sulabh swatchh bharat

शुक्रवार, 22 जून 2018

नवयुग के अर्जुन

वैश्वीकरण के इस दौर में भारतीय युवाओं में एक सकारात्मक बदलाव दिख रहा है। अब ऐसे कई युवा देखे जा रहे हैं, जो अपनी शानो-शौकत की नौकरी छोड़कर सुदूर ग्रामीण अंचलों और शहरों की झुग्गी बस्तियों में सामाजिक कार्य करने के लिए आगे आने लगे हैं

दिल्ली में कश्मीरी गेट से जहांगीरपुरी की ओर बढेंग़े, तो आजादपुर सब्जी मंडी को शायद ही नज़रअंदाज कर पाएंगे। मंडी पहुंचने से पहले ही सड़ रहे फलों, सब्जियों और कचरे की दुर्गंध आपके नथुनों से आ टकराती है। यह सोचना भी मुश्किल है कि इस सड़ांध, शोर और अफरा-तफरी के बीच कोई स्कूल, वह भी प्राथमिक विद्यालय, चल रहा है। लेकिन ऐसा है। इस कोलाहल के बीच पांचवीं कक्षा के उन बच्चों को अपना पाठ याद करते देख आप उनके उत्साह की तारीफ  किए बिना नहीं रह सकेंगे।

विद्यार्थीगण 'जीवन में चुनौतियों के महत्व’ पर चर्चा कर रहे थे। सरकारी विद्यालय की कक्षा के माहौल के विपरीत वहां का माहौल बेहद उत्साहजनक और सकारात्मक था। सब्जी मंडी के कोलाहल से प्रभावित हुए बिना वे बच्चे चर्चा में लीन थे। ग्यारह वर्षीय छात्रा मनीषा ने हाथ उठाकर बोलने की इजाजत मांगी और टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में कहा, 'भइया, चुनौतियां हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। टीवी पर दिल की धड़कनें दर्ज करने वाली मशीन को हम सबने देखा होगा, उसमें उपर-नीचे होने वाली रेखाएं बताती हैं कि इंसान जिंदा है। जिसने जिंदगी में चुनौतियों का सामना किया है, उसके जीवन में उंचाइयां भी आएंगी। जीवन में चुनौती नहीं है तो वह सपाट रेखा जैसी है, मृत इंसान के समान।’

मनीषा ने जैसे ही बोलना खत्म किया, सभी विद्यार्थियों ने जोरदार तालियां बजाकर शाबाशी दी और उनके शिक्षक सौरभ भइया के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। सौरभ बिट्स पिलानी से कंप्यूटर साइंस में स्नातक हैं। जब तक वह अनाथ आश्रम नहीं गए थे, तब तक वह भी बाकी सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की ही तरह थे। लेकिन उस एक रविवार ने उसकी जिंदगी बदल कर रख दी। उस दिन सौरभ ने करीब घंटे भर बच्चों को पढ़ाया। उसके बाद नौ साल की लक्ष्मी ने सौरभ को बताया कि कैसे वह चाहती थी कि उन लोगों को उनके जैसा शिक्षक मिले, 'हम आपकी कमी हमेशा महसूस करेंगे।’ लक्ष्मी ने याद के तौर पर अपने तीन खिलौनों में से एक सौरभ को थमा दिया। 'मैं जड़ रह गया।’ सौरभ वह वाकया याद करते हैं, 'मैं यह देख कर चकित था कि किस तरह भौतिक सुख-सुविधा के पीछे भागते समाज ने इन बच्चों के भविष्य को दांव पर लगा दिया है। इन बच्चों को बेहतर शिक्षा पाने का हक है, लेकिन हमने उसकी एक कीमत तय कर दी है।’

 काफी सोच-विचार और आत्मनिरीक्षण के बाद सौरभ ने नौकरी छोड़ दी और दो साल के लिए 'टीच फॉर इंडिया’ नामक शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ गए। इस फेलोशिप कार्यक्रम में प्रशिक्षण प्राप्त लोगों को सात शहरों के सरकारी या कम आय वाले निजी विद्यालयों में पढ़ाने का काम दिया जाता है। यह एक पूर्णकालिक काम है, जिसमें न केवल विद्यालय में पढ़ाना पड़ता है बल्कि उन्हें विद्यार्थियों के साथ कई स्तरों पर काम करना पड़ता है, जैसे कि अध्ययन केंद्र कायम करना और महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह गठित करना वगैरह।

ग्रामीण पुट

सौरभ जैसे करीब 2500 से भी ज्यादा युवा हैं, जिन्होंने 'टीच फॉर इंडिया’ फेलोशिप के तहत सात बरसों में कमजोर वर्गों के करीब 40 हजार से भी अधिक विद्यार्थियों पर अपनी छाप छोड़ी है। सौरभ का ध्यान शहरी गरीबों पर है, जबकि जाधवपुर विश्वविद्यालय की स्वाति ग्रामीण भारत के बच्चों के लिए कुछ करना चाहती हैं। स्वाति को 'गांधी फेलोशिप’ मिली है, जिसके तहत वह राजस्थान के चुरु जिले के पांच ग्रामीण विद्यालयों को बेहतर बनाने में सहायता कर रही है।

वह बताती हैं, 'मेरी स्कूली शिक्षा ज्यादातर गांव में हुई। वहां मैंने महसूस किया कि बेहतर शिक्षा के अभाव ने ग्रामीण युवाओं को विकास से पूरी तरह दूर रखा है। उनमें से ज्यादातर खेती में लग जाते हैं या फिर मजदूरी करने शहर चले जाते हैं। गांधी जी कहा करते थे कि भारत का भविष्य गांवों में है। लेकिन गांवों की हालत देखकर लगता है कि देश का भविष्य अंधकारमय है।’

