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बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

रेल का फिल्मी खेल

छुक-छुक चलती रेल की वजह से कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा चुकी हैं

वर्षों पहले की देव आनंद की एक बेहद लोकप्रिय फिल्म ‘काला बाजार’ का एक गाना ‘अपनी तो हर आह एक तूफान है, ऊपरवाला जान कर अनजान है....’ को याद कीजिए। देव साहब और अभिनेत्री वहीदा रहमान रेल के एक ही डिब्बे में यात्रा कर रहे हैं। देव आनंद नीचे की सीट पर बैठे हुए हैं। वहीदा ऊपर आराम कर रही हैं। देव आनंद असल में उपरवाले ईश्वर से याचना कर रहे हैं। शुरू-शुरू में वहीदा सोचती हैं कि देव उन्हें इंगित कर ही यह गाना गा रहे हैं, बाद में इसका एहसास होते ही वह देव की इस दर्द भरी गुहार को ध्यान से सुनती हैं। वास्तव में यह एक द्विअर्थी गीत है, जिसमें श्लेष का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। इसके निर्देशक गोल्डी गानों के फिल्मांकन में भी सिद्धहस्त थे। इसके ढेरों उदाहरण फिर कभी। फिलहाल तो इस गाने के लाजवाब फिल्मांकन की यादें। और इसी के साथ जुड़ी हुई है हिंदी फिल्मों में रेल का अदभुत योगदान। एक अरसे से हर दूसरी फिल्म में हमारी रेल छोटे या बड़े रूप में हमारी फिल्मों में मौजूद रहती है। रियलिस्टिक लुक की खातिर ‘अनुुपमा’,‘गंगा-जमुना’,‘सोलवां साल’,‘आशीर्वाद’, ‘अजनबी’, ‘जमाने को दिखाना है’,‘छोटी-सी बात’, ‘बातों-बातों में’,‘आराधना’, ‘शोले’,‘दीवार’,‘जॉनी दुश्मन’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’,‘दिल से’,‘जब वी मेट’,‘परिणीता’,‘किक’, ‘रोबोट’, ‘द बर्निंग ट्रेन,‘स्वदेश’,‘कुर्बान’,‘तेज’,‘दबंग’,‘तीसमार खान’,‘चेन्नई एक्सप्रेस’,‘साथियां’,‘बजरंगी भाईजान’ आदि। यह फेहरिस्त इतनी लंबी है कि पूरी रिपोर्ट इस सूची से भर सकती है। शुरू से ही बॉलीवुड फिल्मों के लिए रेलवे एक अहम लोकेशन था। इसलिए जब भी जरूरत पड़ी, यहां के ओरिजिनल लोकेशन में शूटिंग करना फिल्मकार पसंद करते रहे। आनेवाली कई फिल्मों भी यह लोकेशन शिद्दत से दिखाई पड़ेगा। सलमान खान तो इस लोकेशन के कायल है। ‘बॉडीगार्र्ड’, ‘किक’, ‘बजरंगी भाईजान’ आदि उनकी लगभग सारी फिल्मों में यह लोकेशन था। अब तो वह रेलवे को अपने लिए शुभ समझने लगे हैं। रेलवे तो सितारों के इस आचरण से गदï्द् है क्योंकि उनके इस सोच के चलते ही रेलवे की तगड़ी कमाई होती है। और कई निर्माता तो फिल्म को रियलिस्टिक लुक देने के लिए रेलवे के असली लोकेशन में ही शूटिंग करना पसंद करते हैं। आज के चर्चित निर्देशक कबीर खान रेलवे के रीयल लोकेशन में ही शूटिंग करना पसंद करते हैं। वह कहते है,‘कई बार इस तरह के रीयल लोकेशन में शूटिंग करना मुझे बहुत अच्छा लगता है, अब जैसे कि ‘बजरंगी भाईजान’ की शूटिंग ऐसे लोकेशन में करना जरूरी था। मंै मानता हूं कि इसमें कुछ दिक्कतें तो आती तो है,पर आपका काम बहुत आसान हो जाता है। बहुत सारी बातें आपको वास्तविक मिल जाती हैं।’ प्रोड्यूसर निहाल जाहिर है फिल्मकारों का यह रेलवे प्रेम इस महकमे के लिए एक नयी खुशी लाता है। क्योंकि जब ‘तीसमार खान’,‘रा-वन’,‘दबंग’,‘चेन्नै एक्सप्रेस’, ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्मों के अहम लोकेशन किसी रेलवे स्टेशन में लगते हैं, तो रेलवे का फायदा दोगुना हो जाता है। रेलवे के पासिंग शॉट तो अमूमन हर दूसरी फिल्म में दिखाई देता है। रेलवेवाले इस पासिंग शॉट से भी खुश है। क्योंकि इस तरह की शूटिंग की भी रेलवे को अच्छी फीस मिलती है। लेकिन असली मजा तब आता है,जब ‘वांटेड’ या ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ की शूटिंग कई दिनों तक किसी रेलवे स्टेशन पर होती है। तब रेलवे को दो-तीन दिनों की शूटिंग में ही दस लाख की कमाई हो जाती है। रेलवे मालामाल वैसे रेलवे की कमाई अमूमन उनके द्वारा दी गई सुविधाओं पर निर्भर करती है। एक ताजा आंकलन के मुताबिक फिल्मवालों को एक दिन की शूटिंग के लिए एक से दो लाख रुपए तक देना पड़ता है। आज टू टायर स्टेशन पर शूटिंग के लिए एक लाख देने पड़ते हैं,जबकि थ्री टायर स्टेशन पर यह फीस 50 हजार तक होती है। वेस्टर्न रेलवे चार कोच की चलती गाड़ी में शूटिंग के लिए 3 लाख और पांच कोचवाली गाड़ी पर शूटिंग के लिए साढे तीन से चार लाख तक फीस लेती है। कुछ विशेष परिस्थितियों पर ज्यादा दिन शूटिंग होने पर प्रति दिन की यह फीस काफी कम हो जाती है। इसके अलावा निर्माताओं को बैक गारंटी के तार पर एक बड़ी राशि भरनी पड़ती है। और इसी के साथ सुरक्षा के लिए आरपीएफ को 25 हजार रुपये देने पड़ते हैं। शूटिंग के बाद जब संबंधित अधिकारी सब कुछ ओके होने का कागज पेश करते है,तब बैक गारंटी निर्माता को वापस कर दी जाती है। इसलिए अब रेल भी फिल्मकारों के प्रति पहले की तुलना में काफी सहृदय हो गई है। सीएसटी, लोनावाला, चौक, ऑप्टा, बोरीबंदर, सहित कई ऐसे रेलवे स्टेशन है, जो हमारे फिल्मकारों को शूटिंग के लिए बहुत सुविधाजनक लगते हैं। और एक दिन की शूटिंग में अमूमन 2 लाख खर्च करना उन्हें अच्छा भी लगता है। वेस्टर्न रेलवे के पीआरओ के मुताबिक पहले निर्माताओं को शूटिंग की अनुमति मिलने में कम से कम दस से पंद्रह दिन लग जाते थे,पर अब ज्यादा से ज्यादा पांच दिन में यह अनुमति मिल जाती है। कई विशेष परिस्थितियों में यह अनुमति तीन दिन में ही देने की कोशिश की जाती हैं। इसके अलावा भी रेलवे अपनी कई अतिरिक्त सेवाएं नार्मल चार्ज में निर्माताओं को दे रहा है। ‘दबंग’ के निर्माता अरबाज खान बताते है,‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि रेलवे के अधिकारियों के विशेष सहयोग के चलते हमारा काम बहुत आसान हो जाता है। हम रेलवे परिसर में अपनी मन पसंद शूटिंग कर सकते हैं।’ यंू तो फिल्म निर्माता अपनी फिल्म के सिचुएशन के मुताबिक रेलवे स्टेशन का चुनाव करते हैं। बोरीबंदर, सीएसटी चौक लोनावाला आदि निर्माताओं के प्रिय स्टेशन हैं, जहां निर्माताओं को शूटिंग करना पसंद हैं। पर पनवेल से 11 किलोमीटर दूर स्थित रेलवे स्टेशन आप्टा निर्माताओं का पसंद है। पुरानी फिल्म ‘अमर प्रेम’ से लेकर अब तक ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘कुछ कुछ होता है’, ‘गुरू’,‘मोहब्बतें’,‘खाकी’,‘स्लमडॉग मिलनियर’ सहित कई फिल्मों और टीवी सीरियल आदि की शूटिंग इस स्टेशन पर हो चुकी है। वैसे आप्टा के अलावा सीएसटी और नवी मुंबई सहित दूसरे कई वेस्टर्न रेलवे के लोकेशन है, जो कई निर्माताओं को खूब आकर्षित करते हैं, जिनमें से कांदिवली महालक्ष्मी के कारशेड, गोरेगांव, मंटुगा और महालक्ष्मी स्टेशन के प्लेटफार्म,लोवर परेल का वर्कशाप, मुंबई सेंट्रल और चर्चगेट का भीड़-भाड़वाला स्टेशन, यहीं नहीं कई बार बांद्रा टर्मिनस,बांद्रा रेलवे कॉलोनी, महालक्ष्मी रेलवे ग्राउंड में भी शूटिंग होती है। ‘द बर्निंग ट्रेन’ और बीआर चोपड़ा रेलवे पर आधारित किसी भारतीय फिल्म की याद आते ही फिल्मकार बीआर चोपड़ा की 1980 की फिल्म ‘द बर्निंग ट्रेन’ की चर्चा करना एकदम लाजिमी है। यह भारत की पहली और एकमात्र ऐसी फिल्म है,जो पूरी तरह रेल पर केंद्रित थी। इसमें इंजीनियर बने विनोद खन्ना के अथक प्रयास के बाद दिल्ली से बंबई (अब मुंबई)चलने वाली सुपरफास्ट ट्रेन की पहली यात्रा शुरू होती है। लेकिन यात्रा के बीच में एक साजिश के तहत इसमें आग लग जाती है। इसका ब्रेक फेल हो जाता है। रोचक घटनाक्रम का एक लंबा सिलसिला इसमें पिरोया गया था। धर्मेेंद्र, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना,परवीन बॉबी, विनोद मेहरा,डैनी सहित लगभग दो दर्जन सितारें इसके यात्रियों में थे। पर फिर भी फिल्म बाक्स आफिस में लंबी यात्रा नहीं कर पायी। शुरू के तीन दिन सौ प्रतिशत कलेक्शन के बावजूद यह एक औसत सफल फिल्म की श्रेणी में आती है। लेकिन बावजूद इसके चोपड़ा साहब की इस कोशिश को आज भी सराहनीय और सार्थक माना जाता है। उन्हें इस बात का श्रेय दिया जाता है कि ट्रेन विभीषिका पर आधारित उन्होंने पहली ऐसी फिल्म बनाई। वैसे इस फिल्म के बनाने की प्रेरणा उन्हें हॉलीवुड की ऐसी एक सुपर हिट फिल्म ‘द टावर्रिंग इनफर्नो’ से मिली थी। क्या भूलूं, क्या याद करूं रेल या रेलवे प्लेटफार्म पर फिल्माए गए अच्छे दृश्यों की एक लंबी फेहरिस्त है। पर संजीदा सिने रसिकों के दिलो-दिमाग में कुछ सीन अमिट छाप छोड़ गए हैं। ऐसे में याद कीजिए हृषि दा की यादगार फिल्म ‘अनुपमा’ को। फिल्म के अंतिम सीन में कुछ न बोलने वाली बेटी शर्मिला टैगार पिता का विरोध कर अपने प्रेमी धर्मेंद्र के गांव स्थित घर में जाने के लिए ट्रेन पर बैठ चुकी है। बेटी के दोस्त उसे स्टेशन छोडऩे आए है। उसके पिता प्लेटफार्म के एक खंभे से छिप कर सब कुछ देख रहे है। कैमरा उन पर फ्रीज होकर फिल्म समाप्त होती है। बहुत सारे फिल्म प्रेमी इसे रेलवे स्टेशन पर फिल्माया गया एक यादगार सीन मानते है। इसी तरह से इम्तियाज अली की जब वी मेट में करीना पर फिल्माया गया सीन भी बहुत सहज आर दर्शनीय है। यह दृश्य आम जिंदगी के करीब है। लेकिन फिल्म स्वदेश पर शाहरूख पर फिल्माए गए दृश्य के लिए निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की जितनी भी तारीफ की जाए, कम है। रेल के डिब्बे में बैठे बिसलरी पीनेवाले शाहरूख को प्यास लगती है। गाड़ी एक प्लेटफार्म पर रुकती है,तो उनकी नजर बिसलरी वाले को ढूंढती है। मगर 25 पसे में एक कुल्हड़ पानी बेचनेवाला एक बच्चा मिलता है। शाहरूख उससे ही पानी खरीदते है ओर उसे 5 रूपए का एक सिक्का देते हैं। वह पैसे लौटाने के लिए पाइ-पाई जोड़ रहा है,गाड़ी चल पड़ती है। और बच्चा दौडक़र उन्हें वह पैसा लौटाता है। इस पूरे दृश्य संयोजन को फिल्मकार ने जिस कुशलता से फिल्माया है,वह बहुत मार्मिक बन पड़ा है। हाल की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ में बच्ची मुन्नी के इर्द-गिर्द रख पृष्ठभूमि में रेल को रखकर बेहद खूबसूरत दृश्य रचा गया है। वैसे, ऐसे दृश्यों की चर्चा एक न थमनेवाली दास्तान है। यह तो कुछ वैसा ही है जैसे रेल हमारी आम जिंदगी से जुड़ी हुई है, वैसे ही ऐसे दृश्य हमारी जिंदगी में रच-बस गए हैं।



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