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शनिवार, 17 नवंबर 2018

शिकारी बन गए संरक्षक

अफ्रीका से हजारों किलोमीटर दूर समुद्र और पहाड़ लांघकर नगालैंड के दोयांग क्षेत्र में आने वाले पक्षी अमुर फाल्कन का हाल तक स्थानीय नगा लोग शिकार करते थे, पर अब वे उन्हें बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं

पक्षियों से सालाना प्रवास की कई तरह की मिसालें दुनिया भर में हैं। इनमें अमुर फाल्कन (अफ्रीकी बाज) का मंगोलिया से करीब एक महीने के प्रवास पर नगालैंड पहुंचने का सिलसिला खासा पुराना है। पक्षियों के प्रवास की यह मिसाल इस लिहाज से खास है कि इसमें अमुर फॉल्कन 22 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी यात्रा करके अफ्रीका से नगालैंड पहुंचते हैं। दिलचस्प है कि इस 22 हजार किलोमीटर की प्रवास यात्रा में तीन हजार किलोमीटर की यात्रा समुद्र के ऊपर उड़ान भरने की है। दरअसल, पूर्वी साइबेरिया, उत्तरी चीन, मंगोलिया, मंचुरिया और उत्तरी कोरिया की रहने वाले अमुर फाल्कन की पूरी आबादी हर साल अगस्त से सितंबर के बीच एक साथ प्रवास के लिए निकल जाती है। अमुर फाल्कन को प्रवासी प्रजाति के पक्षी के नाते अंतरराष्ट्रीय सहमति के तहत सुरक्षा प्रदान की गई है। अमुर फाल्कन हर साल नगालैंड में दोयांग जलाशय के नजदीक बड़ी संख्या में आते हैं। बताया जाता है कि देश में यह अमुर फाल्कन का सबसे बड़ा प्रवासी क्षेत्र है। नगालैंड के वोखा जिला में मेहमान पक्षियों की पहली खेप जैसे ही बीते साल आई, तो असहा, पंगटी और सुंगरो जैसे दोयांग जलाशय से लगे क्षेत्रों के ग्रामीणों के बीच खुशी की लहर छा गई। यह वह क्षेत्र है, जिसे पूरी दुनिया में फॉल्कन की राजधानी के तौर पर जाना जाता है। यहां के लोगों ने इस शिकारी पक्षी के संरक्षण के लिए जिस तरह से पहल की है, उससे स्वाभाविक तौर पर नगालैंड की पहचान आज दुनिया में एक नए तर्ज हो रही है। इस पहचान और कामयाबी के पीछे यहां जागरूकता लाने के लिए हुए प्रयासों की बड़ी भूमिका है। नतीजतन, वोखा जिले में पंगटी और उसके आसपास के गांव के लोगों के लिए अमुर फॉल्कन का प्रवास आज महज मौसमी आनंद का विषय नहीं है, बल्कि प्रवासी पक्षियों के इस सालाना आमद से वे इलाके पर्यटन को बढ़ावा देने में लगे हैं। यह कोशिश इसीलिए भी परवान चढ़ रही है, क्योंकि अफ्रीका से हजारों किलोमीटर की उड़ान भर कर आने वाले ये प्रवासी पक्षी दोयाम के आसपास के क्षेत्र को साल के कुछ महीनों के लिए एक मनोरम टूरिस्ट साइट में बदल देते हैं।     

 2012 तक वोखा के स्थानीय समुदायों में फाल्कन के शिकार की प्रवृति काफी ज्यादा थी। वे लोग इन्हें मारकर इनका मांस खाते थे। बड़े पैमाने पर या यूं कहें कि सामूहिक तौर पर होने वाली पक्षियों की इस हत्या को रोकने के लिए इस बारे में तफ्सील से जानकारी और आंकड़े जुटाए गए। डॉक्यूमेंटेशन का काम पूरा होने से इस मुद्दे को लेकर खबरें प्रकाशित होने लगी। इस तरह हर तरफ यह जानकारी फैलने लगी कि यहां फाल्कन का न सिर्फ उसका मांस खाया जाता है बल्कि इसकी खरीद-बिक्री भी होती है। यह सब हुआ एक ऑनलाइन पयार्वरण पोर्टल 'कन्जरवेशन इंडिया’ की पहल पर।

