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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

कॉन्टैक्ट लेंस से 20 हजार किलो कूड़ा

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आपके खाने में कॉन्टैक्ट लेंस का प्लास्टिक मिला हुआ है? अमेरिका में बिना सोचे समझे लेंस को कहीं भी फेंक देने से यह नौबत आई है।

भागदौड़ की इस दुनिया में हर चीज अब डिस्पोजेबल बनने लगी है यानी एक-दो बार इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया, फिर चाहे चाय कॉफी के कप हों या फिर सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाले दस्ताने। यही हाल कॉन्टैक्ट लेंस का भी है। एक ही लेंस को बार- बार इस्तेमाल करने की जगह अब लोग डिस्पोजेबल लेंस लगाना अमेरिका में लोग बेहतर समझते हैं। जाहिर है कि इनका रखरखाव नहीं करना पड़ता है। इनकी सफाई पर ध्यान नहीं देना पड़ता है। अगर लगाते हुए ये हाथों से फिसल जाएं, तो ढूंढने की भी जरूरत नहीं। क्योंकि ये पानी में घुल जाते हैं, इसीलिए वॉशबेसिन में बस पानी चला देना ही काफी होता है। एक बार इस्तेमाल करने के बाद जब इन्हें बदलने की बारी आती है, तब भी लोग यही करते हैं। या तो इन्हें टॉयलेट में फ्लश कर देते हैं या पानी में बहा देते हैं।
घर में इनसे कूड़ा जमा नहीं होता। इसीलिए ये काफी सहूलियत भरा लगता है। लेकिन समुद्र में इनसे जितना कूड़ा जमा हो रहा हैं, वो हैरान करने वाला है। अमेरिका में कॉन्टैक्ट लेंस पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि अकेले अमेरिका में ही हर साल कॉन्टैक्ट लेंस के कारण 40 करोड़ टूथब्रश के बराबर प्लास्टिक का कूड़ा जमा हो रहा है। क्योंकि ये पानी में घुल सकते हैं, ऐसे में ये समुद्र में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा को तेजी से बढ़ा रहे हैं। प्लास्टिक की किसी भी कण को तब माइक्रो-प्लास्टिक कहा जाता है जब उसका व्यास पांच मिलीमीटर से कम होता है।
एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी में अपने शोध के नतीजे बताते हुए रॉल्ड हैल्डन ने बताया, ‘अमेरिका में हर साल अरबों की संख्या में कॉन्टैक्ट लेंस पानी में बहा दिए जाते हैं। इनसे सालाना 20,000 किलो कूड़ा जमा होता है।’ हैल्डन का कहना है कि उन्होंने खुद अपने व्यस्क जीवन का अधिकतर हिस्सा कॉन्टैक्ट लेंस के साथ बिताया है और उन्हें शोध के लिए प्रोत्साहन भी यहीं से मिला, क्योंकि उनके मन में यह सवाल उठा कि जो कॉन्टैक्ट लेंस फेंक दिए जाते हैं, उनका आखिर होता क्या है।
उन्होंने पाया कि अमेरिका में साल भर में केवल कॉन्टैक्ट लेंस की पैकिंग से ही 1.3 करोड़ किलो कूड़ा जमा हो जाता है। साथ ही रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि कॉन्टैक्ट लेंस इस्तेमाल करने वाले 15 से 20 फीसदी लोग इन्हें टॉयलेट या सिंक में बहाते हैं। सीवेज के साथ ये वॉटर वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट पहुंचते हैं। यहां ये छोटे-छोटे कणों में जरूर टूट जाते हैं लेकिन विघटित नहीं हो पाते हैं।
सीवेज के पानी से खाद बनाने का काम भी किया जाता है। इसका मतलब है कि लेंस का प्लास्टिक खाद में और वहां से खेतों की जमीन और फिर हमारे खाने के अंदर पहुंच जाता है। इसके अलावा जब सीवेज के पानी को समुद्र में बहाया जाता है, तो मछलियां और छोटे समुद्री जीव इस प्लास्टिक को खाना समझ कर खा लेते हैं। इस तरह से ये खाद्य श्रृंखला में पहुंच जाता है। जब इंसान मछली खाते हैं, तो ये प्लास्टिक उनके शरीर के अंदर भी पहुंच जाता है।
ऐसे में हैल्डन और उनकी टीम की सलाह है कि लोग कॉन्टैक्ट लेंस को बहाने की जगह उन्हें अलग से प्लास्टिक के कूड़े के साथ फेंके ताकि उसे रिसाइकल किया जा सके। अपने शोध में उन्होंने यह भी पाया है कि कॉन्टैक्ट लेंस बनाने वाली कंपनियां पैकेजिंग पर ठीक से लोगों को इस बारे में नहीं बताती हैं कि लेंस को बहाना पर्यावरण के लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है। इसे भी बदलने की जरूरत है।



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