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गुरुवार, 24 मई 2018

डॉल्फिन बचाने की पहल

नई दिल्ली। सरकार संकटग्रस्त गांगेय डॉल्फिन, घड़ियाल और कछुओं की पहली बार व्यापक गणना कराएगी, ताकि उनके आधिकारिक आंकड़ें मिल सके।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) देहरादून आधारित भारतीय वन्यजीव संस्थान के जरिए फरवरी या मार्च के अंत तक यह कार्य करेगा। यह केंद्रीय पर्यावरण एवं मंत्रालय के तहत स्वायत्त संस्थान है। एनएमसीजी के सलाहकार संदीप बेहरा ने पीटीआई भाषा को बताया, ‘यह पहला मौका है जब गांगेय डॉल्फिन का एक उपयुक्त व्यापक और वैज्ञानिक अध्ययन समूची गंगा नदी प्रणाली में किया जा रहा है।’ उन्होंने कहा कि यह पहला मौका होगा जब घड़ियालों और कछुओं की प्रचुरता और प्रजाति संरचना का‘एक्वा लाइफ’ कार्यक्रम के तहत सर्वेक्षण होगा।

केंद्र के महत्वाकांक्षी नमामी गंगे कार्यक्रम के तहत एनएमसीजी के द्वारा यह अध्ययन होगा। यह इसलिए अहम है कि मीठे पानी में रहने वाले इस जंतु की आबादी नदी जल की गुणवत्ता को जाहिर करता है। इसकी आबादी जितनी अधिक होगी, जल की गुणवत्ता उतनी ही बेहतर होगी। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक अध्ययन में राज्यों और एनजीओ के साथ समन्वय करेंगे। पहले की गई कोशिशों के उलट यह गणना तेजी से नहीं की जाएगी और यह एक महीने की अवधि में होगी।

बेहरा ने कहा कि इससे वैज्ञानिकों को इस राष्ट्रीय जलीय जंतु डॉल्फिन की आबादी के बारे में विश्वसनीय आंकड़े मिलेंगे । उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में पड़ने वाले गंगा के हिस्से में 2015 में तीन दिन तक गणना कराई थी। यह तेजी से किया गया एक सर्वेक्षण था। इसमें ज्यादा विशेषज्ञ नहीं थे। इस सर्वेक्षण में 1300 डॉल्फिन होने का सुझाव दिया गया था। उन्होंने बताया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में एक अध्ययन किया था जिसमें इसकी आबादी 670 पाई थी। डॉल्फिन की आबादी के तीन साल में दोगुना होने की बहुत कम संभावना है। इसलिए उस अध्ययन में कुछ खामी थी। नयी कोशिश उपयुक्त होगी और यह वैज्ञानिक अध्ययन होगा। औसतन डॉल्फिन हर तीन से चार साल में प्रजनन करती है।



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