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गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

फैसले से बदला जीवन

परिस्थितियों ने डाकू बनाया। बीहड़ की जिंदगी ने पूरे घर को बर्बाद कर दिया। लेकिन वक्त के साथ सोचने का तरीका बदला। आत्मसमर्पण, सजा और फिर समाज में सम्मानजनक वापसी का रास्ता कई डकैतों ने खुद चुना

राजस्थान के धौलपुर जिले का रहने वाला एक किसान रामबाबू गुर्जर। बरीपुरा बसईडांग गांव में इनकी पुश्तैनी जमीन थी। रामबाबू खेती करता और अपने परिवार का निर्वाह करता। उसके परिवार में पत्नी अंगूरी, तीन बेटियां और एक बेटा रुस्तम है। बच्चों को सफल इंसान बनाना उसके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था। रामबाबू की गांव के ही किसी आदमी के साथ लेनदेन को लेकर लड़ाई हो गई। बात मार-पीट तक आ गई। इस लड़ाई में दूसरे पक्ष के एक आदमी हरीलाल के हाथ और पांव दोनों ही टूट गए। विरोधी पक्ष ने रामबाबू के उपर मुकदमा कर दिया। पुलिस रामबाबू को ढूंढ़ रही थी और रामबाबू पुलिस से भाग रहा था।

इस भागम-भाग में खेती-बाड़ी सब छूट गई। जिन बच्चों को अच्छी जिन्दगी देने के लिए वो दिन-रात मेहनत करता था, अब वे हर एक चीज के लिए तरस रहे थे। एक पिता के पास कोई चारा नहीं था कि अपने परिवार और बच्चे को कैसे पाले? मजबूरन रामबाबू ने खर्चों के लिए खदानों से अवैध वसूली शुरू की और खदान मालिकों को चिन्ह देकर वसूली करने लग गया। इसके बाद और पैसे कमाने के लिए वो डकैतों के गिरोह से जुड़ गया। चंबल इलाके में रामबाबू दहशत का पर्याय हो गया। पुलिस ने इनके नाम पर 24 हजार का ईनाम रखा था।

पैसे तो काम लायक थे, पर सुकून नहीं था। जिस परिवार और बच्चे के लिए वो किसान से डकैत बन गया। विडंबना ये हो गई की वो उनके साथ ही समय नहीं बिता सकता था। रामबाबू को इस जीवन से नफरत सी हो गई। एक तरफ उसके ऊपर लगे मुकदमों की फेहरिस्त लंबी हो रही थी, दूसरी तरफ मन का अपराधबोध भी बढ़ रहा था। पत्नी अंगूरी बताती हैं, 'जब मेरे पति डकैत थे तो आए दिन घर पर पुलिस दबिश देती थी। मुझे धमकाती थी। अभद्र भाषा में बात करती थी। इस वजह से जिंदगी बोझ बन थी और मैं बहुत परेशान रहती थी। रात को सोते समय भी ये डर लगा रहता था कि पुलिस न आ जाए। चैन की नींद सो भी नहीं पाती थी’।

आखिरकार रामबाबू ने मजबूत फैसला लिया और पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। मुकदमा चला और उसने  2006 से 2010  तक 4 साल जेल की सज़ा काटी। अपनी सज़ा पूरी करने के बाद जब रामबाबू घर लौटा तो सबकुछ बिखरा हुआ था। जहां खेतों में फसल को संभालना था, वहीं अपने बच्चों की पटरी से उतर चुकी जिंदगी को फिर से पटरी पर लाना था।

इन सब के साथ रामबाबू ने एक और काम शुरू किया, क्षेत्रीय लोक देवता कारस बाबा की भक्ति। रामबाबू कहते हैं, 'जेल में जो सजा काटी उससे कानून ने तो बरी कर दिया, पर दूसरों को नुकसान पहुंचा कर जो पाप हुआ है, उससे तो ईश्वर ही बरी कर सकता है।’  इसी ग्लानि के साथ वो इस तरह ईश्वर में लीन हुआ कि आज डांग के नामी पुजारियों में उसका नाम शुमार हैं।

रामबाबू का बेटा रुस्तम आज एक अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है। जिन्दगी तो कुछ हद तक संभल गई है लेकिन रुस्तम अब भी डरा रहता है। वो कहता है, 'यूपी पुलिस कभी भी पापा को पकड़ लेती है, कहीं कुछ भी घटना घट जाए तो हमारे यहां आ जाती है। कई बार पुलिस पापा को पकड़कर लेकर जा चुकी है। पैसे भी छीन लेती है।’

रामबाबू गुर्जर और इनका परिवार खुश तो है कि वो पाप की दुनिया से बाहर आ चुका है, लेकिन जब वे इस डर से भी बाहर आएंगे तभी जीवन खुशहाल हो जाएगा।

रामबाबू गुर्जर अकेला नहीं है जो इस तरह के बदलाव का गवाह हो। दयाराम मीणा के नाम से आगरा से लेकर चंबल तक लोग कांपते थे। खरौली बड़ा गांव सरमथुरा (धौलपुर) का उपसरपंच दयाराम। गांव के लोगों का इस पर इतना विश्वास है कि लोगों ने इसे निर्विरोध चुना है। दयाराम कहता है की एक समय में लोग उसकी शक्ल देखना भी पसंद नहीं करते थे। उन दिनों को याद करते हुए दयाराम दुखी हो जाता है। पुलिस के डर से भागते रहना पड़ता था। खाना तो दूर की बात है, पीने के लिए पानी तक नसीब नहीं होता था। एक दिन मैं पुलिस से बचते हुए भूखा-प्यासा किसी रिश्तेदार के घर गया, मुझे लगा कि वहां कुछ खाने को मिल जाएगा। अपने रिश्तेदार के यहां जाकर उसने दरवाजा खटखटाया। उसके रिश्तेदार ने खिड़की से उसे देखा और उसकी शक्ल देखकर दरवाजा बंद लिया।

हालांकि सबको पता था कि किन परिस्थितियों में दयाराम डाकू बना था। मुस्कुराते हुए दयाराम याद करते हैं और कहते हैं, '1980 में मैं पुलिस में भर्ती हुआ था, मेरी जिंदगी बहुत अच्छी चल रही थी। तभी करौली के मासलपुर थाने में उसके बहन के ससुर को पुलिसकर्मियों ने झूठे आरोप में पकड़ लिया और पीट- पीटकर उनकी हत्या कर दी।’ इस गलती को छुपाने के लिए शव को लावारिश हालत में सड़क पर फेंक दिया। इस मामले में तत्कालीन हेड कांस्टेबल को सस्पेंड भी किया गया था, लेकिन कुछ समय बाद फिर उसे बहाल कर दिया गया। 

इससे दयाराम बहुत दुखी हुआ। उसे लगा कि कानून से उसे इंसाफ नहीं मिल सकता। वह प्रतिशोध की आग में जलने लगा। खून का बदला खून की भावना के साथ वह बहनोई के साथ डकैत बन गया। इस दौरान उस पर अपहरण, लूटपाट, हत्या और हत्या के प्रयास सहित कुल 12 आपराधिक मुकदमे उसेखिलाफ दर्ज हुए। 2000 में मासलपुर थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया। उस पर कोई भी अपराध साबित नहीं हुआ और वो बरी हो गया। वर्ष 2000 से 2001 तक 13 महीने तक वो जेल में रहा। जेल से बाहर आने के बाद दयाराम की जिंदगी एकदम बदल गई। दयाराम के परिवार में पत्नी मुन्नी देवी, 3 बालिग बच्चे व एक बेटी है, बेटी की शादी हो चुकी है। दो बड़े बेटे चालक हैं और सबसे छोटा एएनएम कर रहा है। गांव के गिरिराज प्रसाद शर्मा बताते हैं, 'दयाराम मीणा बहुत अच्छा इंसान है। गांव में इनका सभी के साथ अच्छा प्रेमभाव है। इसीलिए चुनाव में र्निविरोध रूप से सरपंच चुना गया।

वह बीते 9 वर्ष से मंजरी फाउडेशन के साथ मिलकर बकरी व भैंस पालना और खेती कर रहा है। साथ ही आसपास के आधा दर्जन से अधिक गांव में गाय, भैंस व बकरियों का टीकाकरण करता है। दयाराम कहता है, 'मैंने लोगों को अलग-अलग परिस्थिति में डकैत बनते देखा है। मैं लोगों के जानवरों का ख्याल इसलिए रखता हूं कि सबके पास काम हो, कोई काम या पैसों की कमी की वजह से डकैत न बने।’

यही वजह है कि लोग अब दयाराम को बहुत पसंद करने लगे हैं। डकैती अब उसके लिए एक भूला सपना हो गई है। उसका कहना है कि हम गलत रास्ते पर चल जाते हैं तो इसका भुगतान सिर्फ हमें नहीं हमारे परिवार को भी करना पड़ता है।

सबसे बुरा है डकैत बनना

बातचीत में पूर्व दस्यु दयाराम मीणा व रामबाबू गुर्जर ने बताया कि डकैतों का जीवन बहुत कठिन है। ना समय से खाना, और ना ही चैन की नींद सोना। सोते समय भी पुलिस का भय सताता रहता है। दोनों ने डांग के युवाओं से अपील की है कि यदि जाने-अनजाने या गुस्से में कोई अपराध हो जाए तो पुलिस से भागें नहीं, बल्कि खुद कानून की शरण में पहुंचें। उसके बाद कोर्ट के आदेश मुताबिक सजा काटकर वापस समाज की मुख्य धारा में लौटें, ताकि बाकी जीवन तो परिवार के साथ अच्छी तरह जी सकें। फरार होने के बाद तो कई मुकदमे झूठे भी दर्ज हो जाते हैं। एक मुकदमे से बचने के लिए दर्जनों मुकदमों में आरोपी बन जाते हैं। ये विचार दो डाकुओं के हैं। हालात के साथ इंसान कितना अलग सोचने लगता है। तभी तो गांधी जी ने कहा था कि इंसान कोई बुरा नहीं होता। हालात उसे बुरा बना देते हैं। 



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