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मंगलवार, 20 नवंबर 2018

कैलेंडर में पुरानी बावडिय़ां

देश की राजधानी की सदियों पुरानी बावडिय़ों की ओर लोगों का ध्यान खींचने और उनकी पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाने के लिए दिल्ली विधानसभा और विरासत कार्यकर्ताओं ने एक थीम आधारित कैलेंडर निकालने के लिए हाथ मिलाया है। दिल्ली में 20 से अधिक बावडिय़ां हैं।

इनमें से अधिकतर बावडिय़ां जमीन के अंदर दब गई हैं या इसके आसपास बन चुके आधुनिक ढांचों के कारण कहीं खो-सी गई हैं। मध्य दिल्ली से लेकर दक्षिण दिल्ली तक फैली ये बावडिय़ां कई सदियों से निवासियों में उत्सुकता जगाती रही हैं, लेकिन इनमें से कई जागरुकता एवं संरक्षण के अभाव में गुमनामी में कहीं खो गई हैं। जाने-माने विरासत कार्यकर्ता सोहेल हाशमी ने बताया, 'दिल्ली विधानसभा 2017 के लिए विरासत की थीम पर आधारित एक कैलेंडर लाना चाहती थी। इसलिए मैंने उन्हें बावडिय़ों को थीम बनाने का सुझाव दिया। हमने अंतत: इसके लिए 12 बावडिय़ां चुनीं। इनमें कनॉट प्लेस के पास स्थित उग्रसेन की बावड़ी से लेकर महरौली स्थित राजाओं की बावडिय़ां शामिल हैं।’ उन्होंने कहा, 'मूल उद्देश्य उन युवाओं को अपनी विरासत के करीब लाना है, जिनमें से कई या तो सिर्फ  मॉल और मल्टीप्लेक्स जाते हैं या फिर बावडिय़ों के महत्व को समझे बिना ही वहां घूमने जाते हैं।’ हाशमी ने इस कैलेंडर के लिए सिद्धांत और लिखित सामग्री दी है, जबकि शहर के युवा विरासत प्रचारकर्ता और छायाकार विक्रमजीत सिंह रूपराय ने तस्वीरें दी हैं। विक्रमजीत ने कहा, 'जल संरक्षण की इन प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए यह एक बड़ा विचार है, लेकिन इन्हें इस्तेमाल में बनाए रखने के लिए भी कदम उठाए जाने चाहिए, नहीं तो यह मच्छरों के पनपने की जगह बन जाएंगी।’



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