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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

असम का कैशलेस मेला

तिवा समुदाय के प्राचीन राजाओं ने अपने राज्य में नकद मुद्रा के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा रखी थी। ऐसा उन्होंने गरीब और अमीर के बीच की दूरी को कम करने के लिए किया था। असम में इसी परंपरा के तहत आज भी तीन दिन का जोनबील मेला लगता है, जिनमें नकदी की जगह वस्तु-विनिमय की पुरानी प्रथा ही चलती है

जोनबील मेले में अपका स्वागत है। यहां आप नाचने-गाने और आमोद-प्रमोद के साथ सामूहिक तौर पर मछली पकडऩे के लिए आ सकते हैं, पर अगर यहां आप कुछ खरीदना चाहते हैं तो इसके लिए नकदी का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। अगर ऐसा करेंगे तो गोभा 'राजा’ आपको दंडित कर सकते हैं। दरअसल, जोनबील देश का अकेला ऐसा मेला है, जो पूरी तरह कैशलेस है। तीन दिनों तक यहां पैसे की कोई कीमत नहीं रह जाती, नकदी पर पूरी तरह प्रतिबंध रहता है। लिहाजा, नोटबंदी जैसे खतरे का भी यहां कोई असर नहीं दिखता। यह सब इसीलिए भी इस मेले में स्वाभाविक और कारगर लगता है, क्योंकि जनजातीय लोगों के पास वैसे भी खर्च करने या भुनाने के लिए दो हजार या पांच सौ रुपए के नोट आमतौर पर होते ही नहीं हैं।

जोनबील मेला मध्य असम की तिवा जनजाति के बीच खासा लोकप्रिय है। यह मोरीगांव के दयांग बेलगुरी में माघ महीने के मध्य में गुरुवार से शनिवार के बीच आयोजित होता है। तिवा जनजातीय भाषा में 'जोन’ का मतलब चांद और 'बील’ का मतलब जलस्रोत होता है। इस मेले का जोनबील नाम इसीलिए दिया गया, क्योंकि यह लगातार तीन चांदनी रातों में एक अद्र्ध चंद्राकार अद्र्ध्रभूमि के तट पर आयोजित होता है। यह मेला 15वीं शती से लग रहा है। इसकी शुरुआत शक्तिशाली गोवा राजाओं ने की थी, जिनका एक समय में असम से लेकर मेघालय के सुदूर खासी और जयंतिया राजाओं तक पर प्रभुत्व था। 

 

'माक्र्सवादी’ राजा

गोवा राजाओं की सोच एक तरह से माक्र्सवादी थी, क्योंकि वे मानते थे कि पैसा ही हर बुराई की जड़ है। इसीलिए उन्होंने अपने राज्य में नकदी मुद्रा के प्रचलन पर रोक लगा दी थी। उन्हें लगता था कि अगर लोग मौद्रिक लेन-देन करेंगे तो इससे उनके अंदर दूसरों के प्रति प्रेम और बंधुत्व की भावना समाप्त हो जाती है। वे अपने राज्य में इस भावना को बचाए रखने के लिए मौद्रिक प्रतिबंध के हिमायती थे। उन्हें इस बात का भय भी था कि इससे गरीब और अमीर के बीच एक होड़ बढ़ेगी, जिससे समाज का आपसी सद्भव छिन्न-भिन्न होगा। लोगों ने राजा की उलझन को समझा और उनकी बातों को माना। इस तरह यह परंपरा साल दर साल आगे बढ़ती गई। आज भी इस इलाके में यह नियम घरेलू और पारंपरिक चीजों, मसलन चावल, हल्दी, टमाटर, कपास, बेंत, बांस के बने सामान, मिर्च, कद्दू, मछली, अंडे और तिल आदि को लेकर लागू है। लोग इन चीजों की पैसे के जरिए खरीद-बिक्री नहीं करते, बल्कि आपस में सामान का विनिमय कर हासिल करते हैं। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि घरेलू चीजें और कृषि उपज की मौद्रिक खरीद-फरोख्त पर यहां मनाही है। इसके अलावा दूसरी चीजें बेशक पैसे से खरीदी-बेची जाती हैं। 15वीं शती से शुरू हुए इस मेले में प्रथा यह रही है कि मेले के दौरान तीन रातों तक राजा वहीं खुद मौजूद रहते थे। राजसी परिवार के प्रतिनिधि दीप सिंह देवराजा को यहां एक तरह से तिवाओं का मौजूदा राजा माना जाता है। राजसी परिवार की प्रथा के अनुसार वे मेले का अपने मंत्रियों के साथ दौरा करते थे और आखिरी दिन लोगों से लगान वसूलते थे। एक प्रथा यह भी रही है कि गोवा राजा गारो, जयंतिया, बोडो और दूसरे पड़ोसी राजाओं को भी मेले में आमंत्रित करते हैं। दिलचस्प है कि ऐसे राजा आज भी राजसी परिवारों के प्रतिनिधि के तौर पर हैं।

