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शुक्रवार, 22 जून 2018

चिर युवा विवेकानंद

देश में युवा शक्ति की पहचान और उस पर अखंड आस्था पहली बार विवेकानंद ने प्रकट की थी। इसी वजह से उनके जन्म दिन 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज देश की 65 प्रतिशत आबादी युवा है

गुलामी भी कोई एक किस्म की नहीं, राजनीतिक भी, आर्थिक भी, नैतिक भी, वाह्यï भी, आंतरिक भी। ऐसे में प्रधान सेंटिमेट क्या हो सकता था-मुक्तिकी तड़प, निष्कृति की छटपटाहट! मुक्ति के इन्हीं सार्थवाहों की अग्रिम पंक्ति की इन्हीं मशालों में एक मशाल थे स्वामी विवेकानंद।

मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त। पिता विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य प्रेमी पर पुत्र....? पुत्र को अभी बहुत बड़ी भूमिका निभानी थी।

प्रख्यात जर्मन कवि रोम्या रोलां ने उन पर बेशक सबसे सटीक टिप्पणी की थी,'उनके बचपन और युवावस्था के बीच का काल यूरोप के नवजागरण काल के किसी कलाकार राजपुत्र के जीवन प्रभात का स्मरण दिलाता है।’

नरेंद्र के अंदर विद्यमान इसी छटपटाहट ने उन्हें खुद से बाहर आने को प्रेरित किया-निष्क्रमण!

इक्कीस साल के थे कि पिता दिवंगत हो गए और पूरे परिवार के भरण-पोषण का दायित्व युवा नरेंद्र पर आ गया। दायित्व निर्वहन के साथ-साथ वह बेचैनी उन्हें चैन न लेने देती। उन्होंने दर्शनों का अवगाहन किया, वेदांत खंगाल डाले। यदि ईश्वर है तो वह क्या है, कैसा है? यदि ईश्वर है तो उसकी निर्मित यह सृष्टिï ऐसी क्यों हैं? 16 वर्ष की वय। कलकत्ते के किशोर नरेंद्र हारबर्ट स्पेंसर के नास्तिकतावाद की ओर झुक रहे थे। उधर रूढिय़ों से मुक्त आध्यात्मकी नई-नई राहें निकल रही थीं- 'प्रार्थना सभा’, 'ब्रह्मï समाज’, 'आर्य समाज’, 'थियोसोफिकल सोसायटी’ आदि-आदि। उन दिनों वे निरीश्वर, भौतिकवाद और आस्तिकता के गहरे द्वंद्व से गुज़र रहे थे। ऐसे में एक दिन प्रख्यात मिथकीय काली भक्त ठाकुर रामकृष्ण से उनकी भेंट हुई। गुरु ने शिष्य को पहचाना, शिष्य ने गुरु को। गुरु यद्यपि मिथकीय पुरुष होकर बंगाल और भारत के घर-घर में विख्यात हो रहे थे, पर युवा नरेंद्र को उनके किसी चमत्कार से अलग उनके आध्यात्मिक औदार्य में जीवन की निधि-मिल गई थी कि संपूर्ण मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना ही हमारा काम्य होना चाहिए। और कोई होता तो चमत्कारों और अंधविश्वासों में ही उसकी प्रतिभा गर्क हो गई होती, पर विवेकानंद तो विवेकानंद थे। उन्होंने अंधविश्वासों से परे रेशनलिस्ट परमहंस के दिव्य आलोक को ग्रहण किया। अपने देश के दीन-हीन जन को जानने की बेकली की इन्तहां यूं कि लगभग पैदल ही गांव-गांव भटकते रहे। पूरे देश का भ्रमण किया। उनके लिए जैसे बड़ौदा महाराज का राजमहल, वैसे ही फकीर का झोपड़ा। जैसे कोल्हापुर स्टेट, वैसे ही अस्पृश्य की कुटिया।

सन् 1893 के शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में विवेकानंद का दिया गया व्याख्यान सर्वथा ऐतिहासिक था। संबोधन ही अपने आप में विश्वबंधुत्व और आत्मीयता की संजीवनी फूंक रहा था-

'सिस्टर एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका...’

वह 11 सितंबर का दिन था। पश्चिम के जो लोग भारत को सपेरों, फकीरों, मदारियों और जादूगरों का देश मात्र समझते थे, पहली बार किसी भारतीय और भारतीयता का जादू उनके सिर पर चढ़ कर बोल रहा था। सभा में उपस्थित 7000 प्रतिनिधि मंत्र मुग्ध! हर युवाकी तरह विवेकानंद एक निरंतर विकसित होती हुई प्रतिभा का नाम था। उनके लिए भारत की स्वाधीनता, इसके दीन-दुर्बल करोड़ों भारतीयों की दैन्य मुक्ति एवं अंधश्रद्धा मुक्ति, देश का सतत ऊर्जस्वित बने रहना-अलग-अलग चीजें न थीं, बल्कि एक ही लक्ष्य प्राप्ति की अलग-अलग राहें थीं-अक्सर कहते-'मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूं। न तो संत या दार्शनिक ही हूं, मैं तो गरीब हूं और गरीबों का अनन्य भक्त हूं। मैं तो उसे ही सच्चा महात्मा कहूंगा, जिसका हृदय गरीबों के लिए तड़पता हो।’ यूरोप और अमरीका के कई महानगरों से लेकर अपने देश में अपने व्याख्यानों से लाभान्वित करते हुए 1897 में भारत लौटे तो अभूतपूर्व स्वागत हुआ। उन्होंने सदियोंकी तंद्रा त्याग कर भारतवासियों की नए आत्मविश्वास से उठ खड़े होने तथा दलितों और महिलाओं को शिक्षित करने समेत उनकी सर्वांगीण उन्नति के लिए काम करने का आह्वïान किया। पश्चिम के कई विद्वान उनसे आकर्षित हुए-निकोलस टेसला, सारा बर्न. हार्ड, नेल्सन राकफेलर, लिओ टॉल्सटॉय, रोम्या रोलां, भारत में भी सुभाष चंद्र बोस, अरविन्द घोष, जमशेदजी टाटा, रवींद्र्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी। सदियों की घोर निद्रा त्याग कर देश नवजागरण की अंगड़ाई ले रहा था।

