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बुधवार, 23 मई 2018

विकास का अनूठा करघा

अन्न से लेकर महिला संरक्षण तक, खेती के तरीकों से लेकर रोज़गार के नए अवसर पैदा करना नगालैंड जैसे राज्य में किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन दो महिलाओं ने मिल कर तस्वीर बदल दी

नगालैंड का एक सुदूरवर्ती गांव इन दिनों खामोशी से आ रहे सामाजिक-आर्थिक बदलाव और पर्यावरण सुरक्षा की मिसाल बन रहा है। कमाल की बात यह है क इस अनूठे बदलाव की कमान महिलाओं ने संभाल रखी है। नगा महिलाएं हमेशा सम्मान की पात्र मानी गई हैं, पर ग्राम विकास और प्रशासन के काम से उन्हें बाहर रखा जाता रहा है। इन महिलाओं ने अब इस खारिज स्पेस को कब्जाने की ठान ली है। छिजामी, सीमावर्ती सूबा नगालैंड के फेक जिले का एक गांव हैं और यहां मुख्य रूप से नगा और चेकसांग रहते हैं। यह करीब 600 परिवारों और तकरीबन 3000 की आबादी वाला गांव है। यहां के लोग आमतौर पर झूम खेती पर निर्भर है। झूम खेती करना आसान नहीं है, पर उत्तर-पूर्व के पहाड़ी इलाके में आजीविका का यही सबसे बड़ा पारंपरिक जरिया है। खासतौर पर ज्यादा साक्षरता दर वाले पश्चिमी जिलों के मुकाबले मोन, लांगलेंग और तुएनसेंग जैसे उत्तरी जिलों में यह स्थिति ज्यादा आम है।   

मोनिशा और सेनो

छिजामी में बदलाव की बयार 20वीं सदी के आखिरी दशक के मध्य  से तब बहनी शुरू हुई जब महिला अधिकार कार्यकर्ता और नार्थ-ईस्ट नेटवर्क (नेन) की संस्थापक मोनिशा बहल और एक स्थानीय ग्रामीण महिला कार्यकर्ता सेनो ने महिलाओं के लिए सामुदायिक विकास का काम शुरू किया। 1998-2004 के शुरुआती सालों में प्रसव और सामुदायिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषाहार को लेकर अभिक्रम शुरू हुए। 2002 के अंत में गांव की तरफ से नेन को अपना रिसोर्स सेंटर बनाने के लिए जमीन मिली। अगले तीन सालों में यह सेंटर बनकर तैयार हो गया। यहीं कुछ महीनों बाद ग्रामीणों के कौशल विकास के लिए एक अलग से कार्यक्रम शुरू हुआ। इस तरह नेन को अपने प्रयासों में सफलता मिलती गई और उसके अभिक्रमों में बांस शिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, जैविक खेती, स्वच्छता के किफायत तरीके और घर की छतों पर वाटर हार्वेस्टिंग जैसे काम जुड़ते और बढ़ते चले गए। इस सबके बावजूद सेनो और बहल के लिए असली चुनौती युवाओं की सामाजिक-आर्थिक हैसियत में सुधार और पर्याप्त जागरुकता लाना था। यह काम यहां और यहां के लोगों के बीच करना इसीलिए भी आसान नहीं था, क्योंकि सामाजिक परंपराओं और रूढिय़ों की बेड़ी यहां खासी मजबूत थी। अच्छी बात यह रही कि इस बड़ी चुनौती से निपटने में इन दोनों महिलाओं को कुछ ही दिनों में कामयाबी मिलने लगी। यह सब हुआ इनके काम के तरीके और इन्हें मिल रही लोकप्रियता और सफलता से। नगा इलाकों में सरकारी कामकाज की सारी व्यवस्था ग्राम परिषद के हाथों में होती है। परिषद के सदस्य तमाम कार्यक्रमों को लागू कराने में ग्राम प्रधान (अंग) की मदद करते हैं। अलबत्ता महिलाओं को परिषद में जगह नहीं दी जाती। 

समान वेतन की मांग

सेनो और दूसरी महिलाओं ने अकुशल पुरुष मजदूरों के बराबर महिलाओं को भी मेहनताना देने की मांग की। जनवरी, 2014 को एक बड़े कदम के तौर पर ग्राम परिषद ने खेतिहर मजदूरों के लिए समान वेतन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। अगले साल एक और बड़ी कामयाबी तब हाथ लगी जब इनहुलुमी ग्राम परिषद में दो महिलाओं को शामिल करने की इजाजत मिली।

