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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

गली की कला गैलरी की मोहताज नहीं

कभी स्ट्रीट आर्ट को पश्चिमी अवधारणा माना जाता था, लेकिन समय के साथ इसने भारतीय समाज में भी अपनी जगह बना ली है। दिल्ली जैसे शहरों में घरों की दीवारों पर बनाए गए भित्ति-चित्र इसके प्रमाण हैं। खास बात यह कि लोग इसे पसंद कर रहे हैं

नीले आकाश के नीचे बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं और सुपरमैन अपने नीले रंग की विशिष्ट पोशाक में उन बच्चों के पीछे दिखाया गया है, मानो सुपरहीरो क्षेत्ररक्षण कर रहा हो। यह आप दिल्ली की एक दीवार पर चित्रित देख सकते हैं। यह तो अभी शुरुआत है। पहलवान, फरिश्ते, सुपरमैन जैसे चरित्रों में ऐसा रंग भरा गया है, जो लोगों को अतीत की यादों में खो जाने को मजबूर कर देता है। दक्षिणी दिल्ली के हरे-भरे नेब सराय इलाके की दीवार पर रुचिन सोनी द्वारा उकेरे गए भित्ति चित्रों में ऐसे विचारों को व्यक्त किया गया है, जो उसके आसपास से गुजरने वाले बच्चों और लोगों का ध्यान आकृष्ट करने में सक्षम हैं।

वडोदरा के प्रशिक्षित भित्ति चित्रकार रुचिन सोनी कहते हैं,'जब मैं चित्रकारी करता हूं, रंग खुद-ब-खुद ही आ जाते हैं और बच्चे इसे बहुत उत्सुकता से देखते हैं।’ इसका मूल उद्देश्य बच्चों में एक नई उर्जा का संचार करना है, उन्हें अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित करना है।’

'दुनिया मेरा कैनवास है’ यह दुनिया में कहीं भी स्ट्रीट कलाकारों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली उपयुक्त कहावत है। ब्राजील एवं दूसरे देशों के स्ट्रीट आर्ट में विद्र्रोह का तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो वहां की सामाजिक एवं राजनीतिक विसंगतियों पर सवाल खड़े करते प्रतीत होते हैं। लेकिन भारत में स्ट्रीट कला के पीछे विद्रोह का भाव नहीं है। भारत में स्ट्रीट आर्ट का उद्देश्य सड़क पर चलने वाले आम लोगों के साथ संवाद स्थापित करना भर है।

लोक के लिए कला

'स्ट्रीट आर्ट इंडिया फाउंडेशन’ की स्थापना मुनाफा कमाने के लिए नहीं की गई है, बल्कि इसके पीछे एक विचार है। यह कला कला के लिए है, न

कि बाज़ार के लिए। इसका मकसद कला को

पारंपरिक कला दीर्घाओं से बाहर निकालकर

आम लोगों के लिए उपलब्ध कराना है, क्योंकि पारंपरिक कला दीर्घाओं में लगाई जाने वाली चित्र प्रदर्शनियां उनकी पहुंच से बाहर होती हैं। सड़क किनारे सार्वजनिक

दीवारों पर बनाए गए चित्रों पर कोई रोक-टोक नहीं होती है, उन्हें कोई भी देख सकता है। 

रुचिन अपनी कला को जीते हैं, उनके लिए यह कमाई का जरिया नहीं है, तभी तो वे कहते हैं, 'स्ट्रीट आर्ट हमारे लिए बहुत कुछ है। इस माध्यम में हमें व्यापक पैमाने पर आजादी मिलती है। इसे बनाने के लिए हमें किसी सामान की जरूरत नहीं पड़ती। फिर इसके बाद उसे बेचने का झंझट भी नहीं रहता। मैं जो करना चाहता हूं, उसे करने की हमें आजादी है। यह भारत में एक नया विचार है। बहुत-से लोग स्ट्रीट आर्ट में अपनी तरह से लगे हुए हैं, लेकिन अब इसने एक नई दिशा अपना ली है। इसने ऐसे बहुत-से कलाकारों को एक-दूसरे के करीब ला दिया है।’ रुचिन महज कलाकार ही नहीं हैं, उनमें समाज सेवा का भाव भी है। रुचिन ने रात्रि विश्रामगृहों के क्षेत्र में काफी काम किया है। उनकी नज़र में गरीबों के पास भी अपना एक घर होना चाहिए, ताकि उन्हें अहसास हो कि उनके पास भी अपना घर है।

कला के जरिए भाईचारा

बेंगलुरु के उभरते कलाकार रुत्विज परांजपे भाईचारे की भावना को प्रकट करने के लिए कहीं और नहीं जाते, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से ही विषय चुनते हैं। परांजपे कहते हैं, 'चित्रों के जरिए मैं सह-अस्तित्व का उत्सव मनाता हूं। विभिन्न शहरों और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोग अपने मतभेदों को दरकिनार कर सीमित समय के लिए ही सही, एक साथ मेट्रो में यात्रा करते हैं। ये छोटी-छोटी बातें सामाजिक भाईचारे के लिए बहुत अहम होती हैं।’

बेंगलुरु में मेट्रो स्टेशन के पास एक घर की दीवार पर चमकता चांद अनायास अपनी ओर लोगों का ध्यान खींचता है। मेट्रो के निकट होने के कारण यह कुछ ज्यादा ही आकर्षित करता है। चांद का चित्र बनाने के पीछे अन्पू वर्के का मकसद आकाश में एक विशाल पदार्थ को स्थापित करना है, जिससे लोग सहज भाव से जुड़ सकें। अन्पू महसूस करते हैं, 'एक ऐसे युग में जब प्रत्येक व्यक्ति सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क में रहना चाहते हैं, हम लोग चंद्रमा को भूल जाते हैं, जिसे हम लोग शायद ही देखते हैं।’ 

अन्पू एक चित्रकार और स्ट्रीट कलाकर हैं। अन्पू की सर्वाधिक लोकप्रिय कृतियों में एक महात्मा गांधी का विशालकाय भित्तिचित्र है, जो दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर हर समय अपनी उपस्थिति की अहसास कराता रहता है। इसके निर्माण में अन्पू ने जर्मन कलाकार हेंडिक बेइर्किच की मदद की थी। इसका निर्माण 2014 में स्ट्रीट आर्ट इंडिया फाउंडेशन के लिए किया गया था। खास बात यह कि यह पांच दिन में ही तैयार हो गया था। यह उस विशाल समूह को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जो फेसबुक या इंस्टाग्राम से नहीं जुड़े हैं, लेकिन इस विचारधारा को जीते हैं। संभव है ऐसे लोग कम से कम व्यक्तिगत स्तर पर ही शब्दों के जरिए इस विचार का प्रचार-प्रसार करेंगे।

एसटी स्ट्रीट आर्ट इंडिया का प्रयास व्यस्त शहरों में कला को अभिनव तरीके से जन-जन तक पहुंचाना है। पिछले तीन-चार वर्षों में राजधानी दिल्ली में स्ट्रीट कला के प्रति आकर्षण बढ़ा है। शुरू में यह खिड़की एक्सटेंशन, हौज खास और शाहपुर जट तक सीमित था, लेकिन अब यह पूरे शहर में विस्तार पा चुका है। वहां की दीवारों पर अन्पू वर्के, यंत्र जैसे कलाकारों की कला के निशान देखे जा सकते हैं। 



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