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बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

रजि़या के राज़

बड़े फिल्मकार की बड़ी विफलता यानी कमाल अमरोही की रजि़या सुल्तान में ऐसी कई खूबियां थीं, जिस वजह से हेमा मालिनी उस फिल्म को फिर से बनाने को बेताब हैं, बता रहे हैं असीम चक्रवर्ती

ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी ने यह कह कर सबको चौंका दिया था कि वह अपनी बेटी ईशा देओल को लेकर अपनी एक फिल्म 'रजि़या सुल्तान’ को फिर से बनाना चाहती हैं। अब यह दीगर बात है कि यह प्रोजेक्ट अभी भी ठंडे बस्ते में बंद है। हेमा कहती हैं, 'सात साल में बनी इस फिल्म की स्क्रिप्ट में कई कमियां रह गई थी, जिसे सुधार कर मैं फिल्म बनाना चाहती थी। पर दिन-रात की व्यस्तता के चलते आज तक इस फिल्म के लिए वक्त निकाल नहीं पाई हंू।’

 

फ्लॉप के बावजूद अहम

बहरहाल, 1983 की यह फिल्म अपने अंदर बहुत सारे राज़ समेटे हुए है। 1983 के अंत में प्रदर्शित फिल्मकार कमाल अमरोही की इस महा विफल फिल्म 'रजि़या सुल्तान’ के जिक्र पर एक आलोचक ने काफी रोचक टिप्पणी की थी, 'यह एक बड़े फिल्मकार की बड़ी विफलता है।’ इस वक्तव्य के संदर्भ में देखें, तो यह बॉक्स ऑफिस की एक बड़ी पराजय थी। दर्शकों ने इस फिल्म को पूरी तरह से खारिज कर दिया था। बावजूद इसके सिनेमाई संदर्भ में यह हमेशा एक अहम फिल्म मानी जाएगी। कमाल अमरोही ने अपनी पिछली फिल्म 'पाकीज़ा’ की तरह इस फिल्म की उत्कृष्टता में भी कोई कमी नहीं बरती थी। कमालिस्तान स्टूडियो में इसका भव्य मुहूर्त आज भी कई फिल्म वाले

याद करते हैं। इसका निर्माण भी इसी ढंग से

हुआ था।’

 

टेंटों में घुसते थे सांप

'पाकीज़ा’ की तरह तो नहीं, पर इस फिल्म के निर्माण में भी सात साल का लंबा वक्त लगा था। उस समय इसका बजट पांच करोड़ तक पहुंच गया था, जो उस दौर में कल्पनातीत बात थी। अपनी इस फिल्म से प्रेरित हेमा मालिनी आज भी इस फिल्म से जुड़ी कुछ यादों को नहीं भूली हैं-मैंने इस किरदार को जीवंत बनाने में अपनी ओर से कोई कमी नहीं बरती थी। इस फिल्म से जुड़े कुछ अनुभव तो बेहद रोमांचक थे। जैसे रेगिस्तान में इसके युद्ध दृश्यों के फिल्मांकन के दौरान सांप, बिच्छू सहित कई जहरीले जीव-जंतुओं से हमारा पाला पड़ा। यहां तक कि हमारे टेंटो में भी सांप घुस आते थे। शूटिंग के दौरान बाकायदा चार-पांच संपेरों को रखा गया था। ऐसे कई और रोचक अनुभव थे जिस वजह से मैं इस फिल्म की शूटिंग और अपने कैरेक्टर को कभी नहीं भूल पाऊंगी।’

 

स्ंावाद पड़े भारी

दिल्ली के तख्त पर बैठी रजि़या सुल्तान और उसके हब्शी प्रेमी याकूत की प्रेम कहानी इतिहास का एक दिलचस्प अध्याय है। कमाल साहब ने इसे सेल्यूलाइड का रंग दे कर इसे और ज्यादा ऐतिहासिक बना दिया था। लेकिन इसके उर्दू-फारसी मिश्रित संवाद आम दर्शकों के पल्ले नहीं पड़े। असल में कमाल अमरोही उस दौर को जीवंत रंग देना चाहते थे। इस जीवंतता के चक्कर में ही आम दर्शकों की बात वे एकदम भूल गए। वह चाहे 'मुगल-ए-आज़म’ हो या 'पाकीज़ा’ शुद्ध उर्दू में लिखे गए कमाल साहब के संवादों का कोई जवाब नहीं था, पर 'रजि़या सुल्तान’ में उन्होंने इसे गूढ़ रंग दे दिया। फिल्म के लंबे-लंबे संवादों ने एक सच्ची प्रेम कहानी का साथ नहीं दिया। यह फिल्म सिर्फ  अपनी भव्यता की वजह से सराही गई।

 

धर्मेंद्र-हेमा ने शर्तें नहीं मानी

'पाकीज़ा’ की बात जाने दें, तो जब 'रजिया सुल्तान’ प्रदर्शित हुई, तो इसकी मुख्य हीरोइन हेमा मालिनी का क्रेज काफी कम हो चुका था। जहां तक कमाल अमरोही का सवाल था, वे 'पाकीज़ा’ की सफलता से काफी उत्साहित थे। इसीलिए वे अपनी इस फिल्म को जल्द से जल्द पूरा कर लेना चाहते थे। कमाल साहब एक ही शॉट को कम से कम दो एंगल से लेना पसंद करते थे। फिर भी उन्होंने ऐसा शूटिंग शिड्यूल रखा था कि दो साल के अंदर यह फिल्म पूरी हो कर प्रदर्शित हो जाए। शूटिंग से पहले उन्होंने सारे कलाकारोंं की तारीखें फाइनल कर ली थी। पर धर्मेंद्र और हेमा मालिनी के असहयोगी रुख के चलते इस फिल्म के निर्माण में पांच साल से ज्यादा का वक्त लग गया।

   खास तौर से धर्मेंद्र को उन्होंने तीन शर्तों में बांधा था-पहला, हर माह में फिल्म के लिए दस दिन देंगे। दूसरा, बिल्कुल सही समय पर सेट पर पहुंचेंगे। तीसरा, निर्माण के दौरान किसी भी तरह की व्यवसायिक बातें नहीं करेंगे। मगर अफसोस की कमाल साहब की भरपूर इज्जत करने के बावजूद धर्मेंद्र इन शर्तों को पूरी तरह से मान नहीं सके और शूटिंग शिड्यूल कई बार लडख़ड़ा गया।

 

चार कैमरों से हुआ शूट

 भव्यता के मामले में 'रजि़या सुल्तान’ कमाल साहब की पिछली कई फिल्मों से आगे थी। फिल्म के हर फ्रेम को मूल्यवान बनाने में कोई कमी नहीं बरती गई थी। खास तौर से इसके युद्ध दृश्यों को आज तक सिने प्रेमी याद करते हैं। जयपुर से लगभग पचास किलोमीटर दूर ताला गांव में युद्ध का फिल्मांकन किया गया था। सखून यानी रात में होने वाले युद्ध के लिए हजारों आग के गोलों का प्रबंध किया गया था। पच्चीस-पच्चीस फीट लंबी पचास लकड़ी की ऊंची मीनारें बनवाई गईं। इन मीनारों पर बैठे रजि़या सुल्तान के सैनिक शत्रु सेना पर गोले बरसाते थे। सात हजार पोशाकें, चार हजार तलवार, उतने ही भाले, हजारों तीर, ढालें, घोड़ों और ऊंटों आदि युद्ध संबंधित सारी चीजों को युद्ध स्तर पर इक_ा किया गया। फिर भी कमाल साहब संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस युद्ध के लिए डेढ़ हजार घोड़े और पांच सौ ऊंटो की मांग की थी, पर उन्हें मिले सिर्फ  आठ सौ घोड़े और दो सौ ऊंट। इस पूरे युद्ध दृश्य का फिल्मांकन चार कैमरे से दिग्गज कैमरामैन आर.डी.माथुर ने किया था।

 

दुर्घटनाएं भी हुई

छोटी-छोटी दुर्घटनाओं की बात जाने दे, तो इसकी शूटिंग के दौरान कई बड़ी दुर्घटनाएं भी होते-होते बचीं। फिल्म में एक ऐसा दृश्य है, जब रजि़या अपने लाव लश्कर के साथ रेगिस्तान से गुजरती है और रेगिस्तानी तूफान में फंस जाती हैं। जैसलमेर से आठ किलोमीटर दूर रण में जहां इसकी शूटिंग की गई थी, वहां भारी भरकम कई बिजली के पंखें और जेनरेटर का इंतजाम किया गया। वहां के स्थानीय लोगों ने समझाया कि यहां सांप, बिच्छू के अलावा खतरनाक बिचटबाबडा का आतंक है। मगर कमाल साहब ने सब कुछ जानते हुए भी जोरदार तैयारी के साथ यहीं शूटिंग की।

  पंखों की सहायता से रेगिस्तान में तूफान को क्रिएट किया। इससे ऊंट और घोड़े भड़क गए। पर कमाल साहब ने इसी भगदड़ को कैमरे में कैद कर लिया। ऐसी ढेर सारी और वजहें हैं जिनके चलते 'रजि़या सुल्तान’ आर्थिक विफलता के बावजूद एक क्लासिक के रूप में सराही जाती है। पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि 'पाकीज़ा’ की तरह मधुर संगीत ने इसका साथ नहीं निभाया। सुरीले संगीतकार खय्याम इस फिल्म का सुर नहीं साध पाए।



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