sulabh swatchh bharat

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

सस्ते सैनिटरी नैपकिन से आई सुबह

सैनिटेरी नैपकिन के वैकल्पिक उपायों की वजह से महिलाओं को गंभीर इंफेक्शन जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन महोबाप्रशासन ने इसका किफायती उपाय ढूंढ निकाला है

सुमन की उम्र 17 साल है। वह उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के महोबा जिले की छात्रा है। चार साल पहले जब वह यौवनावस्था को प्राप्त हुई, तो यह अनुभव उसके लिए खासा दुख भरा था। उसका यह कष्ट तब और बढ़ गया जब उसकी अशिक्षित मां ने पहली माहवारी के दौरान इस्तेमाल करने के लिए उसे घर का बना गंदा सैनिटरी नैपकिन दिया। दरअसल, यह और कुछ नहीं, बस कुछ पुराने कपड़ों को तह करके बनाया गया था, जिसके भीतर खून सोखने के लिए बालू भर दिया गया था। सुमन की दिक्कत यह थी कि वह इसके इस्तेमाल से इंकार नहीं कर सकी, क्योंकि उसे यह सब काफी शर्मनाक लग रहा था।  

उसे हर सुबह कहा जाता था कि जब तक माहवारी खत्म न हो वह नैपकिन के भीतर रखे बालू को बदलती रहे। एक ऐसे समय में जब सुमन अपने भीतर कई तरह के जैविक और शारीरिक परिवर्तन का अनुभव कर रही थी, वह एक गंभीर इन्फेक्शन (यूटीआई) का शिकार हो गई। इसकी वजह से उसे काफी जलन हो रही थी और बुखार भी हो गया था,लेकिन इस पीड़ा में अपनी बेटी को सिवाय सरकारी अस्पताल ले जाने के उसके गरीब अभिभावक कुछ नहीं कर सके। इस तरह एक ऐसे मां-बाप जो दस रुपए का सैनिटरी नैपकिन भी नहीं खरीद सकते, बेटी के यूटीआई के इलाज के लिए उन्हें 500 रुपए खर्च करने पड़े। वैसे सुमन की कहानी कोई अकेली नहीं है। तीन साल पहले तक बुंदेलखंड के प्राय: सातों जिलों के उन इलाकों में कमोबेश ऐसे ही हालात थे, जहां गरीब और अशिक्षित लोगों की आबादी ज्यादा है।

चूंकि इस पूरे क्षेत्र में गरीबी काफी ज्यादा है और अशिक्षा के साथ स्वास्थ्य और स्वच्छता की गंभीर समस्या है, लड़कियां-महिलाएं आमतौर पर गंदे-पुराने कपड़ों को तह करके बनाए गए सैनिटरी नैपकिन ही इस्तेमाल में लाती हैं। यह कितना अस्वच्छ और अस्वास्थ्यकर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें कोयले की राख, बालू और सूखी मिट्टी भरी जाती है।

माहवारी के दिनों में महिलाओं को जहां रसोई में जाने की मनाही होती है, वहीं वे इस दौरान किसी तरह के धार्मिक या दूसरे उत्सवों में भी नहीं शरीक हो सकतीं। इस पूरे क्षेत्र में माहवारी को लेकर सामाजिक पूर्वाग्रह इतना सख्त है कि इन पांच दिनों के दौरान महिलाओं को एक तरह से समाज-परिवार से बहिष्कृत मान लिया जाता है। स्वास्थ्य और स्वच्छता के मुद्दे पर महिलाओं के साथ इस तरह की उपेक्षा के कारण बुंदेलखंड में करीब 20 फीसद महिलाएं नि:संतान रह जाती हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र में स्त्री-पुरुष अनुपात 835/1000 है और यह देश में लैंगिक अनुपात का सबसे निम्न आंकड़ा है। इस बीच, महोबा में खामोशी के साथ आगे बढ़ी एक क्रांति ने यहां की लड़कियों-महिलाओं को जीवन में बड़ा परिवर्तन लाया। यह सब संभव हुआ माहवारी को लेकर दकियानूसी पूर्वाग्रहों के खिलाफ जागरुकता बढ़ाने की पहल से। इस पहल ने तीन साल पहले सबसे पहले सरजमीं पर तब शक्ल लेनी शुरू हुई, जब महोबा जिले की गरीब लड़कियों-महिलाओं के लिए किफायती सैनिटरी नैपकिन बनाने की एक इकाई शुरू हुई। इसका असर यह हुआ कि जिलाधिकारी डॉ. काजल को यहां की महिलाओं की तकलीफ का एहसास हुआ। नतीजतन उन्होंने 'फिफ्थ इस्टेट’ नाम से चलने वाली स्वयंसेवी संस्था की मदद का फैसला किया। डॉ. काजल ने ग्राम पंचायत अधिकारी अनिल सेंगर को निर्देश दिया कि वे हापुड़ जिले के सोलाना सैनिटरी नैपकिन यूनिट को देखकर आएं और उसके मुताबिक एक बिजनस प्लान तैयार करें, पर सेंगर खाली हाथ लौट आए, क्योंकि सोलाना की यूनिट बंद हो गई थी। महिला जिलाधिकारी ने इस पर भी हार नहीं मानी। उन्होंने सेंगर को कोयंबटूर भेजा, जहां इस तरह की एक इकाई काम कर रही थी। इसके बाद डॉ. काजल ने महोबा में सैनिटरी यूनिट बैठाने के लिए मशीन आदि की खरीद के लिए 3.5 लाख रुपए मंजूर किए, पर इससे पहले कि उनका सपना साकार होता, उनका तबादला कहीं और हो गया। अच्छी बात यह रही कि अब तक इलाके में महिलाओंं की स्थिति में सुधार को लेकर खासी जागरुकता आ चुकी थी। इसीलिए जब नए जिलाधिकारी अनुज कुमार झा आए तो उन्होंने काम को वहीं से शुरू किया, जहां डॉ. काजल छोड़ गईं थीं। उन्होंने एक साल के भीतर महोबा में एक और सैनिटरी यूनिट लगाने के लिए खादी और ग्रामोद्योग आयोग से चार लाख रुपए का एक और लोन मंजूर करा लिया।

