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मंगलवार, 14 अगस्त 2018

जिंदगी का ग्रीन सिग्नल

चिकित्सा जगत की बेहतरीन तकनीक 'ग्रीन कॉरिडोर’ न केवल कम समय में अगों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक पहुंचाने में मदद करता है। बल्कि कई लोगों को नई जिंदगी देने का भी काम कर रहा है

दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में जिंदगी से जंग लड़ता मासूम अभिराज। हृदय की गंभीर समस्या से जूझ रहे इस मासूम के लिए हार्ट ट्रांसप्लांट के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था। अपने घर के इकलौते चिराग को बचाने के लिए घरवाले हार्ट की तालाश हर जगह किए, लेकिन सिवाए निराशा के कुछ हाथ नहीं लगी। निराशा में डूबे अभिराज के पिता को आशा की किरण दिखाई उनके डॉक्टर ने। जब डॉक्टर ने उन्हें बताया कि शहर के ही एक अन्य अस्पताल में एक ब्रेन डेड मरीज दीपक है, जिसके परिजन उसका अंग डोनेट करना चाहते हैं। दीपक का हार्ट अभिराज की बॉडी में ट्रांसप्लांट करने की बात हुई, लेकिन इन दोनों अस्पतालों के बीच की लंबी दूरी सबसे बड़ी बाधा बन रही थी। 20 किमी की लंबी दूरी का पता चलते ही आशा की किरण फिर से धुंधली नजर आने लगी। हेवी ट्रैफिक जाम की स्थिति में समय रहते हार्ट ट्रांसप्लांट (हृदय का प्रत्यारोपण) होना किसी चुनौती से कम नहीं थी। महज कुछ मिनट में दीपक की धड़कन रुकने वाली थी। ऐसे में उस दिल की धड़कन रुकने से पहले अभिराज में इसका प्रत्यारोपण करना किसी जंग से कम नहीं था, लेकिन डॉक्टरों की सुझबूझ और पुलिस की मदद से इस असंभव से दिखने वाले काम को हकीकत में बदला जा सका। यह सब संभव हो पाया 'ग्रीन कॉरिडोर’ की वजह से। एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक सही समय में हार्ट लाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। 20 किलोमीटर की लंबी दूरी महज 16 मिनट में तय की गई और समय रहते दिल का प्रत्यारोपण करके मासूम अभिराज को एक नई जिंदगी दी गई।

ग्रीन कॉरिडोर की वजह से न केवल अभिराज को एक नई जिंदगी मिली, बल्कि देश में कई लोगों को इस कॉरिडोर ने नया जीवनदान दिया है। दिल्ली के अलावा चेन्नई, इंदौर, भोपाल, जयपुर, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे और कई अन्य शहरों में समय-समय पर ग्रीन कॉरिडोर बनाकर जरुरतमंदों को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई गई है। अभी पिछले दिनों ही (17 जनवरी को) इंदौर में 15वीं बार ग्रीन कॉरिडोर बनाकर ब्रेन डेड मरीज भूपेंद्र्र सिंह रजावत के अंगों का प्रत्यारोपण कई जरुरतमंदों में कर उन्हें नई जिंदगी दी गई। चिकित्सा जगत की इस बेहतरीन तकनीक ने कई लोगों को नई जिंदगी देने का काम किया है।

क्या है ग्रीन कॉरिडोर

मेडिकल इमरजेंसी में ग्रीन कॉरिडोर का इस्तेमाल किया जाता है। जब किसी मरीज को तत्काल चिकित्सा सुविधा मुहैया करवानी हो या दिल, लीवर या किडनी जैसे संवेदनशील अंगों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में कम समय में पहुंचाना हो। वैसी स्थिति में ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाता है। हार्ट अटैक से जूझ रहे मरीजों को अविलंब चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए भी ग्रीन कॉरिडोर का इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल दिल, लीवर जैसे संवेदनशील अंग किसी इंसान के शरीर से निकलने के बाद बहुत जल्दी निष्क्रिय हो जाते हैं। ऐसे में एक व्यक्ति के शरीर से दूसरे व्यक्ति में इन अंगों के ट्रांसप्लांट के लिए समय का काफी खास ध्यान रखना जरूरी होता है। अगर दोनों अस्पतालों के बीच दूरी अधिक हो तो उस स्थिति में समय रहते अंग को नियत अस्पताल पहुंचाना और उसका प्रत्यारोपण करना किसी चुनौती से कम नहीं। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए ही ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाता है। दरअसल ग्रीन कॉरिडोर एक रूट (मार्ग) होता है, जो अस्पताल प्रबंधन, स्थानीय पुलिस और ट्रैफिक पुलिस के आपसी सहयोग से कुछ समय के लिए बनाया जाता है। ट्रैफिक पुलिस की मदद से कुछ नियत समय के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के बीच के रास्ते में ट्रैफिक रोक दिया जाता है। सभी सिग्नल को मैन्युअल कर दिया जाता है और प्रशिक्षित और अनुभवी ड्राइवर एंबुलेंस के जरिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक अंगों को या मरीजों को पहुंचाने का काम किया जाता है। ऐसा करके कम से कम समय में मरीज को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराकर जिंदगी बचाई जाती है।

चेन्नई से शुरुआत

कम से कम समय में मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए विदेशी मुल्कों में काफी समय से ग्रीन कॉरिडोर का रास्ता अपनाया जाता है, लेकिन भारत में पहली बार 2014 में चेन्नई में हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। गवर्नमेंट हॉस्पिटल से फोर्टिस मलार हॉस्पिटल में हार्ट ले जाने के लिए 12 किमी का ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। हेवी ट्रैफिक वाले इस रास्ते की दूरी आमतौर पर 45 मिनट में तय की जाती है, लेकिन ग्रीन कॉरिडोर की वजह से महज 14 मिनट में ही यह दूरी तय हो गई। इस वजह से हार्ट ट्रांसप्लांट सफल रहा और देश में ग्रीन कॉरिडोर का प्रयोग भी सफल हुआ। इसके बाद मुंबई, दिल्ली, गुडग़ांव, बेंगलुरु, इंदौर, भोपाल, जयपुर में भी समय-समय पर ग्रीन कॉरिडोर बनाया जा चुका है। अब तक मुंबई में 39 बार और इंदौर में 15 बार और अन्य शहरों में भी कई बार ग्रीन कॉरिडोर बनाकर लोगों को नई जिंदगी दी गई है।

भारत के लिए जरूरी

हालांकि ग्रीन कॉरिडोर से अब तक कई लोगों को नया जीवन दिया गया है, लेकिन भारत के अधिकांश शहरों में समय-समय पर ग्रीन कॉरिडोर बनाने की जरूरत है। देश में एक तरफ प्रति वर्ष लाखों व्यक्ति सड़क दुर्घटना की वजह से मौत की नींद सो जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ लाखों लोग लीवर, दिल और किडनी की बीमारी की वजह से मरने को मजबूर हैं। मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाइवे के अनुसार 2013 में 1.37 लाख लोगों की जबकि 2015 में 1.46 लाख लोगों की मौत सड़क दुर्घटना में हुई। वहीं डब्लूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार लीवर की समस्या की वजह से दो लाख से ज्यादा और किडनी में परेशानी के वजह से भी दो लाख से ज्यादा लोगों की मौत प्रतिवर्ष हो रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रति वर्ष दो लाख हार्ट सर्जरी होती है, जबकि करीब 30 मिलियन लोग दिल की बीमारी से परेशान हैं। दुर्घटना में जान गंवाने वाले लोगों के परिजन अगर आगे बढ़कर समय रहते अंगदान की कोशिश करें तो निश्चित रूप से काफी लोगों की जान बचाई जा सकती है। देश में हर चार मिनट में एक व्यक्ति की मौत सड़क दुर्घटना की वजह से हो रही है, जबकि हर 33 सेकेंड में एक व्यक्ति हार्ट अटैक की समस्या से परेशान होता है। ऐसे में सड़क दुर्घटना में ब्रेन डेड घोषित हो चुके लोगों के अंगों को अगर लीवर, हार्ट या किडनी के मरीजों में ट्रांसप्लांट कर दिया जाए तो निश्चित रूप से कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है। इस काम के लिए दुर्घटना के पीडि़त परिजनों की पहल के साथ-साथ ग्रीन कॉरिडोर का भी होना बेहद जरूरी है।



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