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शनिवार, 22 सितंबर 2018

सिक्के का सिक्का

मात्र वस्तु विनिमय तक ही सिक्कों का माहात्म्य सीमित नहीं है, सत्ता के साथ-साथ चमकता रहा उसका सितारा! सत्ता के शिखर पर बैठे सभी राज पुरुषों ने अपना-अपना सिक्का उछाला- चित गिरे या पट यह उनकी किस्मत!

सभ्यता के ललाट पर पहली बार कब मुद्रा की बिंदी आ लगी थी-ठीक-ठीक किसी को ज्ञात नहीं। पीछे लौटने पर हद से हद हमारे कदम मोहनजोदड़ो और हड़प्पा काल पर आकर ठिठक जाते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि सिक्कों का इतिहास धातुओं की खोज के इतिहास से जुड़ा है। मृद्भांड़, टेराकोटा या मिट्टïी के पात्रों का आंवा में पकानेके क्रम में, मिट्टïी के ये पके पात्र फेंकने-पटकने से भी न टूटे। कुछ तो झन्न-झन्न, खन्न-खन्न बज उठे। लोगों ने समझा, सामान्य पकी मिट्टïी से अलग यह कोई और ही चीज है-विरल और विशिष्ट! कालांतर में इन्हें नाम मिला धातु। फिर विकसित हुई इन पर कुछ उत्कीर्ण करने की कला।

फल यह हुआ कि विश्व भर में वस्तु विनिमयकी वाल्टर प्रणाली धातु और तौल में ढलती गई और यही सिक्का सत्ता का प्रतीक बन गया।

हर हुक्मरान ने गद्दी पर बैठते ही अपना सिक्का चलाया। हुक्मरान बदलते रहे, सिक्के बदलते रहे, भाषा बदलती रही, विन्यास बदलते रहे। कभी सोने के सिक्के चलाए गए, कभी चांदी के, कभी किसी और धातु के। मोहनजोदड़ो के बाद सबसे ज्यादा सिक्के अशोक के काल में प्राप्त हुए हैं। चंगेज खान के पोते कुबलई खान (1260-1264) ने भी अपने नाम का सिक्का चलाया था।

सिक्कों को लेकर सबसे बड़ा हड़बोंग मुहम्मद बिन तुगलक (1324-1351) से जुड़ा है। सनकी सम्राट तुगलक के मन में चीन की देखा-देखी सोने-चांदी के सिक्के जारी करने का नेक ख्याल आया। काम शुरू हुआ। सोने की कमी पड़ गई। प्रशासनिक अनुभव का भी अभाव था तब बादशाह ने उनकी जगह तांबे और पीतल के सिक्कों को चलाने का हुक्म दिया। तांबे और पीतल के इन सिक्कों का मूल्य सोने-चांदी के पुराने सिक्कों जितना ही रखा। बस लोगों ने अपने-अपने घरों से तांबे-पीतल के सिक्के बना कर उन्हें राजखजाने के सोने-चांदी के सिक्कों से बदलना शुरू किया। प्रथमत: ये नवनिर्मित तांबे-पीतल के सिक्के नितांत स्तरहीन और घटिया थे, द्वितीयत: खजाना खाली होता गया और चालबाज मालामाल। बड़ी अफरातफरी मची। संभल नहीं पाया यह विनिमय। भन्ना कर तुगलक ने 1333 में यह चलन बंद कर दिया।