विवेकानंद उसके अग्रणी पुरोधा थे। उन्होंने योग पर तीन पुस्तकें लिखीं-योग, राजयोग, ज्ञानयोग 1 मई 1897 को कलकत्ते में उन्होंने रामकृष्ण मिशन और 9 दिसंबर 1898 को बेलूर में मठ की स्थापना की। आज रामकृष्ण मिशन की पूरी दुनिया में 130 शाखाएं हैं, शिक्षा के क्षेत्र में भी आर. के. मिशन अग्रणी रहा है। कन्याकुमारी में निर्मित विवेकानंद स्मारक लहरों के थपेड़ों के बीच आज भी अविचल खड़ा है।  4 जुलाई, 1902 को बेलूर मठ में ही वे समाधीन हो गए। पर युवा भारत के प्रतीक के रूप में सदा अमर रहेंगे। गुरूडमवाद से पीडि़त भारत ने इस युवा संन्यासीकी वाणी में वेदांत की दीप्ति के साथ-साथ नए भारत के निर्माण के संकल्प देखे। यह नए भारत की नई अंगड़ाई थी। कोशिका, कोशिका चटक रही थी, तंतु-तंतु खुल रहे थे-नया अंदाज, नया आगाज़-

'हिंदू और मुसलमान भारत माता की दो आंखें हैं।’

'गीता पढऩे की अपेक्षा मैं युवाओं को फुटबॉल खेलने को कहूंगा।’ (ताकि वे बलिष्ठï हों।)

जिन दिनों देश में स्वराज को लेकर बहुतेरे नेता भ्रांति के शिकार थे, विवेकानंद निर्भांत थे। 19 नवंबर, 1894 को न्यूयार्क से ही मद्रास के आत्मा सिंह पेरुमल को पत्र लिखा, 'हमारे कुछ युवा ब्रिटिश से आजादी के लिए मीटिंग करते हैं। वे जो दूसरों की आज़ादी नहीं चाहते, उन्हें खुद आजादी पाने का क्या अधिकार है? कल्पना करो, अंग्रेज़ों ने तुम्हें अधिकार दे दिए। अधिकार पाकर तुम और भी शक्तिशाली हो जाओगे और शक्तिशाली होकर तुम गरीबों पर पहले से ज्यादा अत्याचार करने लगोगे।’

अक्सर एक कहानी कहते-

'एक गांव में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई परम धार्मिक, छोटा किसान। हिमालय में बारह वर्ष तक साधना करने के उपरांत बड़ा भाई घर लौटा तो छोटे ने पूछा, 'हिमालय में क्या करते रहे बारह वर्षों तक भैयाï?’ बड़े ने सगर्व बताया, मैंने तपस्या कर सिद्धियां प्राप्त कीं।’

'कैसी सिद्धि?’

'मैं सामने के इस तालाब को नंगे पांव पार कर सकता हूं, देखोगे? ‘ कह कर बड़े ने योग से तालाब को पार कर दिखा दिया, देखा?’

छोटे ने हैरानी जताते हुए कहा, 'हाय भैया! तालाब को पार करने की इसी सिद्धि में तुमने जीवन के बारह अमूल्य वर्ष गंवा दिए। इसे तो मैं मिनटों में पार कर सकता हूं, बिना किसी मंत्र के।’ उसने काठ की नाव बनाई और पार कर गया।

कुल जमा 39 वर्ष की आयु ही तो मिली थी विवेकानंद (12 जनवरी, 1863-4 जुलाई 1902)को वह भी मुकम्मिल नहीं। आखिर तक दमा और शर्करा और दूसरी व्याधियों से आक्रांत होकर रह गए। ज्यादा दिन जी लेते तो क्या होता-एक जीर्ण-शीर्ण कंकाल। कुल यही छवि बन कर रह जाती न! और ऐसे वह तन से, मन से दृष्टिï से हर तरह से एक तेजस्वी युवा की है। हजार-हजार वर्षों के क्लीव जीवन से यौवन का एक तेजोदीप्त मुहुर्त ही श्रेयस्कर! अश्वघोष की प्रभा की तरह ही चिरयुवा बने रहेंगे विवेकानंद हमारी यादों में।



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