इस पहल का असर यह हुआ कि दोयांग जलाशय से लगे क्षेत्र को इस तौर पर चिन्हित किया गया, जहां फाल्कन का सबसे ज्यादा शिकार होता है। इस तरह लोगों ने जाना कि अफ्रीका से अरब सागर का रास्ता इस प्रवासी पक्षी के लिए मौत का रास्ता है। गौरतलब है कि दोयांग से लगे इलाके में न सिर्फ अमुर फाल्कन का शिकार हो रहा था, बल्कि कुछ लोग इसे जिंदा भी पकड़कर अपने पास रख रहे थे, ताकि वे इसे बाद में बाजार में ऊंची कीमत पर बेच सकें। 2012 में कंजरवेशन इंडिया ने नगालैंड में प्रवास के दौरान फाल्कन के साथ होने वाली इस नृशंसता की सचाई को अपनी खबरों के जरिए दुनिया से साझा किया। यह बात यहीं नहीं रूकी। इस ददर्नाक सचाई के सामने आने के साथ 'वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (डब्ल्यूटीआई), नगालैंड वन विभाग और स्थानीय नगा लोगों ने एक 'रैपिड एक्शन प्रोजेक्ट’ (रैप) को हाथ में लिया, ताकि फाल्कन को संरक्षण प्रदान किया जा सके। इस सामूहिक अभियान के तहत इस पूरे इलाके में प्रवासी पक्षी को न मारने को लेकर संवेदनात्मक जागरूकता पैदा करने की कोशिश गई। इसके लिए वोखा जिले के अलग-अलग हिस्सों में बैठकें कर फाल्कन को पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिहाज से जरूरी बताने की  गंभीर पहल हुई। इस अभियान को स्थानीय ग्रामीणों का तो समर्थन मिला ही, ग्राम परिषदों और सरकारी विभागों ने भी इसमें बढ़-चढ़कर शिरकत की। जागरूकता के इस अभियान को कारगर बनाने में जिले के चर्चों ने भी बड़ी भूमिका निभाई। इस तरह यह सूरत बनने लग गई कि अब प्रवास के दौरान दोयांग क्षेत्र में फाल्कन का शिकार नहीं होगा, बल्कि उन्हें लोगों की तरफ स्नेह-संवेदना मिलेगी।

आखिरकार कुछ महीनों का प्रयास रंग लाया और दोयांग इलाके का सूरतेहाल पूरे तौर पर बदलने लगा। आज की तारीख में तो आलम यह है कि यह क्षेत्र फाल्कन के लिए सुरक्षित क्षेत्रों में से एक माना जा रहा है। यह सब इसीलिए मुमकिन हुआ, क्योंकि इनका शिकार करने वालों के बीच इस बात को लेकर जागरुकता आई कि इन्हें मारना तात्कालिक तौर पर भले फायदे लगे, पर अंतत: इसका नुकसान ही उठाना पड़ता है। फाल्कन को बचाने में मिली इस कामयाबी में डब्ल्यूटीआई, नगालैंड वन विभाग और कुछ स्थानीय गैरसरकारी संस्थाओं के साथ स्थानीय समुदायों के सहयोग की अहम भूमिका है।

यह प्रयोग स्थायी रूप से सफल हो इसके लिए वोखा जिले में अभी भी कई तरह के जागरुकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा यहां वैसे 30 परिवारों को अलग से जमीन मुहैया कराई गई, जिनकी आजीविका पर फाल्कन के शिकार पर रोक लगने से असर पड़ा। फाल्कन के शिकार पर रोक के लिए असहा, पंगटी और सुंगरो

ग्राम परिषदों की तरफ से बजाप्ता करार किया

गया और इसके लिए उन्होंने प्रस्ताव पास किया। इसके मुताबिक अमुर फाल्कन का शिकार गैरकानूनी तो है ही, यह दंडनीय अपराध भी है। दोयांग

की वन अधिकारी जुथुंग्लो के मुताबिक, 'यह माना

जाता था कि नगा लोग परंपरागत और स्वाभाविक तौर पर शिकारी होते हैं, पर आज यह मान्यता और स्थिति पूरी तरह बदल गई है। आज हमारे पास प्रवासी फाल्कन की सुरक्षा की गारंटी के लिए सुरक्षा दस्ते और पेट्रोलिंग तक की व्यवस्था है, ताकि प्रवास के दौरान एक भी पक्षी न मारा जाए।’ इस अभियान की एक देन यह भी है कि अब दोयांग जलाशय और उससे लगे क्षेत्र में आने वाले प्रवासी फाल्कन की संख्या में स्वाभाविक तौर पर इजाफा देखने को मिलेगा। कहना नहीं होगा कि प्रकृति और पर्यावरण के साथ जैविक संवेदना के लिहाज से यह बड़ी

उपलब्धि है।



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