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मंगलवार, 13 नवंबर 2018

'प्रियाज मिरर की साहसिक सच्चाई'

कॉमिक बुक 'प्रियाज मिरर’ में एसिड हमले के भुक्तभोगियों को जिस रूप में दिखाया गया है, उसमें बदलाव लाने की जरूरत है। वे सच्चाई और एक्टिविज्म के सच्चे हीरो हैं

जब भी वह आईने में अपना चेहरा देखती है, डर के मारे सिहर उठती है। जख्म और सूजन की पीड़ा दोगुनी हो जाती है। जिस लड़की के चेहरे पर कुछ महीने पहले तक मुस्कान एक स्थायी भाव के रूप में रही हो उसके चेहरे की कोई समानता हो भी नहीं सकती। यह हृदय विदारक कहानी मोनिका सिंह की है, जो एक ही वक्त पर पीड़ा के साथ क्रोध को भी ताजा कर जाती है। मोनिका के जीवन में नवंबर का वह दिन बहुत भयानक था, जब शाम के करीब साढ़े चार बजे एक बददिमाग शख्स ने प्रतिशोध में आकर उस पर एसिड डाल दिया। इस घटना से उसका पूरा जीवन ही उलट-सा गया। एक बददिमाग शख्स के विवाह के प्रस्ताव को ठुकराना इतना भारी पड़ेगा, किसी ने सोचा भी नहीं होगा। कोई मानसिक रूप से विक्षिप्त शख्स ही इस प्रकार की घटना को अंजाम दे सकता है। उस दिन शाम के वक्त वह शख्स मोनिका के घर में घुस गया और जब तक वह कुछ बोलती, उसके पूरे शरीर पर पीले रंग का एसिड छिड़क दिया। इससे उसका आधा शरीर जल गया। उसके शरीर पर पड़ा एसिड जिधर से गुजरा, उसकी त्वचा को खाक करता चला गया। मन से लेकर तन पर हुए आघात सहने वाली मोनिका अकेली नहीं है। उनकी जैसी सैकड़ों लड़कियां हैं, जिन्हें पुरुषों के प्रस्ताव अस्वीकार करने का खामियाजा इस प्रकार के हमले के रूप में भुगतना पड़ा है। अभी तक कई लड़कियों पर हमले किए जा चुके हैं। तभी तो मोनिका सिंह पर हुए हमले के एक दशक बाद भी भुक्तभोगी कई लड़कियों की कहानियों ने 'प्रियाज मिरर’ शीर्षक वाली कॉमिक बुक को प्रेरित किया है। इस तरह की एक किताब में मुख्य नायक के रूप में उद्धृत प्रिया का चरित्र मोनिका सिंह से ही प्रेरित है। इस संदर्भ में मोनिका सिंह का कहना है कि मैं उस आघात से उबरने तथा वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए ही आईने का उपयोग एक प्रकार से उपचार के रूप में करती हूं। इस प्रकार मोनिका को उसका आईना उसे अपने करीब लाता है। कॉमिक बुक में प्रिया अपने साहस पर सवार होकर दुर्ग में प्रवेश करती है, जहां अहंकार रूपी खलनायक से सामना कर उदार व्यक्ति के रूप में छद्म वेशी दानव को दुनिया के सामने लाती है। इसके साथ ही उसके जाल में फंसे एसिड हमले की शिकार महिलाओं को आजाद कराती है। अपने प्रयास की बदौलत ही अहंकार रूपी दानव के खिलाफ लडऩे के लिए प्रिया एसिड हमले की शिकार महिलाओं के एक समूह में शामिल हो जाती है। माइकल एंजेलो से मिली प्रेरणा निर्माता राम देवीनेनी ने इस कॉमिक बुक को बनाया है और कलाकार डैम गोल्डमैन ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा के चारों ओर मंडराते खतरे और धब्बे को रेखांकित किया है। अपने चरित्रों को जीवंतता प्रदान करने के लिए उन्होंने वास्तविकता और छवि पहचान तकनीक का उपयोग किया है। 37 पृष्ठों वाली इस कॉमिक बुक का विमोचन न्यूयॉर्क फिल्म महोत्सव के लिंकॉन सेंटर में किया गया। यह किताब दुनिया की पांच भाषाओं अंग्रेजी, हिंदी, पुर्तगीज, स्पैनिश और इटालियन में उपलब्ध है। इसके अलावा इस किताब को मुफ्त में उसकी वेबसाइट से भी डाउनलोड किया जा सकता है। पांच किताबों की श्रृंखला में प्रियाज मिरर दूसरी किताब है। अगला कॉमिक देह व्यापार पर होगा। राम जब सिसटाइन चैपल की छत पर बनी माइकल एंजेलो की सबसे बेहतर भित्ति-चित्र देखने के लिए जा रहे थे, तभी उन्हें सोदाहरण कॉमिक बुक निकालने का विचार मन में आया। अपने अनुभव के बारे में उन्होंने कहा 'हरेक भित्ति-चित्र एक अलग कहानी कहती थी। मैं हरेक पेंटिंग की गहराई तक जाना चाहता था। लेकिन मेरी समझ की हद इसकी इजाजत नहीं दी। दूसरे शब्दों में कहूं तो मेरी समझ की सीमा सीमित थी। तभी वास्तविकता के उपयोग का विचार मेरे दिमाग में आया।’ असल में राम बातचीत आधारित कॉमिक बुक तैयार करना चाहते थे। आधुनिक तकनीक के उपयोग के कारण ही प्रिया श्रृंखला में पाठकों के लिए सम्मोहित करने वाला अनुभव का माहौल बन पाया। वास्तविकताओं का संग्रह इस कॉमिक बुक का एक प्रमुख भाग है। ब्लिपर नाम के ऐप के माध्यम से कॉमिक बुक के सहारे हरकोई एनिमेशन (सजीव चित्रन) और वास्तविक कहानियों के साथ कई और बातचीत आधारित चीजों का भी अवलोकन कर सकता है। इस किताब में प्रिया कहती है बहनों, 'हमें अपने घावों को क्यों छिपाना चाहिए? और हमें अपने घावों की वजह से क्यों छिपना चाहिए कुछ लोग चेहरे की वजह से तुम्हें कम आंकते हैं। लेकिन तुममें कई और चीजें भी तो हैं। इस आईने में देखो आपको सब कुछ दिखेगा।’ देवीनेनी के साथ प्रियाज मिरर की सह-लेखिका परोमिता वोहरा कहती हैं 'प्रिया का हथियार अपेक्षाकृत असाधारण है। मिरर ऑफ लव के लिए प्रियाज मिरर एक दृष्टांत है। प्रिया उन महिलाओं को उसमें झांकने तथा अपने भय से मुक्त होने के लिए उत्साहित करती है। एक गायक, बढ़ई और पेंटर की तरह ही उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप को देखने के लिए कहती है, जो वो कभी थी।’ चित्रकार डैन गोल्डमैन कहते हैं कि अपने काम को प्रभावी और वास्तविक बनाने के लिए चित्रकारी शुरू करने से पहले मैंने दुनिया भर की एसिड हमले के प्रभावितों की तस्वीरें देखीं, और फिर एसिड हमले झेल चुकी वास्तविक महिलाओं से उसमें समानता देखी। पितृसत्ता को चुनौती प्रिया श्रृंखला की पहली किताब की प्रेरणा देश की राजधानी दिल्ली में दिसंबर 2012 की रात घटी उस घटना से प्रेरित थी, जिस रात 23 वर्षीया छात्रा के साथ एक बस में सामूहिक बलात्कार किया गया। पूरी दुनिया में इस घटना की भत्र्सना होने की वजह से ही तत्कालीन केंद्र सरकार को महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों का जल्दी से निपटारा करने के लिए कानून में बदलाव करना पड़ा। यहां तक कि फांसी तक की सजा जोड़ी गई। चूंकि महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जड़ें काफी मजबूत हो चुकी हैं, ऐसे में प्रवृत्ति में बदलाव लाना आवश्यक है। इस संदर्भ में वोहरा का कहना है, 'अपराध की भाषा हमेशा एक जैसी ही होती है। आप पीडि़़त और अपराधी के बारे में पढ़ते हैं, लेकिन हमलोगों को एक पीडि़ता के रूप से ज्यादा उनके अजेय चरित्र, उनके साहस, उनकी सुंदरता और अपने जीवन को दोबारा संवारने के संघर्ष के बारे में सोचने की जरूरत है। इसके साथ ही हमलोगों को उस खलनायक को नए नजरिए से देखने की जरूरत है, क्योंकि वह भी तो पितृसत्ता का अंश है।’ इस कॉमिक किताब के पाठक वर्ग में किशोरवय लड़के मुख्य लक्ष्य हैं। स्थापित पितृसत्तात्मक प्रवृत्ति ने उन्हें यही सिखाया है कि पुरुष हमेशा से ही महिलाओं से श्रेष्ठ रहे हैं। जब कभी कोई महिला किसी पुरुष को अस्वीकार करती है, तो उसके अहं को चोट पहुंचती है, और एक खास सोच रखने वालों का यही अहं एसिड के रूप में निकलता है जो समाज को खराब करता है। इस तरह खलनायक स्वयं भी एक पीडि़त है। समय का तकाजा है कि हमें पीडि़त और पीड़ा देनेवालों दोनों को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है। जब जीवन के वास्तविक मसले बलात्कार और एसिड हमले की भांति निराशाजनक हों, तब शायद समाज में बड़े बदलाव के लिए वास्तविक कहानियों पर आधारित एक कॉमिक बुक के किरदारों की लड़ाई ही तकनीक के माध्यम से संवाद संचार का प्रभावी तरीका है। एक समाज के रूप में बलात्कार और एसिड हमले के पीडि़तों को अभी तक जिस नजरिए से देखा जा रहा है, उसमें बदलाव लाने की जरूरत है। वे वास्तव में 'पीडि़त’ नहीं हैं। वे सच्चाई और एक्टिविज्म के सच्चे हीरो हैं।



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