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बुधवार, 19 सितंबर 2018

ग्रामीण भारत की सुध जरूरी

भारतीय मीडिया का ग्रामीण भारत को लेकर एक कठोर और असंवेदनशील रवैया है। दरकार इस बात की है कि ग्रामीण खबरों को ज्यादा तवज्जो और स्पेस दिया जाए

कहने के लिए भारत जरूर आज भी गांवों में बसता है, पर देश अपने गांवों को शायद ही उतना प्यार करता है। करीब 90 करोड़ लोग आज भी गांवों में रहते हैं पर उनकी जिंदगी उस शहरी जिंदगी से काफी अलग और दयनीय है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के सबसे बड़े स्पेस पर काबिज है। इस उदासीनता को क्या कहेंगे? लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ग्रामीण मुद्दों को सबसे कम महत्व देता है। सेंटर फॉर द स्टडीज आफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) ने अपने एक अध्ययन में पाया कि देश के शीर्ष छह दैनिकों ने अपने संपादकीय पन्ने का महज दो फीसद स्पेस ग्रामीण भारत से जुड़े मुद्दों को दिया। यही नहीं, अपराध और हिंसा की खबरों के बीच विकास का मुद्दा मार खा रहा है।     

 यह हालत तब है जब 2015 में किसानों की आत्महत्या की दर में 40 फीसद तक का इजाफा देखा गया। गांव और गरीब को लेकर इस तरह का उदासीन रवैया हमारे लोकतंत्र के लिए भी खासा खतरनाक है। इस बात का दबाव होना चाहिए कि वह ग्रामीण भारत की दुर्दशा के प्रति जागरूक तरीके से पहल करें। अब इस क्रूर सच्चाई को लेकर क्या कहा जाए कि किसान आत्महत्या की घटना शायद ही कभी मीडिया के लिए खबर बन पाती है।

समाज और व्यक्ति के लिए किसी भी मुद्दे पर धारणा बनाने का बड़ा जरिया है मीडिया। इसलिए यह दरकार बहुत अहम है कि ग्रामीण भारत को ज्यादा से ज्यादा तवज्जो मिले और उसकी सच्चाई और समस्याएं देश-दुनिया के आगे खुले। चूंकि यह दरकार नए समय की मांग भी है, इसीलिए इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को आगे आना ही चाहिए।

कहने के लिए भारत जरूर आज भी गांवों में बसता है, पर देश अपने गांवों को शायद ही उतना प्यार करता है। करीब 90 करोड़ लोग आज भी गांवों में रहते हैं पर उनकी जिंदगी उस शहरी जिंदगी से काफी अलग और दयनीय है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के सबसे बड़े स्पेस पर काबिज है। इस उदासीनता को क्या कहेंगे? लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ग्रामीण मुद्दों को सबसे कम महत्व देता है। सेंटर फॉर द स्टडीज आफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) ने अपने एक अध्ययन में पाया कि देश के शीर्ष छह दैनिकों ने अपने संपादकीय पन्ने का महज दो फीसद स्पेस ग्रामीण भारत से जुड़े मुद्दों को दिया। यही नहीं, अपराध और हिंसा की खबरों के बीच विकास का मुद्दा मार खा रहा है।     

 यह हालत तब है जब 2015 में किसानों की आत्महत्या की दर में 40 फीसद तक का इजाफा देखा गया। गांव और गरीब को लेकर इस तरह का उदासीन रवैया हमारे लोकतंत्र के लिए भी खासा खतरनाक है। इस बात का दबाव होना चाहिए कि वह ग्रामीण भारत की दुर्दशा के प्रति जागरूक तरीके से पहल करें। अब इस क्रूर सच्चाई को लेकर क्या कहा जाए कि किसान आत्महत्या की घटना शायद ही कभी मीडिया के लिए खबर बन पाती है।

समाज और व्यक्ति के लिए किसी भी मुद्दे पर धारणा बनाने का बड़ा जरिया है मीडिया। इसलिए यह दरकार बहुत अहम है कि ग्रामीण भारत को ज्यादा से ज्यादा तवज्जो मिले और उसकी सच्चाई और समस्याएं देश-दुनिया के आगे खुले। चूंकि यह दरकार नए समय की मांग भी है, इसीलिए इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को आगे आना ही चाहिए।  कहने के लिए भारत जरूर आज भी गांवों में बसता है, पर देश अपने गांवों को शायद ही उतना प्यार करता है। करीब 90 करोड़ लोग आज भी गांवों में रहते हैं पर उनकी जिंदगी उस शहरी जिंदगी से काफी अलग और दयनीय है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के सबसे बड़े स्पेस पर काबिज है। इस उदासीनता को क्या कहेंगे? लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ग्रामीण मुद्दों को सबसे कम महत्व देता है। सेंटर फॉर द स्टडीज आफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) ने अपने एक अध्ययन में पाया कि देश के शीर्ष छह दैनिकों ने अपने संपादकीय पन्ने का महज दो फीसद स्पेस ग्रामीण भारत से जुड़े मुद्दों को दिया। यही नहीं, अपराध और हिंसा की खबरों के बीच विकास का मुद्दा मार खा रहा है।     

