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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

मोदी-ओबामा की लीक

महात्मा गांधी जहां एक तरफ बराक ओबामा जैसे राजनेता के प्रेरक पुरुष हैं, वहीं नरेंद्र मोदी जैसे उत्साही राजनेता उनसे प्रेरणा लेकर अपनी कार्यशैली और योजनाओं की प्राथमिकता तय करते हैं

गांधी शांति प्रतिष्ठान देश में गांधी के बाद गांधी विचार और कार्यक्रम का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा। खासतौर पर साठ और सत्तर के दशक में यह कई तरह के गांधीवादी गतिविधियों का नियामक केंद्र रहा। नई दिल्ली स्थित इस प्रतिष्ठान में गांधी व्याख्यानमाला के तहत दो अक्टूबर 2005 को वरिष्ठ आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने एक चर्चित व्याख्यान दिया था। विषय था-मजबूती का नाम महात्मा गांधी। उन्होंने इस संबोधन में खास तौर पर रेखांकित किया था कि तमाम तरह की दुविधाओं और नैतिक स्फीति के बीच गांधी का जीवन और विचार एक प्रकाशस्तंभ की तरह है। इस प्रकाशस्तंभ ने बीती एक सदी में देश-दुनिया में राजनेताओं से लेकर आम लोगों तक सबको मानवीय स्पंदन से जोड़े रखने में रचनात्मक भूमिका निभाई है। मौजूदा समय की बात करें तो गांधी के साथ जिन दो राजनेताओं को जोड़कर सबसे ज्यादा देखा जाता है, वे हैं नरेंद्र मोदी और बराक अबामा।

   अलबत्ता जिन लोगों के लिए इस मुद्दे पर बहस में शिरकत महज इसीलिए दिलचस्प है कि इसमें दो बड़े राजनेताओं के नाम शामिल हैं, तो वे शायद ही इस समझ के लिए तैयार हों कि हम इस बहाने जीवन, विकास और राष्ट्र निर्माण को लेकर आत्मावलोकन करें। कुछ दिन पहले जब देश के बड़े पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का निधन हुआ तो उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए हिंदी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने उनके लेखन में गांधीवादी सौंदर्यशास्त्र की बात की। दरअसल, जीवन और सौंदर्य के बीच मानवीय चिंता का शायद ही ऐसा कोई मुद्दा हो, जिन्हें गांधी ने अपने समय में न छुआ हो और जिन पर विचार और कार्यक्रमों का संदर्भ तारीखी तौर पर न मिलता हो। लिहाजा, गांधी के जीवन और उससे जुड़े आचार-विचार का सत्याग्रह अपने आप में है ही इतना व्यापक कि सकारात्मकता के साथ खुद के लिए तथा समाज और राष्ट्र के लिए सोचने-करने वालों को गांधी स्वाभाविक रूप से आकर्षित करेंगे।  

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जब अमेरिका गए तो राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए गांधी का गीता भाष्य ले गए। दिलचस्प है कि ओबामा भी अपने भारत दौरे के दौरान अपने गांधी प्रेम को भावनात्मक रूप से जाहिर करना नहीं भूले थे। दरअसल, जिन दो कारणों से मोदी और ओबामा जैसे राजनेता गांधी को नहीं भूलते या उन्हें याद रखना जरूरी मानते हैं, वे हैं गांधी की वह क्षमता जो साधारण को असाधारण के रूप में तब्दील करने व होने की प्रेरणा देता है और वह पाठ जो विश्व को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए निर्णायक तौर पर जागरूक होने की जरूरत बताता है। वर्ष 2008 के शुरुआत में जब ओबामा राष्ट्रपति पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे थे तो उन्होंने एक लेख में लिखा, 'मैंने महात्मा गांधी को हमेशा प्रेरणास्रोत के रूप में देखा है क्योंकि वह एक ऐसे बदलाव के प्रतीक हैं, जो बताता है कि जब आम लोग साथ मिल जाते हैं तो वे असाधारण काम कर सकते हैं।Ó 2015 में अपनी भारत यात्रा की शुरुआत में उन्होंने एक बार फिर गांधी को भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का हीरो बताया।

बात करें देश के मौजूदा प्रधानमंत्री की तो नरेंद्र मोदी निश्चित रूप से ऐसे विचार और संस्कार से आते हैं, जहां गांधी को लेकर एक दुविधा की स्थिति शुरू से रही है। पर तारीफ करनी चाहिए इस राजनेता की कि कम से कम बीते तीन सालों में वे अपनी समझ और विचार को गांधीवादी टेक देते लगातार दिखे हैं। स्वच्छता से लेकर खादी तक तमाम ऐसे कार्यक्रम और विचार हैं, जिसको लेकर प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी आगे बड़े हैं। ब्रांडिंग और इमेज मार्केटिंग के दौर में उनकी इस पहल से गांधी और भारत की साझी पहचान दुनिया में नए सिरे से बहाल हुई है।

पिछले साल ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी समेत दक्षिण अफ्रीका, चीन, रूस और ब्राजील के नेताओं की खादी की जैकेट पहने तस्वीर खासी चर्चा में आई थी। गांधी विचार को लेकर शुद्धतावादी आग्रह रखने वालों को लग सकता है कि इस तरह से गांधी की खादी का कोई भला नहीं हो सकता। पर बाजार और उपभोग के दौर में अगर खादी को प्रोडक्शन और सेल के दबावों से उबरना है तो रास्ता वही है जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चल रहे हैं। जिन लोगों को भी इस तरीके से मौलिक एतराज है, उन्हें बाजार के खिलाफ गांधी को विचारोल्लेख से आगे नीति, योजना और कार्यक्रम में स्थान देने का ब्लूप्रिंट दुनिया के सामने रखना चाहिए। अन्यथा गांधी को लेकर बातें जरूर बड़ी-बड़ी होती रहेंगी, पर उनका हमारे जीवन और सलूक से नाता दिनोंदिन कमजोर ही पड़ता जाएगा।

कमाल की बात यह है कि अगले दो सालों में देश में गांधी की चर्चा और उनको लेकर कार्यक्रमों में और बढ़ोतरी होने वाली है। गांधी ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे पहले बड़ी सफलता चंपारण आंदोलन से पाई थी। यह 1917 से 1918 के बीच चला था। इस आंदोलन के 100 साल पूरे होने जा रहे हैं। इस पर नीतीश कुमार ने चंपारण और पटना में बहुत बड़ा ग्लोबल आयोजन कराने का फैसला लिया है। जानकारी के अनुसार अगले कुछ दिनों में बिहार सरकार एक बड़ी कमेटी का गठन करेगी जो इस ग्लोबल आयोजन की तैयारी शुरू करेगी। बताया जा रहा है कि बिहार के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा आयोजन होगा। इसमें गांधीवादी विचारों से प्रभावित विश्व के बड़े नेताओं को बुलाने का विचार किया जा रहा है। जो खबरें आ रही हैं, उसके मुताबिक अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, म्यांमार की प्रमुख आंग सान सू की और कई दक्षिण अफ्रीकी नेताओं को न्योतने की तैयारी है।

 चंपारण सत्याग्रह की तरह ही 2019 में गांधी की 150वीं जयंती को मोदी सरकार 2018 से 2019 के बीच बड़े पैमाने पर मनाने जा रही है। इसके लिए कई कमेटियां पहले ही बन चुकी हैं। जो लोग नमो के काम करने के तरीके को जानते हैं, उन्हें मालूम है कि वे इस आयोजन के फलक को कितना ऊंचा ले जाएंगे।

एक ऐसे समय में जब नेतृत्व, विचार और कार्यक्रम की लोक स्वीकृति का आधार काफी तात्कालिक हो गया है, सार्वजनिक जीवन और व्यवहार में गांधी की मौजूदगी बढऩा सार्वजनिक चिंता और शुचिता के सवाल को मानव कल्याण से तो ईमानदारी से संलग्न करेगा ही, इसके अमल को भी काफी हद तक खरा होने का भरोसा इससे पैदा होगा।



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