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बुधवार, 23 मई 2018

शहरों की स्याह जिंदगी

महानगरीय जीवन शैली का एक बदसूरत चेहरा यह है कि लोगों के बीच आपसी संवाद लगातार कम होता जा रहा है और अकेलापन बढ़ता जा रहा है

कल्पना कीजिए की आप बहुमंजिल इमारत के सबसे ऊंचे फ्लोर पर खिड़की खोल कर खड़े हैं। चारों तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें हैं, नियॉन लाइटों से जगमग सड़के हैं, तेज रफ्तार चलती गाडिय़ां हैं, कहीं अंधेरा है तो कहीं जगमग रोशनी और आप अकेले हैं। यह बात और है कि इस एकांत में कोई बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। क्योंकि लोग तो हजारों हैं, लेकिन इनमें से न कोई हमें पहचानता है और न हम किसी और को। लेकिन सवाल यह है कि अपने मन की बात किसी से सांझा कैसे किया जाए। महानगरीय जीवन का सबसे अंधेरा पहलू शायद यही है कि आपके पास सब कुछ है, लेकिन अपने एकांत में आप नितांत अकेले हैं।

यह अस्वाभाविक नहीं है

ओलिविया लैंग की पुस्तक 'द लोनली सिटी : एडवेंचर्स इन द आर्ट ऑफ बीइंग अलोनÓ में लिखा गया है कि अकेलापन असल में और  अंतरंगता की चाहत है। व्यक्ति की यह मानसिक अवस्था सिर्फ पीड़ादायक ही नहीं, बल्कि उसके साथ जीना बेहद असुविधाजनक और मुश्किल है। आप कहीं भी अकेला हो सकते हैं। यह स्थिति शहरों में

ज्यादा है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं। प्रागैतिहासिक काल में जब मनुष्य अपना जीवनयापन शिकार करके ही करता था। तब उसकी अधिकांश ऊर्जा इस बात में खर्च होती थी कि वह कैसे अपने आपको जीवित रखे। एक समूह में रहना तब सबके लिए हितकर था ताकि किसी भी संभावित खतरे से उसकी रक्षा हो सके। एक साथ रहने का सिलसिला तब से ही विकसित हुआ, जो आखिरकार मानव समाज की खासियत बन गई। लेकिन उदारीकरण और दुनिया की तेज रफ्तार जिंदगी ने समूह में रहने की आदमीकी इसी विशेषता पर चोट किया है और एक आदमी की जिंदगी को अधिक कठिन और चुनौतिपूर्ण बना दिया है। कॉस्मो पॉलिटन शहरों की जिंदगी में यह सब आसानी से देखा जा सकता है। महानगरीय जीवन व्यक्ति को समूह से अलग कर आत्म केंद्रित बनता जा रहा है। वजह वक्त की कमी और सबको पीछे छोड़ आगे निकलने की होड़। इस भाग-दौड़ में सिर्फ समाज ही पीछे नहीं छूटा, बल्कि लोगों के आपसी रिश्ते भी तार-तार हुए। पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-बहन सबके होते हुए भी आपस में संवाद के लिए किसी के पास वक्त नहीं है। वक्त की कमी दीमक की तरह आपसी रिश्तों को चाट रही हैं। नतीजा यह कि सबके बीच आदमी अकेला और तन्हा है। घर से ऑफिस और ऑफिस से घर की आवाजाही में व्यक्ति के पास खुद के लिए समय नहीं रह पाता। घर में भी ऑफिस ही हावी हो जाता है और वह नित्य-प्रति की जिंदगी से अलग हट कर नहीं सोच पाता है।

वैश्वीकरण की देन

कुछ दशक पहले तक इतना अकेलापन नहीं था, जितना आज दिख रहा है। यह पश्चिमी पूंजीवादी समाज की खासियत है, जहां व्यक्ति सबसे पहले अपने बारे में सोचता है। इस समाज में मुनाफे की प्रवृत्ति हावी रहती है, जो पिछले वर्षों में वैश्वीकरण के साथ भारत में अपना प्रभाव जमाता जा रहा है।  समय के साथ इसने व्यक्ति को अकेलापन की ओर धकेल दिया। यह सही है कि व्यक्ति को निजता चाहिए, लेकिन सामूहिकता भी उतनी ही जरूरी है। अगर दोनों में सामंजस्य नहीं होगा, तो ऐसी नौबत आ सकती है।

अकेलेपन से ऐसे निपटें

अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैसिओप्पो के अनुसार अकेलापन पानी में तैरते हिम पर्वत की तरह है, जो काफी गहरा होता है, लेकिन उतना दिखाई नहीं पड़ता है। उनके इस कथन में अकेलापन से निपटने के लिए प्रारंभिक सूत्र मिलता है। सबसे पहले इससे निपटने के लिए इसके मूल कारणों की समझ जरूरी है। अकेलापन  के वेष में कई मनोवैज्ञानिक बाधाएं, जैसे अहम्, गर्व और असुरक्षा जैसी चीजें इसमें अपनी भूमिका निभा सकती हैं। अगर एक बार इसके एकल ढांचे को तोड़ दिया जाए तो इससे आसानी से निकला जा सकता है। इसके अलावा समाजीकरण भी अकेलापन को दूर करने में मददगार हो सकता है। इसके जरिए दूसरों के साथ घुलने-मिलने की प्रक्रिया तेज होती है और इससे व्यक्ति का अकेलापन धीरे-धीरे मिट जाता है।

अकेलेपन से निपटने के लिए जरूरी है कि आप यह स्वीकार करें कि आप अकेले हैं। अकेलापन अपने आप में तो उतना बुरा नहीं है, बल्कि इसे स्वीकार नहीं करना ज्यादा बुरा है। अकेलेपन की स्थिति को स्वीकार करने भर से आप एक बड़ा मोर्चा जीत सकते हैं। ऐसे वक्त में जब शहरीकरणकी प्रक्रिया तेजी से चल रही है, वैसे में इस समाजिक बुराई को व्यापकता में देखनेकी जरूरत है।



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