छिजामी में अपने अनुभव को साझा करते हुए हल बताती हैं, 'हम लोगों में से कुछ के लिए महिला सशक्तिकरण का मतलब यह है कि उन्हें अपने घर-परिवार के भीतर सम्मान मिले जो कि उन्हें आमतौर पर नहीं मिलता है। छिजामी में नेन की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि हमने महिलाओं के काम और योगदान को परिवार-समाज के भीतर सम्मान की नज़र से देखे जाने की दरकार को पुष्ट किया, इसे अमल में लाया। इस पूरी कवायद के पीछे मकसद यही था कि महिला खेतिहर मजदूरों, बुनकरों और गृहणियों के काम को उतनी ही इज्जत मिले, जितनी पेशेवर रसोइयों, अभिनेताओं, मुक्केबाजों, टैक्सी ड्राइवरों, मिस्त्री और यहां तक कि वकीलों और राजनेताओं को मिलती है। साथ ही महिलाओं को सार्वजनिक बहस, ग्राम परिषदों में शिरकत के अलावा अपनी पसंद का काम चुनने का हक होना चाहिए। अंतिम तौर पर कहें तो हमारी कोशिश यही रही कि महिलाओं को हर लिहाज से न्याय मिले। दुर्भाग्य से इस बारे में पर्वतीय अंचलों में स्थित बहुत अच्छी नहीं रही है और नगालैंड भी इसका अपवाद नहीं है।      

लोइन करघे की लौटी धूम

नेन ने 2008 में अपनी फ्लैगशीप स्कीम छिजामी वीव्स (बिनाई) लांच की। इसके तहत गांव में 300 से ज्यादा महिलाओं का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया गया। इस स्कीम के तहत लोइन करघे जैसे करघे के पुराने चल को प्रोत्साहन दिया गया। नतीजा यह कि देखते-देखते नाग शाल और पारंपरिक मेखला को बाजार में बड़ी शिनाख्त हासिल हुई। इससे पहले बनाई का यह शिल्प प्रचार-प्रसार और दूसरी बाजार की दरकारों में पिछडऩे के कारण दम तोड़ रहा था। देखते-देखते यह काम आगे बढ़ा और आगे स्टॉल, कुशन कवर, बेल्ट, बैग, टेबल मैट को देश के तमाम शहरों के इम्पोरियमों में येजा जाने लगा। दिल्ली और मुंबई से विशेषज्ञों को भेजा गया ताकि नए रंग-डिजाइन के और सामान बनाए जा सकें। इससे पहले ज्यादातर सामान लाल रंग के ही होते थे, क्योंकि यही पारंपरिक नगा रंग है। इस कोशिश का नतीजा यह रहा कि अब लाल के साथ सफेद और काले रंग का भी इस्तेमाल होने लगा। 

दिलचस्प है कि छिजामी एक मॉडल गांव बन चुका है। आसापास के गांव इससे खासे प्रभावित है। इसीलिए इनमें से कम से कम दस गांवों ने खुद के लिए उसी रास्ते का चुनाव किया जिस पर छिजामी पिछले कुछ सालों से कामयाबी के साथ आगे बढ़ रहा है।       

खाद्य सुरक्षा

छिजामी के लिए अगला कदम खाद्य सुरक्षा का था। पहाड़ी क्षेत्र में अन्न का उत्पादन जितना कठिन है, उसकी सुरक्षा उतनी ही ज्यादा जरूरी भी है। यह दरकार इसीलिए चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि यहां मैदानी हिस्सों से बिल्कुल अलग जलवायु रहता है। वर्षा और तापमान का चक्र भी यहां काफी अनियमित रहता है। इन सब हालात को देखते हुए नेन ने यहां बाजरे की खेती को प्रोत्साहित करने का फैसला किया। बाजरा विपरीत मौसम में भी जल्दी खराब नहीं होता है। इसी तरह पक्षियों और जानवरों के शिकार पर भी रोक लगाने की बात की गई। ग्राम परिषद ने इस सुझाव को हाथों-हाथ लिया और इसकी अवहेलना करने वालों पर जुर्माना लगाने का फैसला किया। इस तरह कुछ ही सालों में छिजामी विकास के लिहाज से एक आदर्श गांव बन गया।



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