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मंगलवार, 14 अगस्त 2018

संतुलन और शुचिता का बजट

इस बजट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा आज इस मुद्दे पर हो रही है कि मोदी सरकार ने राजनीतिक दलों के चंदे को पारदर्शी बनाने की बड़ी मांग को आखिरकार पूरा कर दिया

बजट पेश करने की तारीख ही नहीं, बल्कि इससे जुड़े वित्तीय दरकारों और सरोकारों की पूरी लीक इस बार सरकार ने बदल कर रख दी। खास बात यह भी रही कि सरकार को बजट पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभाओं से पहले पेश करना था। सो चुनाव आयोग ने पहले से हिदायत दे रखी थी कि सरकार इस बात का ध्यान रखे कि बजट में इन प्रदेशों को लेकर अलग से कोई घोषणा न हो। सरकार ने इस दबाव को सकारात्मक तौर पर लिया और उसने इसे राजनीतिक शुचिता बहाली के अवसर के रूप में तब्दील करने का नैतिक साहस दिखाया। यही कारण है कि इस बजट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा आज इस मुद्दे पर हो रही है कि मोदी सरकार ने राजनीतिक दलों के चंदे को पारदर्शी बनाने की बड़ी मांग को आखिरकार पूरा कर दिया। दो हजार से ऊपर के चंदे के स्रोत बताने की बाध्यता सियासी जमातों को नोटबंदी के बाद से शुरू हुई भ्रष्टाचार की बड़ी कवायद में आम लोगों के साथ खड़ा कर देगा। नि:संदेह यह एक साहसिक फैसला है और इसके साथ ही देश राजनीतिक सुधार के एक नए दौर में कदम बढ़ा दिया है। 

रही विकास दर और दूसरे पैमानों पर बजट की समीक्षा की तो इस मुद्दे पर सरकार पर जो दबाव था, वह एक दिन पहले ही आर्थिक सर्वे में जाहिर हो गया था। इसमें कहा गया था कि वित्तीय वर्ष 2016-17 में जीडीपी वृद्धि दर 6.50 प्रतिशत के दायरे में रहेगी। पिछले साल यह 7.6 फीसदी थी। सरकार इस कमी की भरपाई नए वित्तीय वर्ष में करने की बात कह रही है। उसका तर्क है कि नोटबंदी का दूरगामी असर अर्थव्यवस्था के लिए सार्थक होगा। बात मौजूदा स्थिति की करें तो एक बात तो माननी पड़ेगी कि बीते तीन महीने में देश में कैशलेस लेनदेन को लेकर जो एक जोर बढ़ा है, उससे आने वाले दिनों में वित्त और बाजार के बीच एक पारदर्शी घनिष्ठता बढऩी तय है। बहरहाल, अब जब सरकार अगले एक साल के लिए देश की आर्थिक प्राथमिकताएं और उसके लिए बजटीय आवंटन तय कर रही है, तो वह इस बात का यकीन आगे बढ़कर दिला रही है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिश लागू होने से मंहगाई बढऩे का खतरा नहीं है। यही नहीं सरकार राजकोषीय घाटे पर लगाम कसने की बात भी कह रही है। इसी तरह सरकार पिछले साल से नए वित्तीय वर्ष के बीच इस ट्रेंड को रेखांकित करने में लगी है कि मैन्यूफेक्चरिंग सेक्टर में बेहतरी कायम रहेगी और रोजगार बढऩे का ग्राफ चढ़ता जाएगा। साफ है कि जिस बजट को चुनावी नहीं होना था, उसमें जनता के बीच अपने कामकाज को संतोषजनक से लेकर लाजवाब बताने तक, हर तर्क सरकार ने तैयार रखा। जाहिर है कि 93 साल में पहली बार बजट कैलेंडर से लेकर आम और रेल बजट को एक साथ पेश करने के बदलाव को अपनी आर्थिक अक्लमंदी के रूप में सरकार देश के सामने पेश करना चाहती है। इस पेशकदमी में उसकी यह कोशिश भी शामिल है कि वह वित्तीय मोर्चे पर वाकई देश को अच्छे दिनों की तरफ ले जा रही है। बात करें बजट में की गई प्रमुख घोषणाओं की तो वित्तमंत्री ने जोर देकर कहा कि उनकी नजर गांव-गरीब और युवाओं पर है। इसी के तहत उन्होंने 2.5 लाख से 5 लाख रुपए तक की आय पर पांच प्रतिशत टैक्स लगाने की बात कही, अब तक यह 10 प्रतिशत था। इसके उलट अब 50 लाख से एक करोड़ रुपए सालाना कमाने वालों को 10 प्रतिशत सरचार्ज देना होगा। किसानों की आत्महत्या की खबरों के कारण सरकार पर कृषि क्षेत्र की उपेक्षा का आरोप बीते तीन सालों से लग रहा है। सरकार इस आरोप से उबरने के लिए उम्मीद जता रही है

कि अच्छे मानसून की वजह से कृषि क्षेत्र में 4 प्रतिशत से अधिक वृद्धि की आशा है। इस आशा को आगे ले जाते हुए सरकार ने देश को इस बात का भरोसा दिलाया है कि 2019 तक एक करोड़ गरीब परिवार गरीबी से बाहर आ जाएंगे। सरकार पांच साल में किसानों की आय दोगुना करने

की बात फिर से दोहरा रही है। यह काम कैसे होगा, इसके उपक्रम के तौर पर सरकार ने ऐलान किया

है कि अगले साल 10 लाख करोड़ रुपए कृषि कर्ज के तौर पर दिए जाएंगे।  विपक्ष सरकार पर इस बात का आरोप लगाता रहा है कि वह मनेरगा की उपेक्षा कर रही है। इस बजट में सरकार की तरफ से कहा गया है कि मनरेगा पर 48 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे, जो अब तक का अधिकतम है, पिछले साल इस मद में 37 हजार करोड़ का प्रावधान था। गर्भवती महिलाओं के खाते में छह हजार रुपए दिए जाने की घोषणा तो प्रधानमंत्री पहले ही

कर चुके थे। बजट में इससे आगे यह कहा गया कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अगले

दो साल में एक करोड़ नए घर बनाए जाएंगे।  चूंकि सरकार ने पिछला वित्तीय वर्ष समाप्त होने से पहले ही पेश किया है, इसीलिए आंकड़ों के मकडज़ाल से भी वह काफी हद तक मुक्त रही है। सरकार की इस चतुराई पर चुनाव आयोग को भी शायद ही ऐतराज हो।  यह अलग बात है कि यह कोशिश कितनी कारगर रही, यह काफी हद तक पांच राज्यों खासकर उत्तरप्रदेश के चुनावी नतीजे से जाहिर हो जाएगा।

 



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