sulabh swatchh bharat

शुक्रवार, 22 जून 2018

सौ करोड़ का फंडा

जो गुजर गई, कल की बात थी, उम्र तो नहीं बस एक साल थी...लेकिन हमारे मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री के साल का हिसाब-किताब बहुत अनूठा होता है। फिल्मों की कमाई, सितारों का स्टारडम, कैसा रहा फिल्मों का स्तर आदि कई बातें इस विश्लेषण के साथ सहज ही जुड़ जाती हैं। जाहिर है, ऐसे में साल के 365 दिनों का हिसाब-किताब थोड़े विस्तार की मांग करता है। चलिए, इस पर एक सिलसिलेवार नज़र डालें।

सिर्फ एक बड़ी हिट

 'वजीर  , 'चक एन डस्टर  , 'एयरलिफ्ट  , 'जुगनी  , 'क्या कूल हैं हम-3  , 'साला खडूस  , 'मस्तीजादे  , 'सनम तेरी कसम   आदि साल के शुरू के इन तीन महीने की रिलीज फिल्मों पर नज़र डाले तो घोर हताशा होती है। इस दौरान एक दर्जन से ज्यादा फिल्में दर्शकों के बीच में आई, पर इनमें से, 'एयरलिफ्ट   और 'साला खडूस   को ही दर्शनीय फिल्म की श्रेणी में रखा जा सकता है। वैसे बिजनेस के मामले में 'साला खडूस   ने जहां औसत बिजनेस किया, वहीं 'एयरलिफ्ट   साल की पहली सौ करोड़ी वाली फिल्म बनी। शायद 49की उम्र में अभिनेता अक्षय कुमार ही यह करिश्मा दोहरा सकते हैं।

और भी ज्यादा बेकार रहा

जहां साल की शुरुआत सौ करोड़ी हिट फिल्म से हुई थी, वहीं साल के अगले तीन माह फिल्मों के लिए और भी बेकार रहे। इन तीन महीनों में 'घायल वन्स अगेन  , 'फितूर  , 'नीरजा  , 'अलीगढ़  , 'जय गंगाजल  , 'कपूर एंड संस  , 'रॉकी हैडसम  , 'की एंड का  , 'फैन  , 'निल बटा सन्नाटा  , 'बागी  , 'वन नाइट स्टैंड   ा

जैसी कई छोटी-बड़ी फिल्में रिलीज हुई। पर इनमें से कोई भी फिल्म सौ करोड़ी फिल्मों के करीब तक भी नहीं पहुंच पाई। दुखद स्थिति इनमें से 'नीरजा   के अलावा किसी भी फिल्म को अच्छी फिल्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। सबसे ज्यादा निराशा 'घायल वन्स एगेन  , 'फितूर  , 'फैन   और 'की एंड का   ने किया। 'घायल वन्स अगेन   में उम्दा अभिनेता सन्नी देओल ने फिर साबित किया कि वह बहुत खराब निर्देशक हैं। 'कोई पोची   के बाद बड़े दावे करने वाले निर्देशक अभिषेक कपूरकी 'फितूर   ने उनकी सारी हवा निकाल दी। इस फिल्म के बाद यह साबित हो गया कि वह अभी भी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं, कि किसी कठिन विषय वाली फिल्म को संभाल सके। दूसरी ओर 'फैन   ने शाहरुख को पहली बार यह एहसास दिला दिया कि उनका क्रेज अब ढलानपर है। इसी साल रिलीज उनकी फिल्म 'डियर जिंदगी   ने इसकी पुष्टिï कर दी। इस फिल्म की 60 करोड़ की कमाई तो इस बात को इंगित करती है। 'की एंड का   के निर्देशक आर बाल्की ने 'शमिताब   के बाद फिर इस बात का संकेत दिया कि वह अपनी रिदï्म की खो चुके हैं। अच्छे निर्देशकों के अकाल से ग्रस्त इंडस्ट्री के लिए यह बुरे दिन के संकेत हैं।

छाई रही 'सुल्तान 

हमेशा की तरह इस साल भी कई फिल्में रिलीज हुई, लेकिन बोलबाला सिर्फ एक फिल्म 'सुल्तान   का रहा। सलमान खान की 'सुल्तान   ने पूरे विश्व में 564 करोड़ रुपए और सिर्फ भारत में 320 करोड़ रुपए की कमाई कर फिर इस बात को साबित कर दिया कि हमारे देश के दर्शक कितने मनोरंजन प्रेमी है। लेकिन वे मनोरंजन के नाम पर कोई भी अंट-शंट फिल्म कबूल नहीं करते हैं। '1920 लंदन  , 'अजहर  , 'सरबजीत  , 'वीरप्पन  , 'हाउसफुल-दो  , 'दो लफ्जों की कहानी  , 'तीन  , 'उड़ता पंजाब  , 'रमन राघव  , 'ग्रेट गैंड मस्ती  , 'मदारी  , 'ढिशूम   आदि फिल्मों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन तो यही दर्शाता है। चूंकि 'हाउसफुल-3   की कॉमेडी बेहद भोंडी किस्म की थी, इसीलिए इसे 80 करोड़ की कमाई से ही खुश होना पड़ा। वैसे इस दौरान 'सरबजीत  , 'वीरप्पन  , 'उड़ता पंजाब  , 'रमन राघव  , 'मदारी   अच्छी फिल्में भी रिलीज हुई, पर मल्टीप्लेक्स की मेहरबानी से दर्शकों ने इस फिल्म पर पैसे खर्च करना मुनासिब नहीं समझा। आज का सच यही है। पैसा खर्च करके फिल्म देखने वाले दर्शक गौरी शिंदे, अभिषेक चौबे, अनुराग कश्यप, अनिरुद्ध राय चौधरी, रिपु दासगुप्ता, दिवाकर बनर्जी जैसे निर्देशकों को यही सजा दे रहे हैं। असल में मल्टीप्लेक्स वाले इन फिल्मों की टिकट दर इतना ज्यादा रखते हैं कि फिल्म में मनोरंजन की तलाश करने वाले सजग दर्शकों की जेब ऐसी डेढ़-दो घंटे की फिल्मों पर अपना पैसा खर्च नहीं करना चाहता है। ऐसे में वह इंद्र कुमार की सेक्स कॉमेडी 'ग्रेट गै्रंड मस्ती   में पैसे खर्च करना ज्यादा ठीक समझता है। विडंबना यह रही कि यह फिल्म रिलीज होने से पहले ही इंटरनेट में लीक हो गई। जबकि कई टे्रड पंडित इस फिल्म की संभावित कमाई सौ करोड़ मान कर चल रहे थे। बहरहाल, फिल्म अच्छी हो या बुरी, किसी भी फिल्म के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। हर फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने का पूरा हक है।

फिर एक हिट

फिल्मों के रिलीज के मामले में दो अहम माह अगस्त-सितंबर में 'मोहेन जोदडो  ,'रुस्तम  , 'हैप्पी भाग जाएगी  , 'फ्लाइंग जट  , 'अकीरा  , 'बार-बार देखो  , 'फ्रिकी अली  , 'राज रिबूट  , 'पिंक  , 'बैंजों  , 'वाह ताज  , 'धोनी  ,-'अनटोल्ड स्टोरी   आदि डेढ़ दर्जन से ज्यादा फिल्मों ने भी वही पुराना रिकार्ड दोहराया। पर अक्षय कुमार ने फिर बाजी जीत ली। उनकी फिल्म रुस्तम, ने 123 करोड़ का बिजनेस करके फिर सबको चौकाया। बाकी सारी फिल्मों 'अकीरा  , 'बार-बार देखो  , 'राज रिबूट  , 'पिंक   को औसत हिट फिल्म की श्रेणी में रखा गया। जैसे 20 करोड़की 'अकीरा   ने 30 करोड़ का बिजनेस किया। जिसे कहीं से भी अच्छा नहीं कहा जा सकता है। सबसे ज्यादा अफसोस 100 करोड़ में बनी आशुतोष गोवारिकरकी फिल्म 'मोहेन जोदड़ो   के लिए होता है। क्योंकि यह फिल्म 67 करोड़ का बिजनेस करके अपनी लागत भी वसूल नहीं पाई थी। दूसरी ओर करण जौहर की शकुन बत्रा द्वारा निर्देशित फिल्म 'बार-बार देखो   को इस सालकी सबसे बोर फिल्म का खिताब मिला।

बड़े दावे खोखले साबित हुए

अक्टूबर से दिसंबर ये वे तीन माह थे, जिनमें कई दिग्गजों को मात खानी पड़ी। अजय देवगन की 'शिवाय  , करण जौहर की 'ए दिल है मुश्किल   और शाहरुख की 'डियर जिंदगी   सौ करोड़ की बिजनेस करने से बहुत दूर रही। इससे यह बात फिर साबित हो गई कि कोई बड़ा नाम किसी फिल्म के लिए कुछ हद तक ही क्रेज बनता है। 'मिर्जिया   के निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने जरूर इससे सबक लिया होगा। 'तूतक-तूतक तूतिया  , 'सात उचक्के  , 'रॉक ऑन-2  , 'तुम बिन-2  , 'फोर्स-2  , 'कहानी-2  , 'बेफ्रिके   में बिल्कुल अलग ट्रैक पर दौड़ते हुए नज़र आए। इस फिल्म ने आदित्य के नाम के चलते बिजनेस तो ठीक-ठाक किया, पर आदित्य की काबिलियत पर अब जरूर एक प्रश्नचिन्ह लग गया है। इसी तरह से जहीन निर्देशक सुजॉय घोष इस बार 'कहानी-2   में पीछे रह गए। लेकिन परफैक्शनिस्ट आमिर के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। उनकी नई फिल्म 'दंगल   ने कुछ दिनों में ही बड़ी आसानी से सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया।

शाहरुख अपना जादू खो चुके हैं

बीते साल शाहरुख के स्टारडम के लिए सबसे बुरा रहा है। अब ऐसा कहा जा रहा है कि किंग खान अपना जादू खो चुके हैं। इस साल रिलीज उनकी दोनों फिल्मों 'फैन   और 'डियर जिंदगी   के बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट को बिल्कुल संतोषजनक नहीं का जा सकता है। दूसरी ओर अपनी अंट-शंट बयानबाजी के चलते भी उनके प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग उनसे कट गया है। यह बात भी उनके स्टारडम के लिए गलत साबित हुई है।

सही ट्रैक पर जा रहे हैं अक्की

अक्षय की इस मामले में जितनी भी तारीफ की जाए कम है। इधर कुछ साल से बहुत समझदारी का परिचय देते हुए उन्होंने संजीदा निर्देशकों का दामन बहुत अच्छी तरह से थाम रखा है। 'एयरलिफ्ट  , 'रुस्तम   जैसी फिल्में करके वह अपने पोजिशन को बखूबी बनाए हुए है। इस साल भी 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा  , 'क्रेक   जैसी अलग-थलग फिल्में में दिखाई पड़ेंगे।

सबसे ऊपर अनुष्का

वह चाहे 'सुल्तान   हो या 'ए दिल है मुश्किल   इस साल की इन दोनों फिल्मों में अभिनेत्री अनुष्का शर्मा पूरे नंबर से पास हुई हैं। इस साल नंबर एक अभिनेत्री दीपिका की कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई। दूसरी ओर प्रियंका की 'जय गंगाजल   को भी बेहद उल्लेखनीय नहीं कहा गया। ऐसे में अनुष्का को अच्छा मौका मिला। उन्होंने उस मौके का लाभ बहुत अच्छी तरह से उठाया। इस समय उनका स्टारडम चरम पर है। वह इन दिनों सारी बड़ी फिल्मों में एंट्री ले रही है।

छोटी फिल्मों ने फिर हताश किया

बीते साल भी अच्छी-खासी छोटी फिल्मों का जमावड़ा रहा। सौ से ज्यादा फिल्में दर्शकों के बीच में आई। इनमें से ज्यादा फिल्में ऐसी हैं जिनके नाम भी सिने प्रेमी को याद नहीं है। यह वह छोटी फिल्में हैं जिनका बजट अमूमन एक करोड़ से पांच करोड़ तक होता है। ट्रेड पंडित आमोद मेहरा कहते हैं, 'इन फिल्मों के निर्माण के पीछे का मुख्य ध्येय यह होता है कि यह फिल्में यह कमाई भी नहीं कर पाती हैं।

ज्यादातर मल्टीप्लेक्स में इनके शो कैंसिल होते रहते हैं। एक शो को चलाने के लिए पांच से दस दर्शकोंकी जरूरत पड़ती है, विडंबना देखिए कि इन्हें यह दर्शक भी आसानी से नहीं मिलते हैं।   अब यह दर्शक क्यों नहीं मिलते हैं, इस पर एक लंबी चर्चा फिर कभी। वैसे इस साल की ढेरों रिलीज फिल्मों में से 'चॉक एन डस्टर  , 'साला खडूस  , 'नीरजा  , 'अलीगढ़  , 'निल बटा सन्नाटा  , 'दो लफ्जों की कहानी  , 'मदारी   जैसी छोटी फिल्मों की ही सराहना हुई। मगर बिजनेस के मामले में 'साला खडूस  , 'नीरजा  , 'मदारी   की कमाई को ही संतोषजनक कहा जा सकता है।

कहां है निर्देशक

यह साल एक और कटु सच बयां कर गया। अब यह बात बिल्कुल साबित हो चुकी है कि अभिषेक चौबे, अनुराग कश्यप, गौरी, रेमो डिसूजा, शकुना बत्रा, निशिकांत कामथ, फरहाद-साजिद, मनीष शर्मा, रवि जाधव, सुहैल खान आदि वे निर्देशक नहीं हैं, जिनके सहारे फिल्म इंडस्ट्री को चलाया जा सके। आज तो राज  कुमार हिरानी, संजय लीला भंसाली, नीरज पांडे, रोहित शेट्टïी, कबीर खान, विक्रम भट्टï जैसे कमॅर्शियल फिल्म निर्देशकों की सख्त जरूरत है। जैसा कि ग्रेट शो मैन राज कपूर ने कभी कहा था कि हम यदि मॉस फिल्में नहीं बनाएंगे, तो फिल्म इंडस्ट्री का आर्थिक तंत्र कैसे सुचारू रूप से चलेगा। ऐसे में पिछले साल जिस तरह से कुछ-एक ही बड़ी हिट फिल्में इंडस्ट्री को मिली है, यह सवाल फिर शिद्दत से उभर कर शीर्ष पर आ गया है।



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो