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शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

संसद में गांधीगीरी!

भारतीय संसद को गांधीगीरी की बड़ी खुराक की दरकार

 आर सी राजामणि

संसद और सियासत के साझे को अलगाया नहीं जा सकता। संसद, राजनीति से पूरी तरह संलग्न है। आखिरकार संसदीय लोकतंत्र राजनीति से ही तो विकसित हुआ है। इसीलिए दलीय राजनीति से प्रेरित मौखिक हिंसा जब-तब संसद में दिखती रहती है। अलबत्ता भारत में संसद और विधानसभाओं में हालिया दशकों में इससे आगे शारीरिक हिंसा की घटनाएं आम हो गई हैं। ऐसे में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या अगर आज गांधी जीवित होते तो वे मौजूदा सूरत को देखकर नहीं मानते कि देश को संसदीय लोकतंत्र के लिए तैयार हुए बगैर और जनप्रतिनिधियों में जिम्मेदारी की पर्याप्त अहसास हुए बगैर स्वाधीनता मिल गई। अपने-अपने तर्क और तकाज़ों के बीच मामूली अंतर के साथ बहुत सारे लोगों का यह मानना है कि भारतीय संसद को गांधीगीरी की बड़ी खुराक की दरकार है। खासतौर पर हालिया दशकों में जिस तरह से संसदीय आचरण प्रकट हुआ है। साफ है कि गांधीगिरी की यह दरकार अहिंसा और सत्य के साथ गांधीवादी मूल्यों से जुड़ी है। दरअसल, 'गांधीगीरी’ शब्द तब से लोकप्रिय हो गया, जब 'लगे रहो मुन्नाभाई’ फिल्म आई। ऐसा नहीं कि हमारी संसद गांधीगीरी से शुरू से अपरिचित रही है। खासतौर पर आज़ादी के बाद के पहले दशक या यों कहें कि जब से भारत ने संसदीय लोकतंत्र को अपनाया उसके शुरुआती कुछ सालों में संसद में गांधीगीरी की कई मिसालें देखने को मिलीं। यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद से गांधीगीरी किस तरह विदा होती गई और आज ऐसी सूरत है कि हम इसकी दरकार को लेकर बातें करने पर मजबूर हैं। शुरुआती सालों में संसद में कई अहम और संजीदा आवाजें गूंजा करती थीं। आचार्य कृपलानी, एचवी कामथ, टीए पई, ज्योर्तिमय बसु, जाअचिम अल्वा, एके गोपालन, एनजी रंगा, मीनू मसानी, पीलू मोदी और इंद्रजीत गुप्ता ऐसे ही कुछ नामों में से हैं। इन नामों के अलावा संसद में जवाहरलाल नेहरू, गोविंद वल्लभ पंत और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की गरिमामय मौजूदगी तो थी ही। इन तमाम सदस्यों की उपस्थिति और शिरकत से न सिर्फ संसदीय गरिमा ऊपर उठती थी, बल्कि बहस का स्तर भी काफी बढ़ जाता था। इस कारण आचरण और बातों में उनकी अन्य सदस्यों के प्रति सम्मान भी दिखता था। आज भी इस बात की मिसाल दी जाती है कि इंदिरा गांधी और पीलू मोदी राजनीतिक रूप से एक दूसरे घोर विरोधी थे, फिर भी संसद में बहस के दौरान उन्होंने शायद ही कभी एक-दूसरे पर कोई निजी आक्षेप किया हो।

लोकसभा के पूर्व महासचिव और संसदीय मामलों के विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ऐसे कई अनुभवों के बारे में में कुछ साल पहले लिखे एक आलेख में बताया था। वे कहते हैं कि उस दौर में संसद में कई ऐसे सदस्य थे जो संसदीय आचरण और बहस में इतने दक्ष थे कि वे दुनिया के जिस किसी भी देश के संसद में होते, उनकी मौजूदगी और शिरकत से उसकी गरिमा बढ़ती ही।



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