इलाके में सैनिटरी यूनिट लग जाने से न सिर्फ महिलाओं को रोजगार मिला, बल्कि उनकी जिंदगी में इससे क्रांतिकारी बदलाव आया। शुरुआत में आठ सैनिटरी नैपकिन के पैक की कीमत महज दस रुपए रखी गई। पर बाद में महंगाई को देखते हुए इसकी कीमत छह नैपकिन के पैक की 15 से 18 रुपए कर दी गई। बढ़े दाम के बावजूद यह बाजार में उपलब्ध दूसरे नैपकिन पैक से सस्ता ही है। दिलचस्प है कि सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली यूनिटों में मैटरनिटी पैड भी बनाए जा रहे हैं। इसके छह पैड की कीमत महज 48 रुपए रखी गई है, जबकि बाज़ार में यह 300-400 रुपए में मिलते हैं।     

सस्ते सैनिटरी नैपकिन और मैटरनिटी पैड की मांग देखते ही देखते बुंदेलखंड के दूसरे जिलों के अलावा सूबे के अन्य हिस्सों से भी शुरू हो गई। जिलाधिकारी अनुज कुमार झा को उनके इस कार्य के लिए राज्य और केंद्र दोनों सरकारों की तरफ से सम्मानित किया जा चुका है। इस सस्ते नैपकिन को 'सुबह’ नाम दिया गया है। 'सुबह’ से महिलाओं की जिंदगी में स्वास्थ्य और स्वच्छता की दृष्टि से परिवर्तन आया ही, उन्हें आर्थिक सबलता भी मिली। इससे अकेले महोबा जिले की सौ से ज्यादा महिलाओंं को रोजगार मिल चुका है। उन्हें जहां हर महीने 3000 से 3500 रुपए की नियमित आय हो रही है, वहीं 23 दिन काम पूरे करने पर 500 रुपए का बोनस भी मिलता है। महोबा से शुरू हुई यह क्रांति आज यूपी से आगे दूसरे सूबों में भी दस्तक दे रही है। गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार, दिल्ली, हरियाणा आदि राज्यों के ग्राम विकास अधिकारी महोबा का दौरा कर चुके हैं, ताकि वे भी अपने यहां के गरीब और उपेक्षित इलाकों में इस तरह के सैनिटरी यूनिट स्थापित कर सकें। 'सुबह’ से महोबा की महिलाओंं की जिंदगी में बड़ा बदलाव कैसे आया, इसे यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और कन्नौज की सांसद डिंपल यादव ने खासी गहराई से अनुभव किया। उन्होंने फिफ्थ इस्टेट की कार्यकारी निदेशक पल्लवी गुप्ता को बुलाकर उन्हें पूरे सूबे के लिए इस तरह की योजना बनाने को कहा। फिफ्थ इस्टेट ने इस बारे में पहले यूपी के मुख्य सचिव और 20 प्रधान सचिवों और मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी के सामने अपनी प्रस्तुति दी। 'सुबह’ की रोशनी देखते ही देखते हर तरफ फैलने लगी और कन्नौज सहित दूसरे पड़ोसी जिलों में इसकी यूनिटें खुलने लगीं। फिलहाल यह योजना सूबे के 65 जिलों में शुरू हो चुकी है। बाकी जिलों को भी जल्द ही इसमें शामिल कर लिया जाएगा।  पल्लवी बताती हैं, एक छोटी कोशिश भी समाज में बड़े बदलाव का सूत्रपात कर सकती है। 'सुबह’ की सफलता इसी बदलाव की दास्तां है, जिसमें स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े कई मामलों में ग्रामीण महिलाओंं ने शहरी महिलाओं को भी पीछे छोड़ दिया है।



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो