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बुधवार, 21 नवंबर 2018

पेड़ लगाओ, बेटी पढ़ाओ

बेटी और पेड़ दोनों का पालन करने से जिंदगी कितनी आसान और खुशहाल हो जाती है, यह समझने के लिए पिपलांत्री को जानना जरूरी है। बेटी और पेड़ का लालन-पालन कर यह गांव देश के लिए एक मिसाल बन गया है

राजस्थान का एक गांव जहां के अपने नियम है। यहां के लोगों का अपना गणतंत्र है। आज यहां पानी सिर्फ 4 से 5 फीट पर मिलता है।  राजसमन्द जिले का यह गांव पिपलांत्री है।  दो हजार लोगों की आबादी वाले इस गांव में जब भी किसी लड़की की जन्म होता है, तो 111 पेड़ लगए जाते हैं। ये पेड़ लड़की का परिवार ही लगाता है। इसके बदले पूरे गांव से 21 हजार रुपए इक_ा किए जाते हैं और 10 हजार लड़की के पिता को दिए जाते हैं। कुल 31 हजार रुपए लड़की नाम पर 20 वर्षांे के लिए फिक्स कर दिया जाता है, जो उस लड़की की पढ़ाई लिखाई या फिर शादी पर खर्च किया जाता है। इसके बदले में लड़की के पिता को एक शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करना होता है। शपथ-पत्र पर लिखा होता है कि वह अपनी लड़की का अच्छे से लालन-पालन करेगा, उसे ठीक से पढ़ाएगा, उसकी शादी सही समय पर करेगा और जो 111 पेड़ वह लगाएगा उनका भी ध्यान रखेगा। 20 साल के बाद जब पिता इन पैसों को निकालने के लिए पहले पंचायत की अनुमति लेनी होती है, ताकि इस बात का ध्यान रखा जाए की पैसे लड़की पर ही खर्च किए जाएंगे। इस तरह लड़की और पेड़ दोनों ही सुरक्षित हो जाते हैं।

गांव के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल ने इस तरह के कायदे-कानून बनवाने की पहल की थी। दरअसल पालीवाल की बेटी किरण का 2006 में पानी से होने वाली बीमारी की वजह है निधन हो गया था। उस समय किरण सिर्फ 16 साल की थी। तभी पालीवाल ने यह प्रण लिया कि जो मुझ पर बीती है वह किसी दूसरे पिता को कभी न भुगतना पड़े। इसके बाद ही वेे अपने मिशन ने जुट गए, तभी से पेड़ लगाने और लगवाने का सिलसिला शुरू हो गया। तब से अब तक सिर्फ दस साल में ही चार लाख एकड़ में पेड़ लगाए जा चुके हैं। इनमें नीम, आंवला, आम, शहतूत और चीकू जैसे फल के पेड़। वट, शीशम, नीलगीरी और बबूल जैसे मजबूत पेड़ इसके साथ ही हरड़, बहेड़ा, आंवला के साथ-साथ एलोवेरा जैसे औषधियों के पौधे भी शामिल हैं। इस नियम ने गांव की तस्वीर ही बदल कर रख दी है। लोगों को न सिर्फ छाया मिली है, बल्कि इससे रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं।

पालीवाल कहते हैं कि गांव के लोगों ने ढ़ाई लाख के आसपास एलोवेरा के पेड़ लगा दिए, हमें पता ही नहीं था कि आखिर इतने एलोवेरा का करना क्या है? तभी मैं एक दवा की दुकान में गया और एलोवेरा के कई उत्पाद देखे। मेरे मन में विचार आया कि हम भी अपने उत्पाद बनाकर लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करेंगे। इसके बाद गांव की महिलाओं को एलोवेरा से उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। आज महिलाएं जेल, अचार, जूस जैसे कई उत्पाद बनाकर बजार में बेच रही रहीं है। आज कई लोगों का परिवार तो सिर्फ इसी काम पर पल रहा है। इस मुहिम की वजह से गांव में परिवर्तन की बयार चल पड़ी है। इस कुटीर उद्योग में काम करने के बाद यहां के लोगों की जिंदगी बेहतर हो गई है। आर्थिक रूप से समाज में इनका कद भी बढ़ गया है। इस संस्था में काम करने वाली सरला कहती हैं कि इस काम से हमारे जीवन में काफी बदलाव आए हैं। हम साफ-सुथरी जगह में इज्जत से रहते हैं। हम परिवार को आर्थिक रूप से भी मदद करते हैं। मेरे काम के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने मुझे पुरस्कार भी दिया है। पहले सिर्फ घर के काम में रमी रहने वाली सरला पुरस्कृत होने पर गद्गद् हैं। उनके बच्चे उन पर गर्व करते हैं।

इस पंचायत का एक और नियम है, यहां बेटियों के पैदा होने पर भी बेटों जैसा जश्न मनाया जाता है। कई बार तो इस जश्न का पैसा भी गांव पंचायत ही देती है। ऐसा करने के पीछे मंशा अनुपात को संतुलित करने का है। आज राजस्थान में 1000 लड़कों के मुकाबले सिर्फ 928 लड़कियां हैं। हम चाहते हैं कि लड़कियों की संख्या बढ़े ताकि संतुलन बना रहे।

बढ़ता स्तर

इस गांव को हरा-भरा और खुशहाल करने के लिए पानी का होना बहुत जरूरी था। इस पानी की कमी को पूरा करने के लिए जगह-जगह पर डैम और जलाश्य बनाये गए हैं। इन में बारिश का पानी और झडऩे से आने वाले पानी को भरा जाता है। इसी पानी का उपयोग फिर खेती के लिए होता है। इन जलाशयों की वजह से इस गांव में भूजल का स्तर भी बढ़ गया है।

पहले जहां पानी के लिए 30 फीट तक खोदना पड़ता था, अब सिर्फ 4 से 5 फीट की खुदाई के बाद ही आपको पानी मिल जाएगा। ये सब सर्फ 3 साल के भीतर हुआ है। जब आप गुगल के अर्थ ऐप पर जाकर इस गांव को देखेंगे तो पानी के स्रोत आपको साफ दिखेंगे जो पहले नहीं थे। गांव के बुजुर्ग खुमान सिंह गांव के पंचों में शामिल रहे हैं। इनकी आंखों में गर्व और होंठो पर मुस्कान बिखर जाती है, जब वे अपने गांव में आए बदलाव पर बात करते हैं। वे कहते हैं, 'हमारी तो उम्र 80 साल है, हमने इस गांव में पानी की किल्लत देखी है, यहां कभी सूखा हुआ करता था। ये सारे बदलाव मेरी आंखों के सामने हुए हैं। हम पहले से ज्यादा सुखी और समृद्ध हो गए हैं। बच्चों को नौकरी के लिए घर से बाहर नहीं जाना होता है।

एक बदलाव बहुत सारे बदलावों का जनक होता है। जैसे ही हमारी एक जरूरत पूरी होती है। हम दूसरे के लिए प्रयास शुरू कर देते हैं। यही वजह है कि आज इस गांव का हर घर सुंदर और शौचालय सहित है। यही नहीं गांव के लड़कियां बेहिचक स्कूल जा सकें। इसीलिए गांव के स्कूल में लड़की और लड़कों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था की गई है। दसवीं क्लास की पूजा व्यास खुश हो कर कहती है, 'अब स्कूल जाना अच्छा लगता है। स्कूल में हमारे लिए अलग से शौचालय है। पहले लड़कों के साथ शेयर करना पड़ता था, तो हिचक होता थी।

अब मैं और मेरी सहेलियां काफी खुश हैं।’  कहते हैं संपन्नता अपने साथ सुख साथ लेकर आता है। पानी की किल्लत खत्म होने की वजह से ज्यादातर लोगों की खेती-बारी अच्छी चल रही हैं। जो लोग शराब पीकर हंगामा मचाने के लिए मशहूर थे। आज वे अपने बगान और फलों के लिए जाने जाते हैं। खेड़ सिंह राजपूत खुद कहते हैं कि मैं हर रोज शराब पीता था। पीने के बाद लड़ाई झगड़ा भी आम बात थी। फिर मैंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को तरक्की करते देखा। उन्हें देखकर मेरे अंदर भी बदलाव आया। अब मेरा सिर्फ एक है शौक है और वो है मेरा बागान। मैंने अपने बागान में कई तरह के फलदार पेड़ लगाए हैं। पिपलांतरी में क्राइम न के बराबर है। पिछले तीन साल के दौरान थाने में एक भी केस दर्ज नहीं कराया गया है।

इन सब बदलावों और विकास की वजह से इस गांव को 'प. दीन दयाल उपाध्याय निर्मल ग्राम’ पुरस्कार मिला है। नियम तो सिर्फ एक बना था लड़की के जन्म के साथ पेड़ लगाने का, लेकिन एक नियम बहुत सारे बदलाव ले आया।

अब श्याम सुंदर पालीवाल चाहते हैं कि उनके गांव में सरकार पर्यावरण मेला लगाए। जिसमें तरह-तरह के बीज और पौधों की प्रदर्शनी हो। किसान इन बीजों को खरीद सकें।  और हम अपने काम बड़े-बड़े लोगों को दिखा सकें। पर्यावरणविद्, पर्यावरण से जुड़ी बातों पर बात करें और उसके उपाय सुझाएं। 



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