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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

तुम आना इस देश लाडो

नोटबंदी, दंगल और ड्रीम- इन तीनों के साथ हम नए साल में प्रवेश कर रहे हैं। नोटबंदी काला धन और भ्रष्टïाचार के खिलाफ लड़ाई है, तो दंगल बेटियों के गौरव की कहानी। नए साल में इन दोनों के सहारे ही देश में विकास की नई इबारत लिखी जाएगी

म्हारी छोरियां छोरों से कम सै के?  आमिर खान अभिनीत फिल्म 'दंगल  के पोस्टर पर लिखा यह वाक्य हरियाणा में खराब लिंगानुपात की समस्या के प्रति ध्यान आकृष्ट करने के लिए पर्याप्त है। फिल्म हरियाणा के भिवानी जिले के महावीर फोगट के जीवन की कहानी पर आधारित है। फोगट रुढि़वादी समाज की सोच के खिलाफ  अपनी बेटियों-गीता और बबीता- को कुश्ती लडऩे के लिए तैयार करते हैं, उन्हें प्रशिक्षण देते हैं। जब बेटियों ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिताओं में सफलता अर्जित की, तो इसे हेय दृष्टि से देखने वाला समाज इस पर गर्व महसूस करने लगा। अब लड़कियों के कुश्ती लडऩे पर कोई सवाल नहीं उठाता, उल्टे उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह उस राज्य में घटित हो रहा है, जहां लिंगानुपात भयावह स्तर पर गिर चुका है। बाल लिंगानुपात (0-6) की दृष्टि से हरियाणा बिल्कुल निचले पायदान पर है, जहां एक हजार पुरुषों पर 834 महिलाएं हैं। लेकिन 'दंगल  फिल्म बदलते हरियाणा का परिचायक है।

समाज की दकियानूसी सोच

 

भारतीय समाज में महिलाओं को भले ही देवी माना जाता हो, लेकिन सदियों से वे शोषित-पीडि़त रही हैं। पर्दा प्रथा, सती प्रथा जैसी बुराइयों की मार महिलाओं को ही झेलनी पड़ी है। लेकिन समय बदल रहा है। इस लिहाज से 21वीं सदी को उम्मीद की नजर से देखा जा रहा है। लेकिन अगर बाल लिंगानुपात को सामाजिक विकास का सूचक माना जाए, तो यह चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। भारत में 2001 में बाल लिंगानुपात 927 था, जो 2011 में घटकर 918 पर पहुंच गया। दुनिया के किसी देश में ऐसा नहीं देखा जाता। यह देश के आर्थिक विकास के सामाजिक पहलू पर एक सवाल खड़ा करता है। आखिर महिलाओं के सामाजिक उत्थान में भारत क्यों पिछड़ रहा है?

दरअसल, इसके लिए समाज की सोच जिम्मेदार है। महिलाओं को पुरुषों की तुलना में हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है। यह आम तौर पर माना जाता है कि वंश परंपरा लड़कों के कारण ही कायम रहती है। इसीलिए पुत्र का होना जरूरी है। जब समाज की ऐसी सोच हो, तो पुत्र-प्राप्ति के लिए वह तमाम तरह का उपाय अपनाएगा। ऐसे में लिंग जांच कराना, मादा भू्रण हत्या, परिवार में लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा-चिकित्सा में भेदभाव जैसी कुप्रवृत्तियों का विकास होना लाजि़मी है।

जाहिर है कि इसके लिए पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता उत्तरदायी है, जो लैंगिक समानता को आज भी सहज भाव से स्वीकार नहीं करती। पर इसके नतीजे कम घातक नहीं हैं। बेटों को शादी के लिए लड़की नहीं मिलती, तो उसके लिए तस्करी का सहारा लिया जाता है। न केवल महिलाओं के खिलाफ  अपराध में बढ़ोतरी होती है, बल्कि आर्थिक विकास की रफ्तार भी बाधित होती है। अगर स्त्री-पुरुष सामाजिक बंदिशों से मुक्त होकर साथ-साथ काम करें, तो विकास को गति मिलना स्वाभाविक है। इस परिप्रेक्ष्य में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ  योजना समय की मांग है। हालांकि सरकार ने इसकी घोषणा अक्टूबर, 2014 में ही कर दी थी, लेकिन इसकी औपचारिक शुरुआत 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत में की गई। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने देशवासियों से भावुकता पूर्ण अपील करते हुए कहा था कि वे एक भिक्षुक के रूप में बेटियों का जीवन मांगने आए हैं।

नई कहानी लिखता अभियान

 

इस अभियान को जमीन पर उतारने के लिए सरकार विभिन्न स्तरों पर सक्रिय है। इसके तहत एक उपाय प्री-कंसेप्शन एंड प्री-नटल डायग्नोस्टिक टेकनीक (पीसी एंड पीएनडीटी) एक्ट को कारगर तरीके से लागू करना है। इसके अलावा राष्ट्रव्यापी जागरुकता अभियान भी चलाया जा रहा है। इसके लिए देश के 100 जिलों (अब 161) का चयन किया गया, जहां बाल लिंगानुपात खराब है। इसमें लोगों की मानसिकता में बदलाव लाने पर काफी जोर है। यह योजना तीन मंत्रालयों-महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय-की संयुक्त पहल से क्रियान्वित की जा रही है।

'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ  अभियान की रणनीति के मूलत: तीन हिस्से हैं- मादा भू्रण हत्या रोकना, लड़की के जीवन की सुरक्षा और लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करना। सरकार ने उन डायग्नोस्टिक सेंटर के इर्द-गिर्द शिकंजा कस दिया है, जहां गैर-कानूनी तरीके से लिंग की जांच की जाती है। जिला एवं प्रखंड स्तर पर योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। समुदाय को जागरूक बनाने के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों की मदद ली जा रही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का लड़कियों के पंजीकरण और ड्रॅाप-आउट पर विशेष ध्यान है।

दूरगामी प्रभाव

यह अभियान अभी से अपना असर दिखाने लगा है। जिस हरियाणा में इस योजना की शुरुआत हुई थी, उसी हरियाणा में इसके परिणाम सामने आगे लगे हैं। हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने यह स्वीकार किया कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ  कार्यक्रम के तहत चलाए गए जागरुकता अभियान के कारण राज्य के 18 जिलों में लिंग अनुपात में पर्याप्त सुधार दिखाई पड़ रहा है। 12 जिलों में लिंग अनुपात 900 से भी ज्यादा हो गया है। पंजाब के मनसा जिले में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक पहल की गई। 'उड़ान-सपनेया दि दुनिया के रूबरू  स्कीम के तहत मनसा प्रशासन ने कक्षा छह से बारहवीं तक की छात्राओं से प्रस्ताव आमंत्रित किया है। इन छात्राओं के पास मनोवांछित पेशेवरों-डॉक्टर, पुलिस अधिाकरी, इंजीनियर, आईएएस अधिकारी के साथ एक दिन साथ रहने का अवसर होगा। अंतत: यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ  योजना हमारे समाज की बुनियादी समस्या-पुरुष प्रधानता-की तरफ  देश का ध्यान खींचने में सफल रही है। वर्षों से इस व्यवस्था ने यह सुनिश्चित किया है कि महिलाएं हाशिए पर रहें। लेकिन इस अभियान ने इसमें सेंध लगाना शुरू कर दिया है। वह दिन दूर नहीं, जब हर बाप 'दंगल  के आमिर खान की तरह अपनी बेटियों पर गर्व करता दिखेगा और यह कहेगा, 'म्हारी छोरियां छोरों से कम सै के?

 



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