 

संगीत के साथ शिकार

'अग्नि पूजा’ मेले का एक अभिन्न हिस्सा है और यह मेला शुरू होने के पहले दिन आयोजित होता है। अग्नि की पूजा यह मानकर की जाती है कि इससे लोगों का कल्याण होगा। अग्निपूजा संपन्न होने के बाद बील में सामुदायिक तौर पर मछली मारने का काम शुरू होता है। इससे पूर्व राजा मेले का औपचारिक रूप से शुभारंभ कर चुके होते हैं। मछली मारने का अर्थ यहां टनों मछलियों के व्यापार से नहीं है, क्योंकि इन्हें यहां खरीदा-बेचा नहीं जाता। यह तो यहां लोगों के दिलों एक-दूसरे से जोडऩे और उनके बीच के सौहार्द को बढ़ाने के लिए होता है। जिन नावों पर सवार होकर लोग मछली मारते हैं, वे विविध तरह के संगीत की प्रस्तुति का एक तरह से मंच बन जाता है। इसमें खासतौर पर तिवा जनजाति के अपने पारंपरिक गाने और संगीत वाद्य खासतौर पर लोकप्रिय हैं। दिलचस्प है कि आजकल के असमी संगीतकार इस संगीत का प्रयोग अपनी कामयाबी और शोहरत के लिए करते हैं।

इस मेले में असम के अलावा मेघालय और कार्बी आंग्लोग से भी लोग आते हैं और यहां चलने वाली गतिविधियों में शिरकत करते हैं। इसी तरह जयंतिया, खासी, कार्बी, गारो और बोडो समुदाय के लोग भी उत्साह के साथ मेले का हिस्सा बनते हैं। इस तरह मेले में दस हजार से ज्यादा लोग हर साल आते हैं।

ये जनजतीय लोग मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में रहते हैं और पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं। ये लोग काफी सीधे और सरल हैं। इनका आज के भौतिकवादी समाज और उससे जुड़ी संस्कृति से न तो कोई संबंध है और न ही कोई सरोकार ये लोग मेले में अपने घर की बनी चीजों और कृषि उपज को लेकर आते हैं। यहां ये तीन दिन बांस से बनी झोपड़ी में रहते हैं। इस झोपड़ी को भी वे खुद ही बनाते हैं। वे यहीं अपना खाना भी पकाते हैं। वे मैदानी इलाके के लोगों के साथ उन चीजों का विनिमय करते हैं, जिन्हें वे पहाड़ से लेकर नीचे आते हैं। नियम यह भी है कि वे अपने साथ कोई भी सामान बचाकर नहीं ले जाएंगे। वे मेले में खुद की पहचान से जुड़ी हर चीज लेकर आते हैं।

तीन दिनों तक चलने वाले मेले में उनका समय नृत्य और गान के साथ कई तरह की सामुदायिक गतिविधियों में बीतता है। मेले के आखिरी दिन बड़ा

सामुदायिक भोज होता है। इसके बाद वे यहां

बनाई अपनी झोपडिय़ों को जलाकर घर लौट

जाते हैं। पिछली कांग्रेस सरकार ने यूनेस्को से इस बात का अनुरोध किया था कि इस मेले को ऐतिहासिक मेला या उत्सव घोषित किया जाए। मौजूदा संस्कृति मंत्री नबा दोले भी कहते हैं कि यह दुनिया के पुराने मेलों में से एक है। आखिर में इस मेले से जुड़ी एक और खास बात का जिक्र जरूरी है कि यहां जो भी आता है उसे या तो लोग मामा पुकारते हैं या मामी। तिवा जनजाति में इस संबंधों का काफी महत्व है। यह महत्व इस बात को भी रेखांकित करता है कि इस समाज के

लोग कैसे एक-दूसरे से सीधे तौर पर जुड़े हैं और उनके बीच का संबंध कितना पारिवारिक व भावनात्मक है।



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