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शनिवार, 21 जुलाई 2018

सामाजिक बनो, स्वस्थ रहो

भारतीय समाज में किसी मरीज के लिए दवा के साथ, दुआ की जरूरत बताई जाती रही है। अब यही बात न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडीसिन में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आया है।

अध्ययनकर्ताओं ने सामाजिक सहभागिता का सुझाव दिया है, जिससे मरीजों के स्वास्थ्य में सुधार होगा और उनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी। डॉक्टरों के पास भागने या क्लीनिकों में समय गुजारने की बजाय दोस्त और परिवार के साथ मधुरतापूर्ण संबंध गुजारने से मरीजों की हालत में सुधार हो सकता है। अमेरिका में पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेविड आश ने कहा कि मरीजों के फैसले लेते वक्त अधिकतर उनके पास उनके परिजन अथवा मित्र होते हैं, मसलन मरीज टेलीविजन देखने का फैसला लेता है या घूमने का, रेस्तरां में कैसा आर्डर देता है। आशा के मुताबिक लोग डॉक्टर और नर्सों के बजाए उनसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, जो हर दिन उनके इर्द-गिर्द होते हैं। कारण यह है कि डॉक्टरों और नर्सों से वेे कभी-कभार ही संपर्क करते हैं। इसीलिए संभव है कि उन पर सहज़ विश्वास न जमे। स्वास्थ्य के लिए सामाजिक ताने-बाने के इन नि:शुल्क संवादों का अभी तक ज्यादा फायदा नहीं उठाया गया है। आशा ने कहा कि निजता को लेकर चिंता के चलते अक्सर चिकित्सक अथवा अस्पताल मरीज को सामाजिक तालमेल से रोकते हैं, लेकिन जहां निजता कुछ परिस्थितियों में कुछ मरीजों को लिए जरूरी है, वहीं मरीज अक्सर पसंद करते हैं कि उनके मित्र और परिजन उनके स्वास्थ्य की देखभाल में उनकी मदद करें।



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