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मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

दास्तान दास्तानगोई की

मुगलों के जमाने की दास्तानगोई आज वक्त की जरूरत बनती जा रही है। पढ़ाई से लेकर कमाई तक इसका इस्तेमाल अपनी-अपनी तरह से किया जाने लगा है

अजय एक मल्टीनेशनल कंपनी में क्लर्क के पद पर काम करता है। वह मीटिंग में अपने कंपनी के एमडी तथा अन्य वरिष्ठ लोगों के सामने खड़ा होकर कहानी सुना रहा है और सब लोग उसकी कहानी गौर से सुन रहे हैं। आप सोच रहे होंगे कि भला मीटिंग में कोई कहानी क्यों सुनाएगा और वह भी बॉस के सामने? यह सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लग रहा है, लेकिन सच है। कई मल्टीनेशनल कंपनियां और बड़े कॉरपोरेट हाउस अपनी योजनाओं को पेश करते वक्त कहानी का सहारा लेते है ताकि उपभोक्ताओं को योजना से होने वाले लाभ के बारे में आसानी से समझाया जा सके और कहानी के जरिए अपने जीवन से जुड़ाव महसूस करा सके। यह कोई नई चीज नहीं है, हिंदुस्तान में कहानियां सुनने और सुनाने की वर्षों पुरानी परंपरा रही है। मध्यकालीन भारत में दास्तानगोई का प्रचलन था। उर्दू में कहानी सुनाने की कला है दास्तानगोई। यह कला तो विलुप्त-सी हो गई थी, लेकिन एक बार फिर समाज में इसका प्रचलन बढ़ रहा है।

तकनीक के इस युग में भी आम जनमानस दास्तानगोई की पुरानी कला को खूब पसंद कर रहा है। दास्तानगोई फारसी भाषा के 'दास्तां’ और 'गोई’ शब्दों से मिलकर बना है। 'दास्तां’ का अर्थ होता है-कहानी और 'गोई’ का अर्थ होता है-सुनाना। किस्सा सुनाने वाले को दास्तानगो कहते हैं। दास्तानगो किसी दास्तान को जुबानी सुनाता है। इस कला को पुनर्जीवित करने में शमसुर रहमान फारु$की का अहम योगदान है। एक भुलाई जा चुकी कला को दोबारा जीवन देना आसान नहीं था, लेकिन शमसुर रहमान फारु$की और महमूद फारु$की ने इसे मुमकिन कर दिखाया। दास्तानगोई को हर आयुवर्ग के लोग बड़े चाव से सुनते हैं।

दास्तानगोई की कला मध्यकाल में ईरान से हिंदुस्तान आई। शमसुर रहमान फारु$की कहते हैं, 'कहने को तो जाहिर है कि यह फन ईरान से आया, लेकिन इसको लेकर कई मत और भी हैं। एक वर्ग का मानना है कि यह कला खुरासान से आई, वहीं रूसी लोगों का कहना है कि यह यूक्रेन से भारत आई।

दास्तानगो महमूद फारु$की कहते हैं, दास्तानें पहले अरबी में सुनाई जाती थीं और फिर फारसी में सुनाई जाने लगीं। लेकिन जब यह हिंदुस्तान में तशरीफ लाई तो फिर उसे उर्दू में सुनाने का सिलसिला चल निकला।

दास्तान सुनाने में समय अधिक लगता है। कुछ दास्तानगो दास्तान को जुबानी सुनाते है और कुछ उसी वक्त बनाकर सुनाते हैं। शमसुर रहमान फारु$की इसकी ताकत के बारे में कहते है, दास्तान की सबसे बड़ी ताकत इस बात में है कि मुझमें और आप में बराबर का रिश्ता है। मैं कह रहा हूं और आप सुन रहे हैं, आप मेरे हमख्याल हैं और मैं आपका हमख्याल हूं ।

मुगलों के शासनकाल में इस जबानी कला को बेहद इज्जत मिली। मुगल बादशाहों के दरबार में कई दास्तानगो रहते थे और उस जमाने में दास्तानगोई की महफिलें होती थीं। बादशाह अकबर के बारे में बताया जाता है कि वह दास्तानगोई के बड़े प्रशंसक थे और वह स्वयं एक दास्तानगों भी थे। अकबर ने दास्तानों की चित्रकारी करवाई थी। पहले जामा मस्जिद की सीढिय़ों पर हर जुमे के दिन दास्तानें सुनाई जाती थी। दुनिया भर में 'अलिफ-लैला’ और 'हातिमताई’ समेत तमाम दास्तानें सुनाई गईं, लेकिन उनमें 'दास्ताने अमीर हमजा’ सबसे मशहूर हुई। इसमें हजरत मोहम्मद के चाचा अमीर हमजा के स$फर तथा उनके साहसिक कारनामों का बयान किया जाता है ।

कैसे गुम हुई दास्तानगोई

मुगल शासनकाल के बाद जब देश पर अंग्रेजों का आधिपत्य बढ़ा तो दास्तानगोई की कला हाशिए पर पहुंच गई और धीरे-धीरे अपनी पहचान खोने लगी। उस वक्त कोई इस कला का कद्रदान नहीं था, जो इसे जि़ंदा रख सके। अंग्रेज़ों के प्रभाव में आकर कोई इस विरासत को बढ़ाने के लिए आगे नहीं आया। मनोरंजन के कई दूसरे साधन मसलन सिनेमा, मॉडर्न ड्रामा के चलन में आने के साथ किताबों की सुलभता से दास्तानगोई की पहचान कम होती चली गई। पहले लोग जिस कहानी को सुनते थे, किताबों के आने के बाद उसे पढ़ सकते थे। किताबों से लोगों को सहूलियत मिली। जब किताबें नहीं थीं उस वक्त दास्तान को बीच में छोड़कर चले जाने पर उसे दोबारा सुनना पड़ता था या फिर उसे सुन ही नहीं पाते थे। जबकि किताब आने के बाद यह बाध्यता नहीं रही।

कद्र से कद्रदान

दास्तान में लंबे किस्से या कहानियां सुनाए जाते हैं। श्रोताओं को बांधे रखने के लिए दास्तानगो तरह-तरह की तरकीब अपनाते हैं। दास्तनगो बात करते-करते अपनी आवाज और हाव-भाव बदलते हैं, जिससे श्रोता को धोखा महसूस होने लगता है और दर्शक सुनने में फिर से रूचि लेने लगता है। दास्तानगोई में आवाज़ों में उतार-चढ़ाव बहुत होता है। दास्तान सुनाते वक्त दास्तानगो अभिनय भी करता है मसलन यदि वह किसी बादशाह के बारे में वर्णन कर रहा है तो एक बादशाह का अभिनय करता है और यदि वह किसी बुजुर्ग के बारे में वर्णन करता है तो वह बुजुर्ग की तरह अभिनय करता है। इससे श्रोताओं का ध्यान भटकता नहीं है। दास्तानगो अपनी आवाज़, इल्म और अपने अभिनय से दर्शकों से बांध कर रखता है ।

वक्त के साथ बदली दास्तानगोई

1928 में दास्तानगो मीरबाकर अली का इंतकाल हो गया। वह आखिरी मशहूर दास्तानगो थे, जिन्होंने इस कला को नया मुकाम दिया। उनके इंतकाल के बाद यह कला विलुप्त हो गई थी। सन 2005 के आसपास जब इसे दोबारा शुरू करने की तैयारी होने लगी तो इसमें बदलाव की आवश्यकता भी महसूस की गई। इस लोगों ने यह निर्णय लिया कि अब इसमें एक नहीं, बल्कि दो दास्तानगो साथ में दास्तान सुनाया करेंगे। दास्तानगो के पहनावे और मंच की सजावट को अवधी की वेशभूषा मंच सज्जा से लिया गया। पहले ठेठ उर्दू भाषा में दास्तान सुनाए जाते थे, लेकिन इस बार परंपरागत भाषा से हटकर आम बोलचाल की हिंदुस्तानी भाषा रखी गई, जिससे आम लोगों को आसानी से समझ में आ सके।  जरूरत पडऩे पर इसमें क्षेत्रीय भाषाओं को भी शामिल किया गया। दास्तनगो दानिश हुसैन कहते हैं, जब ये दस्तानें दोबारा पब्लिक के सामने आईं, तो इसमें एक नयापन था, क्योंकि लोगों ने न चीजें देखी थी, न सुनी थी और न उनके बारे में कुछ जानते थे।



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