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शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

कानपुर का अनोखा आरटीआई टी स्टॉल

सूचना पाने का अधिकार यानी दूसरी आज़ादी। आम जनता को दूसरी आज़ादी मिले 11 साल हो गए, लेकिन आज तक बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिन्हें इस अधिकार के बारे में कोई जानकारी नहीं है। कानपुर के केएम भाई ने इसके बारे में जनता को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है

सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) को बने 11 साल हो गए, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसका कारगर होना अभी बाकी है। यह हालत तब है जबकि सरकारों ने इस कानून के तहत लोगों को मिले हक के बारे में जागरुक करने में करोड़ों रुपए खर्च किए हैं। इस निराशा के बीच कानपुर में लोगों को आरटीआई के बारे में पूरी जानकारी चाय दुकान पर मुहैया कराने का अनूठा तरीका अमल में लाया है।

कानपुर से 35 किलोमीटर दूर चौबेपुर प्रखंड स्थित तातियागंज ग्राम पंचायत में मूलचंद बाबा का टी स्टाल इन दिनों आरटीआई टी स्टाल के तौर पर लोकप्रिय हो रहा है। यहां सुबह से ही पांच रुपए की चाय की चुस्की के साथ आरटीआई से जुड़ी समस्याओं को लेकर लोगों की भीड़ जुटने लगती है। इस की शुरूआत 27 साल के युवा सामाजिक कार्यकर्ता के एम भाई ने कुछ लोगों की मदद की थी। केएम भाई बताते हैं, 'जब मुझे लगा कि शहर में लोग ग्रामीण इलाकों के मुकाबले आरटीआई को लेकर ज्यादा जागरुक हैं तो मैंने इस चाय दुकान का चयन किया। यह दुकान मुख्य सड़क पर है, इसीलिए ज्यादातर ग्रामीणों का भी ध्यान खींचता है।, 55 साल के मूलचंद बाबा पढ़े-लिखे नहीं हैं। इसीलिए यहां आरटीआई से जुड़ी जानकारियों से जुड़े तमाम पर्चों और फॉर्मों में संपर्क के लिए केएम भाई अपना मोबाइल नंबर दे देते हैं। मूलचंद बाबा टी स्टाल को आरटीआई टी स्टाल के रूप में लोकप्रिय होते देर नहीं लगी।

बाबा बताते हैं, 'मैं देखकर चकित रह जाता हूं कि किस तरह केएम भाई बिना एक पैसा लिए आरटीआई आवेदकों की मदद करने और उन्हें संबंधित विभाग तक पहुंचाने में घंटों लगा देते हैं।, 

आरटीआई टी स्टाल पर कानपुर देहात और उससे लगे इलाकों से तमाम तरह की शिकायतें लेकर लोग पहुंचते हैं। इन शिकायतों में स्थानीय पुलिस द्वारा किया जाने वाला उत्पीडऩ, राशन दुकानों में होने वाली ठगी, राशन कार्ड बनाने में देरी और ग्रामीण विकास राशि की बिना कोई काम किए ठेकेदारों द्वारा गबन के मामले सामने हैं। केएम भाई इन लोगों को समूहों में आरटीआई कानून, 2005 के बारे में जागरुक करते हैं। वे बताते हैं कि लोगों को उन्हें इस बात का पूरा हक है कि वे संबंधित विभागों से पूछें कि उनके गांवों के विकास के लिए स्वीकृत धन को कहां और कैसे खर्च कया गया। यह भी कि अगर लोग चाहें तो राशन दुकानों को जारी होने वाले कोटे और उसके वास्तविक वितरण की तफ्सील भी हासिल कर सकते हैं।  

बिठुर निवासी राम प्रसाद सालों से अपनी जमीन के कागज की डुप्लीकेट कॉपी हासिल करने के लिए सालों से भटक रहे थे। पर उन्हें ये कगजात आरटीआई आवेदन के जरिए एक महीने के भीतर हासिल हुए। राम प्रसाद की तरह झांसी, औरैया, हमीरपुर, जालौन, कन्नौज और बदायूं के सैकड़ों ग्रामीणों के पास आरटीआई के जरिए अपनी समस्याओं के हल करने के दिलचस्प अनुभव हैं।

के एम भाई बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में आरटीआई को लेकर बड़ी समस्या अशिक्षा है। आलम यह है कि शिक्षित होने के बावजूद कई लोग तय फार्मेट में आरटीआई आवेदन तक नहीं कर सकते। इन आवेदनों को संबंधित विभागों तक पहुंचाने की समझ भी ज्यादातर लोगों में नहीं है। इस समस्या से निपटने के लिए केएम भाई अब क्षेत्र के हर गांव में शिक्षित युवकों का एसा समूह बनाने में लगे हैं, जिससे जुड़े लोग खाली समय में ग्रामीणों को आरटीआई के बारे में जानकारी दें। 

उन्होंने राज्य के सूचना आयुक्त सहित, जिलाधिकारियों और वरीय पुलिस अधिक्षकों को आरटीआई सप्ताह या हर तहसील में आरटीआई पखवाड़ा मनाने के अलावा महीने में एक आरटीआई शिविर हर गांव में लगाने की अपील की है।

इसके अलावा केएम भाई कुछ और ऐसी चाय दुकानों की खोज में जुटे हैं, जहां से वे लोगों को आरटीआई के बारे में जागरुक करने के मिशन को आगे बढ़ा सकें।



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