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गुरुवार, 16 अगस्त 2018

कैसा हो जन-गण का नया मन

नए भारत का निर्माण महज विकास के तकाजों से नहीं हो सकता, बल्कि हमें अपने देश और समाज की बहुलता की भी हिफाजत करनी होगी

21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिंसक प्रयोगों को आजमाया गया तो इस बदले सूरतेहाल को एक क्रांतिकारी संभावना के तौर पर हर तरफ देखा गया। मीडिया में तो खासतौर पर इसकी चर्चा रही। अमेरिका और यूरोप से निकलने वाले जर्नल्स और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिंग लगीं कि भारत में फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं।

दिलचस्प है कि सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकर्ताओं की जमात भी इस लोक आलोडऩ से अपने को अलग नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के बाद इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।

गौरतलब है कि देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण का जो दौर शुरू हुआ है, उसमें कुछ सवाल और मुद्दे बार-बार उठाए जा रहे हैं। क्या लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है, पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है, तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा रहा है?

ये तमाम वे मुद्दे और सवाल हैं, जो बीते कुछ सालों में जनता के बीच उभरे और खुली बहस का हिस्सा बने। जनता के मूड को देखते हुए या तो ज्यादातर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने इनका समर्थन किया या फिर विरोध की जगह चुप्पी साध ली।

जिन सवालों, सरोकारों और मुद्दों के सामयिक जनतांत्रिक तकाजों से देश की परंपरागत सियासी जमातें ठीक से कनेक्ट नहीं कर पा रही हैं, उसकी वजह एक ही है। यह वजह है 'परिवर्तन’ को लेकर समझ। दरअसल, परिवर्तन कोई फैशनेबल चीज नहीं, जिसे जब चाहे प्रचलन में ला दिया और जब चाहे प्रयोग से बाहर कर दिया। फिर यह टू मिनट नूडल्स भी नहीं कि बस कुछ ही समय में जो चाहा हासिल कर लिया। भारतीय जन-गण का नया मन इस समझ को सबक के रूप में जब तक नहीं लेता तब तक नए दौर की चुनौतियों के बीच वे देश की ताकत और शिनाख्त को ऐसा कोई आधार नहीं दे पाएंगे, जो मुकम्मल और मजबूत तो हो ही, देश-दुनिया की नई ललक और प्रेरणा भी बन सके।



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