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रविवार, 23 सितंबर 2018

महात्मा @ इंटरनेट

गांधी को कई बार विज्ञान और तकनीक विरोधी बताने की कोशिश होती रही है, जबकि गांधी अपने समय में इन मामलों में काफी आधुनिक सोच और अमल के आदमी थे। वरिष्ठ विचारक सुधींद्र कुलकर्णी ने इंटरनेट के दौर में गांधी विचार की नए सिरे से प्रस्तावना को पुस्तकाकार रूप दिया है। पुस्तक के संपादित अंश-

अगर गांधी के सत्य का सबसे रहस्यमय पहल विज्ञान और तकनीक के प्रति उनका दृष्टिकोण है। आम तौर पर उनके प्रशंसक और विरोधी दोनों ही यह मानते हैं कि वे विज्ञान, तकनीक, मशीनों और आधुनिकता के विरोधी थे। इस वक्त हम इतिहास में तकनीकी रूप से सबसे ज्यादा उन्नत युग में रह रहे हैं। वैश्विक समुदाय के कुछ हिस्सों की अतुल्य भौतिक समृद्धि, जिसे बाकी भी बेसब्री से पाना चाहते हैं, के मुख्य कारण भी यही हैं। इसने लोगों को यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि गांधी, जो कि खादी, ग्रामोद्योग और अधिकतम स्थानीय स्वनिर्भरता पर बल देते थे, आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मदद से संभव हुए विकास के प्रवाह का प्रतिरोध कर रहे हैं। अत: प्रौद्योगिकी द्वारा हो रहे विकास के मापदंड पर उनके प्रशंसक और आलोचक उन्हें वर्तमान में अप्रासंगिक पाते हैं।

लेकिन क्या गांधी वाकई औद्योगीकरण और आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के खिलाफ थे? क्या वे, जैसा कि कुछ आलोचकों का मानना है, विकास के मुद्दे पर अपने असाधारण विचारों से भारत को पुन: अंधकार युग में ले जाना चाहते थे? या तो वह द्रष्टा थे, जिन्होंने सतत विकास की राह में समुपस्थित संकट का, जिसे भारत और विश्व अभी झेल रहा है-न केवल पूर्वकथन किया, बल्कि विकास का एक वैकल्पिक रास्ता दिखाया, जो कि जन समर्थक, पर्यावरण का रक्षक और मानवीय विकास को अगले चरण तक पहुंचाने वाला था? क्या विज्ञान, अर्थशास्त्र और नीति को साथ लेकर चलने पर जोर देने से वे आदर्शवादी थे या उनका यह जोर देना एक चुनौती थी, जिस पर खतरा मोल लेते हुए विश्व ने ध्यान नहीं दिया? क्या इंटरनेट को जो कि शायद मनुष्य जाति की सबसे बड़ी प्रौद्योगिकी अनुसंधान है, उससे बचते हैं या उसे स्वीकार करते हैं?

जितना मैं इस विषय में गहराई से चिंतन करता गया, उतना मेरा विश्वास बढ़ता गया कि गांधी बिल्कुल भी आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के खिलाफ नहीं थे। इस पुस्तक का मकसद भ्रांतियों के पहाड़ को नष्ट करना है जो कि गांधी के निधन के छह दशक बाद भी टिके हुए हैं। यह सिर्फ यह दर्शाने के लिए नहीं है कि खादी और चरखे की नैतिक सांकेतिकता की 21वीं सदी में अटल प्रासंगिकता है, बल्कि यह भी स्वयंसिद्ध है कि इंटरनेट और बाकी सभी डिजिटल युग की प्रौद्योगिकी, जिन्हें इससे मदद मिलती है-के पास वह क्षमता है कि वह गांधी का सपना पूरा कर सके, जिसे वे चरखे द्वारा प्राप्त करना चाहते थे : एक नई अहिंसक, अंत:निर्भर, सहयोगी, टिकाऊ और नैतिकता से निर्देशित विश्व व्यवस्था।

अपने अध्ययन में मैंने पाया कि आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास, जिसका इंटरनेट समूचे विश्व में सबसे ज्यादा उपयोग किया जाने वाला उपाय है, उसी दिशा में अग्रसर है, जिसमें गांधी के दर्शन को साकार करने की क्षमता है। मैं स्वयं चकित रह गया, जब मैंने यह जाना कि डिजिटल प्रौद्योगिकी से प्रभावित आने वाले समय चरखे के मूल दर्शन को न सिर्फ वैधीकृत करेगा, अपितु कार्यान्वित भी करेगा। ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि वे सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक स्थितियां, जिन्होंने इंटरनेट-पूर्व युग में लोगों के बड़े समुदाय के दमन और निशक्तिकरण के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दिया था, वे अब  इंटरनेट के युग में तेजी से बदल रही हैं।

