विभाग

की तरफ से समाजशास्त्र और समाजशास्त्रीय दर्शन में एमए तथा पीएचडी की पढ़ाई कराई जाती है।  

इस मौके पर आगे अपनी बात रखते हुए डॉ. पाठक ने कहा, 'मैं एक प्रशिक्षण प्राप्त समाजशास्त्री हूं। 1985 में मैंने क्रियात्मक समाजशास्त्र की अवधारणा का प्रस्ताव रखते हुए इस शास्त्रीय अनुशासन को एक नया दृष्टिकोण दिया। इस अवधारणा के पीछे विचार यह था कि समजशास्त्रियों को महज सामाजिक रचना, संस्कृति, धर्म, मूल्यों आदि का ही अध्ययन नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें ज्वलंत सामाजिक समस्याओं के समाधान को लेकर भी सक्रिय होना चाहिए। मेरा मानना है कि समाजशास्त्र के विद्वानों और छात्रों को समाज की प्रकृति और उसके व्यवहार के अध्ययन के अलावा समाज के साथ सीधे जुडऩा भी चाहिए। उन्हें लोगों के लिए काम करना चाहिए और उनकी समस्याओं के समाधान में मदद करनी चाहिए।’

उन्होंने इस विषय पर अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा, 'इस तरह सोचते हुए 2013 में मैंने 'स्वच्छता का समाजशास्त्र’ विषय का प्रतिपादन तक पहुंचा। इसके तहत हम स्वच्छता, अभाव, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई, लैंगिक समानता, स्थायी विकास के लिए जन जागरुकता जैसे सामाजिक मुद्दों के समाधान के साथ दार्शनिक व आध्यात्मिक ज्ञान के जरिए स्वस्थ और खुशहाल जीवन रचना का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन कर सकते हैं। मेरी इस पहल का सैकड़ों समाजशास्त्रियों ने 2013 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में स्वागत किया था। क्रियात्मक समाजशास्त्र की व्यापक समझ के साथ 1985 में मैंने जो 'स्वच्छता का समाजशास्त्र’ का जो विचार दिया, वह आज बौद्धिक संवाद के साथ आगे बढ़ रहा है। आज 'स्वच्छता का समाजशास्त्र’ विषय को देशभर के समाजशास्त्रियों से मान्यता मिल रही है और यह महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी भावनगर विश्वविद्यालय, भावनगर (गुजरात), ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा (बिहार) और मंगलौर विश्वविद्यालय, मंगलौर (कर्नाटक) के समाजशास्त्र विभागों में पढ़ाया जा रहा है।’  

इस मौके पर डॉ. पाठक ने उत्कल विश्वविद्यालय के कुलपित प्रो. पी. दास, विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. नवनीता रथ के अलावा कायर्शाला के आयोजन से जुड़े सभी विभागीय शिक्षकों का इस बात के लिए आभार जताया कि उन्होंने एक ऐसे विषय पर बोलने के लिए उन्हें आमंत्रित किया, जो उनके जीवन और सुलभ



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो