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गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

स्वच्छता की अलख जगाते 'अग्ली इंडियन’

इनका न कोई नाम है और न कोई चेहरा। कोई नहीं जानता कि ये आते कहां से हैं और रहते कहां हैं? अपने चेहरे पर मुखौटा लगाए आपके शहर की सबसे गंदी गली या सड़क की सफाई करते अगर ऐसे लोग दिखें तो आप समझ लीजिए कि ये 'अग्ली इंडियन’ हैं

अगर आप कुछ साल पहले बेंगलुरु की सड़कों पर जा चुके हैं और इन दिनों कोरामंगला’ या 'इकोस्पेस फ्लाइओवर’ या 'रिचमंड सर्किल फ्लाइओवर’ की तरफ जाने की सोच रहे हैं तो जाते समय आपके दिमाग में कई बार उस जगह की पुरानी तस्वीरें उभरेंगी। उस इलाके की कल्पना मात्र से ही सड़क किनारे कूड़ों के ढ़ेर, फटे पोस्टरों और पान की पीक से बदरंग हो चुकी दीवारों की तस्वीर एक-एक कर सामने आने लगेंगी। लेकिन आज वहां पहुंचते ही आप दंग रह जाएंगे, क्योंकि आपकी नजरों के सामने गंदगी नहीं बल्कि दीवारों पर बनाए गए खूबसूरत पेंटिंग्स दिखेंगे। आपके लिए यकीन करना मुश्किल हो सकता है कि क्या यह वही जगह है जो पहले गंदगी के लिए बदनाम थी?  आज इसकी खूबसूरती बरबस लोगों को अपनी तरफ खींच रही है। ये कुछ जगहें तो सिर्फ उदाहरण हैं, आज आप बेंगलुरु में ऐसे कई इलाके देख सकते हैं जो कल तक गंदगी के लिए बदनाम थे, लेकिन आज खूबसूरती की मिसाल हैं। बेंगलुरु ही नहीं मेरठ, भोपाल, पुणे और देश के कई अन्य शहरों में भी कई ऐसी जगह दिख जाएंगी जहां स्वच्छ भारत की नई इबारत लिखी जा रही है।

पेश कर रहे सफाई की मिसाल

कल तक गंदगी के लिए बदनाम ये इलाके खुद-ब-खुद साफ नहीं हुए हैं, न ही किसी बड़े सामाजिक संगठन ने इसे साफ किया है। फिर आप यह सोच रहे होंगे कि क्या रातों-रात अचानक इन इलाकों को

कसी देवदूत ने आकर साफ कर दिया?  जी नहीं, अगर आप ऐसा सोच रहे हैं, तो ऐसा नहीं है। इन इलाकों को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए समाज के कुछ ऐसे लोगों ने काम किया है, जिन्हें लोकप्रिय होने की कोई चाहत नहीं है। इनका न कोई चेहरा है और न ही कोई नाम। चुपचाप सफाई के काम में लगे इन लोगों की तो बस यही चाहत है कि देश का हर इलाका इतना साफ और सुंदर हो कि लोग वहां की स्वच्छता की मिसाल दें। समाज के ये गुमनाम लोग किसी नाम और पहचान की जगह खुद को अग्ली इंडियन बुलाना पसंद करते हैं। अग्ली इंडियन टीम का बेंगलुरु से शुरू हुआ स्वच्छता अभियान का यह सफर आज देश के कई शहरों में जारी है।

2010 में हुआ अभियान

आमतौर पर रविवार के दिन लोग चैन और सुकून के साथ अपनी छुट्टी मनाना चाहते हैं। लेकिन आज से छह साल पहले यानी 2010 में एक रविवार की सुबह कुछ युवाओं ने एक ऐसी पहल की, जिसके लिए लोग आमतौर पर आगे नहीं आते। बेंगलुरु के इन युवाओं ने शहर के एक गंदे नुक्कड़ का चुनाव किया और फिर सफाई कर उसे खूबसूरत जगह में बदल दिया। नाम, सम्मान और लोकप्रियता के मुकाबले स्वच्छता में यकीन रखने वाले इन स्वयंसेवकों ने खुद की पहचान छिपाते हुए सिर्फ सफाई पर ध्यान केंद्रित किया और खुद को 'अग्ली इंडियन’ नाम दिया। अब तक 20 शहरों में 500 से ज्यादा जगहों पर 'अग्ली इंडियन’ ने सफाई की बेहतरीन मिसाल कायम की है, लेकिन कभी भी इन स्वयंसेवकों ने अपनी पहचान उजागर नहीं की है। अपने अभियान में चुपचाप संलग्न रहने वाले स्वयंसेवक किसी पब्लिक प्लेटफॉर्म पर होने वाली मीटिंग में भी मास्क पहन कर ही शामिल होते हैं।

 

लोगों की सोच से प्रेरित नाम

किसी भी बेहतर उद्देश्य को पूरा करने के लिए लक्ष्य निर्धारण जरूरी है। स्वच्छता अभियान को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक था कि हम भारतीय ये स्वीकार करें कि हम अभी भी स्वच्छता के पैमाने पर बहुत नीचे हैं। स्वीकारोक्ति ही बदलाव की सीढ़ी होती है। 'अग्ली इंडियन’ इस नाम के चुनाव के पीछे भी वास्तविकता से जुड़ा एक तथ्य है। आमतौर पर हम भारतीय खुद को स्वच्छता और स्वास्थ्य प्रेमी मानते हैं। हम अपने घरों में साफ-सफाई का काफी ध्यान रखते हैं। आमतौर पर अपने घरों में हम कागज का एक टुकड़ा भी इधर-उधर नहीं रहने देते, लेकिन जैसे ही घरों से बाहर निकलते हैं, हमारा व्यवहार या आचरण बदल जाता है। रैपर, पॉलिथीन, पेपर के टुकड़ों आदि को तो गंदगी में गिनते ही नहीं और इधर उधर फेंक देते हैं। पान की पीक आदि से सड़कों और और गली-मोहल्लों की दीवारों पर चित्रकारी करने में शर्माते तक नहीं।

हमारी सोच का ही नतीजा है कि जगह के हिसाब से हमारे स्वच्छता के पैमाने बदल जाते हैं। जिस गंदगी को हम अपने घरों में एक पल के लिए नहीं रखते उसे सड़कों पर फेंकने में एक पल नहीं लगाते। लोगों की इन्हीं सोच की वजह से स्वच्छता के रक्षक इन युवाओं के मन में यह खयाल आया

कि जब हमारी सोच बदसूरत है तो वास्तविकता में हम भारतीय बदसूरत ही हैं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर उन्होंने इस पूरे अभियान को 'अग्ली इंडियन’ का नाम दिया।

सफाई का तरीका

'अग्ली इंडियन’ टीम साफ-सफाई के लिए सबसे पहले गंदगी वाले इलाकों की पहचान करते हैं। उसके बाद 'स्पॉट फिक्स’ (किसी एक जगह का चयन) करते हैं और उसकी सफाई पर फोकस करते हैं। कूड़ा घर के रूप में तब्दील हो चुके नुक्कड़, पेशाब से नहाए सड़क और पान की पीक से बदरंग हो चुकी दीवारों को न केवल साफ करते हैं, बल्कि उसकी पुरानी खूबसूरती लौटाने में भी बेहतरीन भूमिका निभा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि गंदगी के लिए स्पॉट फिक्स करते ही स्वयंसेवक सीधे सफाई का काम शुरू कर देते हैं। इन लोगों का मानना है कि एक बार किसी गंदगी वाले इलाके को साफ करने के बाद वह कम से कम 90 दिनों तक यह सुनिश्चित करते हैं कि वह जगह उसी तरह से स्वच्छ और सुंदर हो जैसा वह कर गए हैं, तभी उनका प्रयास सफल होगा।

ऐसा करने के लिए उस इलाके में गंदगी फैलाने वाले लोगों की सोच बदलनी जरूरी है। वहां के दूकानदारों, कूड़ा उठाने वाले कर्माचारियों और स्थानीय प्राधिकारियों के प्रयासों से ही ऐसा संभव हो सकता है। इन लोगों को जागरूक करने के लिए सबसे सरल तरीका है इन्हें लेक्चर देना, उपदेश देना या धमकाना, लेकिन ऐसा करने से असर ज्यादा समय तक नहीं दिखता। ज्यादा समय तक सकारात्मक असर के लिए 'अग्ली इंडियन’ के स्वयंसेवक लोगों को समझाते हैं और उन्हें सफाई के लिए प्रोत्साहित करते हैं। हालांकि इस काम के लिए काफी धैर्य की जरूरत होती है और कई बार वक्त लगता है, लेकिन एक बार अगर लोगों की सोच बदलने में कामयाबी हासिल हो जाती है, तो फिर सफाई का यह काम लंबे समय तक सफल रहता है।

सफाई के बाद सुंदरता

मूलभूत काम (ग्राउंडवर्क) करने के बाद सभी स्वयंसेवक एकसाथ मिलकर उस जगह की सफाई के लिए इक_ा होते हैं। दस्ताने, झाड़ू, पेंटब्रश, केमिकल्स आदि से सिलसिलवेवार तरीके से जगह की सफाई करते हैं। एक बार सफाई पूरी होने के बाद वहां की दीवारों पर बेहतरीन कलाकृतियां बनाई जाती हैं, डस्टबिन रखे जाते हैं और फूलों के गमलों से उस इलाके को सजाया जाता है। किसी भी स्थान को स्वच्छ रखने से लोगों की मानसिकता पर भी काफी असर पड़ता है। फूलों से सजे गमले हों या दीवारों पर उकेरी गईं कलाकृतियां हों ये सब चीजें लोगों को उसी जगहों को दोबारा गंदा करने से रोकने में प्रभावी साबित होती हैं।  

सफाई के लिए बनाए उपकरण

अक्सर लोग सड़क किनारे डस्टबिन और यूरिनल सिस्टम नहीं होने की शिकायत करते हैं। लोगों की इस समस्या के समाधान के लिए 'अग्ली इंडियन’ ग्रुप ने 'तेरे बिन’ नाम का एक डस्टबिन और 'वंडर लू’ नाम का यूरिनल सिस्टम बनाया है। छोटे आकार के इस डस्टबिन का इस्तेमाल कप, रैपर, सिगरेट के पैकेट और अन्य छोटे-छोटे कूड़ों को डालने के लिए किया जा रहा है। जहां पर म्यूनिसिपल अधिकारी डस्टबिन नहीं लगा पा रहे हैं, उन जगहों पर इसे लगाया जा रहा है। 'तेरे बिन’ नामक इस डस्टबिन को वजनदार बनाया गया है, ताकि एक बार इसे लगाने के बाद कोई आसानी से हटा न सके।

'अग्ली इंडियन’ हैं प्रेरणा स्रोत

एक दशक पहले तक स्वच्छ और सुंदर सड़क के बारे में सोचना, सड़क किनारे मनोरम दृश्य का होना किसी सपने से कम नहीं था, लेकिन आज के समय में 'अग्ली इंडियन’ की बेहतरीन पहल से यह सपना साकार हो रहा है। 'अग्ली इंडियन’ ने सड़क किनारे और नुक्कड़ों के आस-पास से गंदगी को दूर कर उसे स्वच्छ बनाने में जिस तरीके से काम कर रहा है, उससे प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के लिए भी काम किया जा सकता है। जिस प्रकार अग्ली इंडियन की टीम ने स्वच्छता की राह दिखाई है, अगर उसी राह का सहारा लिया जाए तो गंगा आसानी से साफ हो सकती है। अगर स्थानीय लोगों को ही वहां के घाटों की सफाई की जिम्मेदारी दी जाए तो गंगा स्वच्छता अभियान और अधिक सफल हो सकता है। सफाई के लिए 'अग्ली इंडियन’ के अभियान की तरह गंगा घाटों की सफाई के लिए अभियान चलाया जाए तो बेहतर परिणाम देखने को मिल सकता है।

कौन हैं 'अग्ली इंडियन’

'अग्ली इंडियन’ टीम में 25 से 40 साल के प्रोफेशनल्स के साथ ही बच्चे और प्रौढ़ भी शामिल हैं, जो बिल्कुल लोकप्रियता से दूर रहते हैं। हर शहर में अलग-अलग लोग होते हैं, लेकिन इनका सिर्फ एक ही मकसद होता है, अपनी पहचान जाहिर किए बगैर सफाई में योगदान देना। फेसबुक, वेबसाइट और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए किसी भी जगह की सफाई करने की योजना बनाने से लेकर अपने कार्यों को दूसरों तक फैलाने का काम करते हैं। जो कोई भी अपनी पहचान छिपाकर सफाई में योगदान देना चाहता है, वह उस स्पॉट पर पहुंचकर सफाई के काम में जुट जाता है। इस काम में जुटने के साथ ही अपने को बगैर किसी नाम, पहचान और प्रतिष्ठा के 'अग्ली इंडियन’ की टीम से जुड़ा पाता है।

काम चालू, मुंह बंद

'काम चालू, मुंह बंद’ यह कहावत भारतीयों में काफी प्रसिद्ध रहा है। अधिकांश लोगों का यही मानना होता है कि मुंह बंद रहेगा तभी काम अच्छा हो सकता है। मुंह चालू होते ही काम बंद हो जाता है। इसी बात को अपने अभियान का मुख्य मकसद बनाते हुए 'अग्ली इंडियन’ टीम का मुख्य उद्देश्य बिना अधिक बोले अपने काम पर ध्यान केंद्रित करना होता है। अग्ली इंडियन के इस प्रयास से प्रेरणा ग्रहण कर देश का हर व्यक्ति किसी न किसी क्षेत्र में देश को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे सकता है।



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