एक नए तंत्र से जुड़े वैश्विक समुदाय का जन्म हुआ है, जिसे इंटरनेट और डिजिटल तकनीकियां आम आदमी को बौद्धिक और व्यावहारिक औजार मुहैया करवा रही हैं, जिससे वे सामाजिक, राजनीतिक और अर्थव्यवस्था की संरचनाओं को बदल सकते हैं। निश्चय ही जहां तक डिजिटल-युग की प्रौद्योगिकियों के विश्व-रूपांतरण की क्षमता का सवाल है तो मनुष्य जाति ने अभी हिमशैल का सिर्फ सतही हिस्सा ही देखा है।

इस बदलाव के मायने हैं-वैश्वीकरण से वैश्य-स्थानीयकरण का परिवर्तन। केंद्रीकरण से विकेंद्रीकरण, कुछेक के पास से सिमटी शक्ति और समृद्धता का बड़े समुदायों तक पहुंचना, केवल भौतिक दृष्टि से समृद्धता के बजाए सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की समृद्धता, गंदी प्रतिस्पद्र्धा से स्वस्थ सहयोगिता, प्रकृति और इसके संसधानों के प्रति स्वार्थ-साधन रवैये के बदले सद्भाव के साथ परस्पर रहने का भाव। उपनिवेशीकरण के प्रादुर्भाव से ही दूरस्थ बाज़ारों पर कब्जा करने की अंधी होड़ की वजह से अर्थव्यवस्था और नैतिकता में आए अलगाव में, जिसे विश्व ने पिछली कई शताब्दियों में झेला है, महत्वपूर्ण तरीके से कमी होगी। पुरानी प्रौद्योगिकी ने इस शोषणकारी व्यवस्था को जन्म दिया वहीं नई प्रौद्योगिकियों ने इसकी कब्र तैयार करने का काम किया है। कम से कम व्यापक स्तर पर होने वाली हिंसा के कुछ प्रारूपों, जैसे राष्ट्रों के युद्ध तो अतीत का हिस्सा बन जाएंगे, क्या खादी और चरखे द्वारा गांधी की परिकल्पना यह पाने की नहीं थी? मैंने इस पुस्तक में यह दर्शाने का प्रयत्न किया है कि किस प्रकार गांधी के आदर्शों की प्रतिध्वनि डिजिटल प्रौद्योगिकी के पथ-प्रदर्शक चिंतकों और अन्वेषणकत्र्ताओं को आती रही है। उनके जीवनी लेखक वाल्टर आइजैक्सन ने बताया कि गांधी स्टीव जॉब्स के निजी हीरो में से थे, जिन्होंने उसे अलग सोचना सिखाया।

खादी, वस्त्र नहीं विचार है

गांधी के चरखा आंदोलन से जो प्रमुख शिक्षा मिलती है, वह यह कि प्रौद्योगिकी को चाहिए कि वह आम आदमी को शक्तिमान बनाए और एक ऐसी शक्ति, जो समाज को एकत्रित करके उसे ऊंचे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करे। ये दोनों बातें इंटरनेट के लिए सही साबित होती हैं। कोई भी इससे आसानी से जुड़ सकता है। (हालांकि इस खासियतकी सक्रिय रूप से सुरक्षा करनी चाहिए।) कोई भी इससे लाभ उठा सकता है और इसमें समाए ज्ञान के और जानकारी के महासागर में अपना योगदान दे सकता है। इस प्रक्रिया में इंटरनेट भूमंडलीय स्तर पर लोगों, समूहों, देशों और संस्कृतियों को आभासी और वास्तविक जगहों पर पास लाने वाली शक्ति बन गया है। भौगोलिक, जातीय, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सीमाओं की परवाह न करते हुए यह प्रसूता की तरह नए समुदायों को जन्म देने में मदद की है। अत: सशक्तिकरण की प्रौद्योगिकी से बढ़ कर है, यह मानवीय विकास का साथी है। इससे पहले कि मुझे गलत समझा जाए, मुझे यहां एक आवश्यक सूचना जारी करनी होगी। मैं यह मानता हूं कि इंटरनेट के पास उन आदर्शों को पूरा करने की क्षमता है, जिन्हें गांधी ने चरखे के साथ जोड़ा था। आने वाले दशकों में इसकी क्षमता पूर्ण रूप से साबित होती या नहीं, यह इस पर निर्भर है कि इसका विकास गांधी की नीतियों के निर्देशन में हुआ है या नहीं।

गांधी ने स्वयं कई बार इस बात की पुष्टि की है कि खादी केवल एक वस्त्र नहीं बल्कि विचार है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि भारत के आर्थिक विकास का चरखा कोई अचर लक्षण नहीं है, जो हमेशा मौजूद रहेगा। बदली हुई सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के लिए उन्होंने 'बेहतर अनुकल्प’ के बारे में सोचा था। वे मशीनों और औद्योगिकियों के एक नए ढांचे को भी अपनाने के लिए तैयार थे, जो खादी और चरखे के साथ जुड़े आदर्शों-अहिंसक, अशोषणकारी और सामंजस्यपूर्ण आर्थिक विकास को बढ़ावा दे सके। अपने अंत समय की ओर बढ़ते गांधी को यह उम्मीद थी कि एक नई तकनीकी औज़ार का जन्म होगा, एक अहिंसक मशीन जो संसार के 'हर व्यक्ति की मदद करें।’ इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि इंटरनेट वह मशीन है, जो गांधी की उम्मीदों पर खरा उतरता है। यह तो जाहिर है कि उन्होंने इंटरनेट या डिजिटलकी परिकल्पना भी नहीं की होगी। फिर भी, यह गांधी की महानता का वह पहलू है, जिस पर ध्यान नहीं गया कि वे एक ऐसे वैज्ञानिक औज़ार की आशा कर रहे थे, जो उनके मानव जाति के सर्वांगीण विकास के सपने को साकार कर सके।

अपनी दूरदर्शिता को और सामाजिक-राजनीतिक मिशन के लिए चरखे का चुनाव काफी सोच-समझ के बाद किया था। उन्होंने सबसे सरल और प्रौद्योगिकी दृष्टि से सबसे अल्पविकसित औज़ार को चुना। स्पष्ट किया कि पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था ने औपनिवेशिक शोषण और आत्मा रहित भौतिक सभ्यता को बढ़ावा देने के लिए आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया। दोनों ने ही व्यापक स्तर पर युद्ध को अवश्यंभावी बनाया। हालांकि गांधी को इतिहास से यह स्पष्ट हो गया कि यूरोपीय सत्ता 'चार दिनों’ की है और भविष्य में अगर सशक्त, निश्चित और सही दिशा में कोशिश की जाए तो एक नई वैश्विक व्यवस्था का जन्म होगा। वे अच्छे से जानते थे कि विज्ञान के नए औज़ारों की आवश्यकता, उन आदर्शों को पाने के लिए पड़ेगी, जिनके लिए चरखा है। यह इस पुस्तक का दावा है कि ये नए औज़ार, जो चरखे के सपने को पूरा कर सकते हैं, उनका प्रतिनिधित्व डिजिटल प्रौद्योगिकी में है और इंटरनेट में स्थित है।

इंटरनेट की अद्भुत क्षमता को अहिंसक और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए कार्यान्वित करना व्यक्तियों और संगठनों के नैतिक आत्मनिग्रही आचार पर निर्भर है। अत: इस पुस्तक में सूचना प्रौद्योगिकी के भविष्य पर चिंतन भी प्रस्तुत किया गया है, जो कि गांधी के सत्याग्रह और स्वराज दूरदर्शितापूर्ण विचारों पर आधारित हैं। मैं एक और बात पर जोर देना चाहूंगा-यह पुस्तक गत वर्षोंकी प्रतिमा के बारे में अकर्मण्य अकादमिक कौतुहल नहीं है। यह सक्रिय होने और सेवा करने की एक पुकार है, जो मेरे विचारों पर आधारित है कि गांधी भारत और विश्व के लिए आज और कल में क्या मतलब रखते हैं। विशेष रूप से हमारे देश को अगर भूतकाल में की गई अपनी गलतियों या पश्चिम की गलतियों को नहीं दोहराना है तो उसे गांधी की सीख की प्रांसगिकता पुन: खोजनी होगी।

उनकी सीख में हमें अपने बंटे हर समाज और टूटे हुए उप महाद्वीप को जोडऩे का एक तरीका मिलता है। हमें अपनी आर्थिक और राजनीकि व्यवस्था में सुधारों केे लिए, जो भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे हुए हैं, एक सही सिद्धांत मिलता है। उनमें हमें मानव-प्रकृति के बीच नया और सामंजस्यपूर्ण रिश्ता मिलता है।

 

(लेखक की पुस्तक 'म्युजिक ऑफ स्पीनिंग व्हील’ का संपादित-अनुदित अंश)



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