कहते हैं चौसा के युद्ध में शेरशाह से पराजित होकर हुमायूं ने जान बचाने के लिए गंगा में छलांग लगा ली। एक भिश्ती ने उसकी जान बचाई तो पुरस्कारस्वरूप उसे एक दिन की बादशाहत मिली। इस एक दिन के दौरान उसने चमड़े का सिक्का चलाया। चमड़े के उन सिक्कों के बीच सोने के टांके या पत्तरें होती थीं। एक-दो दिन की बादशाहतकी अल्प अवधि में भिश्ती भी अपना सिक्का जारी करने से न चूका, भले ही वे सिक्के चमड़े के ही क्यों न रहे हो। दीवारों, खंडहरों, टीलों को खोदते समय अब भी पुराने सिक्के, अशर्फियां मिल जाते हैं। सिक्के इसके पूर्व भी चलाए गए, बाद में भी, यहां तक कि 'सिक्का चलना’ एक मुहावरा बन गया-मसलन अब वहां किसका सिक्का चलाता है, लेकिन जिसे सिक्के को हम आज का रुपया कहते हैं, उसे सर्वप्रथम शेरशाह सूरी ने जारी किया था-वज़न-11.66 ग्राम या 11.36 ग्राम 91.7 प्रतिशत चांदी। उन्नीसवीं सदी में जब चांदी की आवक बढ़ गई और अर्थव्यवस्था का मानक सोना बन गया तो चांदी का मान गिर गया। तब रुपया 11.34 ग्राम (चांदी) को 16 आने या 64 पैसे 128 आफेले पैसे और 192 पाई में बट गया। अब तक यह एफपीएस (फुट पाउंड सेकेंड) सिस्टम में था। (सीजीएस) सेंटीमीटर ग्राम सेकेंड सिस्टम में बाद में ढला-अपने यहां 1957 में, श्रीलंका में 1869 में, पाकिस्तान में 1957 में। अब हमारा चांदी का रुपया 64 तांबे के पैसा का नहीं, 100 पैसे का हो गया। वस्तु-विनिमय या जिंसकी अदला-बदली से ग्रामीण मुद्रा चंूकि विपणन का प्रथम प्रतीक थी अत: उसे अक्सर नजर लगती रही और साथ ही जारी रहीं अपनी-अपनी मुद्रा की आबरू बचाने की कवायद भी। हर राज-रजवाड़े के अपने-अपने सिक्के!

भारत में कागज की मुद्राको धातु की मुद्रा का स्थानापन्न बनाने का श्रेय जाता है ब्रिटिश सत्ता को। कागज का नोट सर्वप्रथम 'जनरल बैंक ऑफ बेंगाल एंड बिहार’ द्वारा 1773 में प्रारंभ किया गया। तदुपरांत 'बैंक आफ बॉम्बे’, और 'बैंक ऑफ मैड्रास’ को अपनी-अपनी सर्किल में नोट जारी करने का अधिकार एक चार्टर के तहत दिया गया था।

बैंक ऑफ बेंगाल की स्थापना 50 लाख रुपए की पूंजी के साथ 1806 में 'बैंक ऑफ कैलकटा’ के रूप में की गई थी। 100, 250, 500 रुपए की कीमत अंकित होने के साथ-साथ उन पर अंकित रहता था बैंक का नाम जो उर्दू, बांग्ला और देवनागरी में भी अंकित रहता। सन् 1861 में कागजी मुद्रा अधिनियम के तहत नोट छापने का एकाधिकार भारत सरकार को मिल गया और प्रेसिडेंसी बैंकों के नोट खत्म हो गए। अब नोट छापना बच्चों का खेल नहीं था। सारा कुछ नियंत्रित, अनुशासित टकसाल मास्टर्स, महालेखाकार और मुद्रा नियंत्रक से लैस। ब्रिटिश इंडिया के इन नोटों पर महारानी विक्टोरिया के चित्र अंकित थे। ये मुद्राएं 10, 20, 50, 100 और 1000 रुपए की होती थीं।

1903 से 1911 के बीच 5, 10, 50, और 100 रुपए के नोट रद्द कर दिए गए। प्रथम विश्व युद्ध के कारण 1917 में पहली बार सम्राट के चित्रवाले एक और दो रुपए तथा आठ आने के नोट छपे और 1923 में दस रुपए का नोट छापा गया।

रंगीन नोटों का प्रचलन 1932 में शुरू हुआ नासिक के सेक्युरिटी प्रेस में। 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक कलकत्ते में और उसकी शाखाएं बंबई, मद्रास, रंगून, कराची, लाहौर और कानपुर से खोली गईं। नोटों के इतिहास में सन् 1938 का साल महत्वपूर्ण रहा। उस वर्ष जॉर्ज-ङ्कढ्ढ के चित्र साथ पहले पहल 5, 10, 100, 10,000 रुपए के नोट जारी किए गए। दूसरे विश्व युद्ध में आक्रमण के जो नए-नए आयाम फूटे, उनमें एक क्षेत्र 'मुद्रा’ भी रहा। कहीं जापान जाली नोट छाप कर बाजार में न उतार दे, सो नोट पर न सिर्फ वाटर मार्क लगाया गया बल्कि नोट में एक सुरक्षा धागा भी लगा दिया गया।

देश आज़ाद हुआ तो अंग्रेज़ सम्राटकी जगह आ गए सारनाथ के अशोक स्तंभ और उसके 'सिंह’। फिर आए महात्मा गांधी। अभी नोटों पर इन्हीं का आधिपत्य है, बीच-बीच में गेहंू की बालियां या बांध और पनबिजली या विकास के दीगर प्रतीक अंकित होते रहे 1954 में 1000, 5000, 10,000 रुपए जैसे बड़े नोटों को जारी किया गया। बड़े-बड़े नोट! मगर पुन: छोटे नोट!

एक काल विशेष (प्राय: सौ साल पूर्व) तक सिक्कों के इतिहास की बुनियाद में कौडिय़ों का भी महत्व रहा है। छोटी इकाई कौड़ी लक्ष्मी का प्रतीक मानी जाती थी। कई कौडिय़ों का पैसा होता था। फिर पैसे के परिवार के कच्चों-बच्चों से होते हुए उसके शीर्ष रुपए तक पहुंचते थे। तीन कौड़ी, पांच कौड़ी, छकौड़ी नाम रखने के पीछे भी व्यक्ति के धनवान होने की यही कामना थी। बच्चों की करधनी और कंठहार में छेद वाला पैसा, कौड़ी आदि गुंथे होते।

'खेलत-खेलत मैं कौड़ी पाया

ऊ कौड़ी को गंग बहाया’

इस तरह जैविकी से जुड़ा हुआ है, सिक्का। और खरीदी कौडिय़ों के मोल (उपन्यास, विमलमित्र) के लिहाज से साहित्यिकी से भी।

समय-समय पर रवींद्रनाथ (150वीं साल गिरह), मोतीलाल नेहरू, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, और अन्य स्मृति परक चिह्नï मुद्राओं पर अंकित होते रहे, 1862 में जारी किए नए सिक्के पर महारानी विक्टोरिया अंकित थीं। आज़ादी के बाद पहला सिक्का 1950 में आया।

सिक्कों को हम जितना ही उलटते-पलटते हैं, उसकी परिधि का विस्तार उतनी ही दूर छलकता चला जाता है।   सिक्के एक तरह से ग्राफ के बिंदु हैं-इतिहास को जानने के पुख्ता साधन। गुणाकर मुले की पुस्तक 'इतिहास और पुरातत्व’ तथा सिक्कों का नई दिल्ली का संग्रहालय जैसे अनेक ज्योतिस्तंभ हैं पर सुदूर अतीत के अंतिम सिरे तक पहुंचना अभी भी दूर है।

सिक्के खरे हों या खोटे-वक्त ही सबसे बड़ा निर्णायक होता, पर सदा-सर्वदा ऐसा नहीं होता। अक्सर देखा गया कि खोटे सिक्के ने खरे सिक्कों को हटा दिया। और सच पूछिए तो

सिक्के सबने उछाले। चित गिरे या पट अपनी-अपनी किस्मत!



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