 यह हालत तब है जब 2015 में किसानों की आत्महत्या की दर में 40 फीसद तक का इजाफा देखा गया। गांव और गरीब को लेकर इस तरह का उदासीन रवैया हमारे लोकतंत्र के लिए भी खासा खतरनाक है। इस बात का दबाव होना चाहिए कि वह ग्रामीण भारत की दुर्दशा के प्रति जागरूक तरीके से पहल करें। अब इस क्रूर सच्चाई को लेकर क्या कहा जाए कि किसान आत्महत्या की घटना शायद ही कभी मीडिया के लिए खबर बन पाती है।

समाज और व्यक्ति के लिए किसी भी मुद्दे पर धारणा बनाने का बड़ा जरिया है मीडिया। इसलिए यह दरकार बहुत अहम है कि ग्रामीण भारत को ज्यादा से ज्यादा तवज्जो मिले और उसकी सच्चाई और समस्याएं देश-दुनिया के आगे खुले। चूंकि यह दरकार नए समय की मांग भी है, इसीलिए इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को आगे आना ही चाहिए।  कहने के लिए भारत जरूर आज भी गांवों में बसता है, पर देश अपने गांवों को शायद ही उतना प्यार करता है। करीब 90 करोड़ लोग आज भी गांवों में रहते हैं पर उनकी जिंदगी उस शहरी जिंदगी से काफी अलग और दयनीय है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के सबसे बड़े स्पेस पर काबिज है। इस उदासीनता को क्या कहेंगे? लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ग्रामीण मुद्दों को सबसे कम महत्व देता है। सेंटर फॉर द स्टडीज आफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) ने अपने एक अध्ययन में पाया कि देश के शीर्ष छह दैनिकों ने अपने संपादकीय पन्ने का महज दो फीसद स्पेस ग्रामीण भारत से जुड़े मुद्दों को दिया। यही नहीं, अपराध और हिंसा की खबरों के बीच विकास का मुद्दा मार खा रहा है।     

 यह हालत तब है जब 2015 में किसानों की आत्महत्या की दर में 40 फीसद तक का इजाफा देखा गया। गांव और गरीब को लेकर इस तरह का उदासीन रवैया हमारे लोकतंत्र के लिए भी खासा खतरनाक है। इस बात का दबाव होना चाहिए कि वह ग्रामीण भारत की दुर्दशा के प्रति जागरूक तरीके से पहल करें। अब इस क्रूर सच्चाई को लेकर क्या कहा जाए कि किसान आत्महत्या की घटना शायद ही कभी मीडिया के लिए खबर बन पाती है।

समाज और व्यक्ति के लिए किसी भी मुद्दे पर धारणा बनाने का बड़ा जरिया है मीडिया। इसलिए यह दरकार बहुत अहम है कि ग्रामीण भारत को ज्यादा से ज्यादा तवज्जो मिले और उसकी सच्चाई और समस्याएं देश-दुनिया के आगे खुले। चूंकि यह दरकार नए समय की मांग भी है, इसीलिए इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को आगे आना ही चाहिए।

कहने के लिए भारत जरूर आज भी गांवों में बसता है, पर देश अपने गांवों को शायद ही उतना प्यार करता है। करीब 90 करोड़ लोग आज भी गांवों में रहते हैं पर उनकी जिंदगी उस शहरी जिंदगी से काफी अलग और दयनीय है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के सबसे बड़े स्पेस पर काबिज है। इस उदासीनता को क्या कहेंगे? लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ग्रामीण मुद्दों को सबसे कम महत्व देता है। सेंटर फॉर द स्टडीज आफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) ने अपने एक अध्ययन में पाया कि देश के शीर्ष छह दैनिकों ने अपने संपादकीय पन्ने का महज दो फीसद स्पेस ग्रामीण भारत से जुड़े मुद्दों को दिया। यही नहीं, अपराध और हिंसा की खबरों के बीच विकास का मुद्दा मार खा रहा है।     

 यह हालत तब है जब 2015 में किसानों की आत्महत्या की दर में 40 फीसद तक का इजाफा देखा गया। गांव और गरीब को लेकर इस तरह का उदासीन रवैया हमारे लोकतंत्र के लिए भी खासा खतरनाक है। इस बात का दबाव होना चाहिए कि वह ग्रामीण भारत की दुर्दशा के प्रति जागरूक तरीके से पहल करें। अब इस क्रूर सच्चाई को लेकर क्या कहा जाए कि किसान आत्महत्या की घटना शायद ही कभी मीडिया के लिए खबर बन पाती है।

समाज और व्यक्ति के लिए किसी भी मुद्दे पर धारणा बनाने का बड़ा जरिया है मीडिया। इसलिए यह दरकार बहुत अहम है कि ग्रामीण भारत को ज्यादा से ज्यादा तवज्जो मिले और उसकी सच्चाई और समस्याएं देश-दुनिया के आगे खुले। चूंकि यह दरकार नए समय की मांग भी है, इसीलिए इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को आगे आना ही चाहिए।

 



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