लेकिन यह तब की बात है। फेलोशिप मिलने और मॉडल स्कूल बनाकर ग्रामीण स्कूलों के कायापलट करने में प्राचार्यों की मदद करने का काम हाथ में लेने के बाद से उसका रुख सकारात्मक है। ये स्कूल दो बरसों तक उसके प्रभार में रहेंगे और इस दौरान वह करीब हजार विद्यार्थियों की मदद कर पाएंगी। फेलोशिप का दो वर्षों का पाठ्यक्रम बहुत करीने से तैयार किया गया है, जो न केवल विद्यालयों व समुदायों में बदलाव लाने में बल्कि व्यक्तिगत क्षमताओं को विकसित करने में भी मदद करता है।

सौरभ और स्वाति भारतीय युवाओं के रुझान की ओर इंगित करते हैं। सारे युवा 9 से 5 वाली नीरस नौकरी से संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि इसमें उन्हें अच्छा-खासा पैसा मिलता है। ये लोग दैहिक जरूरतों से आगे बढ़ चुके हैं। अब उनमें आत्म नियंत्रण झलकता है और वे अपने आसपास की दुनियादारी को बेहतर तरीके से समझने लगे हैं। बहुतों के लिए विकास, समानता, अनुकंपा वगैरह महज लच्छेदार शब्द मात्र नहीं हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के मूलभूत अवयव हैं। वे लीडरशिप कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं, जो उन्हें अपने अंदर के नेतृत्व क्षमता को निखारने में मदद करता है और इस तरह उनके सपनों को आकार देता है।

समाजशास्त्री मीरा श्रीनिवासन कहती हैं, 'यह कार्यक्रम असली भारत की अपरिष्कृत और आडंबर रहित तस्वीर पेश करते हैं, जो उनके मस्तिष्क में प्रश्नों का भंवर पैदा करते हैं और वर्तमान समस्याओं का हल खोजने का उत्साह व आशावादी दृष्टि देते हैं। यह आशावादी उत्साह तब उन्हें उनके व्यक्तिगत विकास और बदलाव की ओर ले जाता है। ऐसा उस सहयोगी ढांचे के जरिए किया जाता है, जो उनकी जागरुकता, उत्कृष्टता की खोज और क्षमता निर्माण पर केंद्रित होता है।

सामाजिक दबाव

गैर-परंपरागत रास्तों का चुनाव कभी आसान नहीं होता है। जब आकाश बलसारे ने पुणे स्थित बार्कलेज़ बैंक की नौकरी छोड़कर प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलोशिप लेना चाहा, तो उनके पिता ने उनसे सारे संबंध तोड़ लेने की धमकी दी। इस दौरान उन्हें एक नक्सल प्रभावित जिले के जिलाधिकारी के साथ तीन साल तक काम करना था। यहां तक कि उनके परिवार वाले उन्हें एक ज्योतिषी के पास ले गए, यह जानने के लिए कि उसकी कुंडली में क्या कुछ ऐसा नकारात्मक है जिसे पूजा-पाठ करके ठीक किया जा सके। आखिर ऐसा कौन होगा जो बार्कलेज़ बैंक की नौकरी छोडऩे की बेवकूफी करेगा! लेकिन आकाश दृढ़ निश्चयी थे।

मुड़कर देखते हुए वह बताते हैं, वह 'बेवकूफी भरा निर्णय मेरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ निर्णय साबित हुआ। मैंने तीन साल दंतेवाड़ा में बिताया और उस दौरान अपने देश, समाज और खुद के बारे में हर क्षण कुछ ना कुछ सीखने को मिला। निश्चित रूप से उस दौरान मुझे बिजली के बिना मच्छरों के झुंडों के बीच कई रातें बितानी पड़ीं। जब कभी मैं माओवादी इलाके के गांवों में जाता था, तो माओवादी हमले का डर बना रहता था। लेकिन यह सब मुझे उस भोर की ओर बढऩे से नहीं रोक सका, जो देश में आने ही वाली है।’

दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्यूनिकेशंस इंजीनियरिंग करने वाली अंजलि के लिए दिल्ली की अट्टालिकाओं से सीवान के हरे-भरे मैदान तक की यात्रा जबरदस्त रही। फिलहाल वह इंडिया फेलो हैं और तेरह महीने के अनुभवजन्य सामाजिक नेतृत्व कार्यक्रम का हिस्सा हैं, जो आपको निचले स्तर पर सामाजिक मुद्दों को समझने और उसके प्रबंधन में लगी संस्थाओं के साथ काम करने का मौका देता है। वह बिहार के सीवान जिले में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जन्म स्थान जीरादेई प्रखंड के नरेंद्रपुर गांव स्थित 'परिवर्तन’ नामक गैर-सरकारी संगठन के साथ काम कर रही हैं। वह बताती हैं, 'शहर में रहने वाली मेरे जैसी लड़की की नज़र में ग्रामीण भारत की अलग ही तस्वीर थी। यहां मैं बहुतेरे आशंकाओं और पूर्वाग्रहों के साथ आई थी। इन भले लोगों के बीच काम करने के दौरान मैंने महसूस किया कि हमारे पूर्वाग्रह हमारे अंदर की दुर्भावनाओं का परिणाम हैं, जिसे हम समझ नहीं पाते। मैंने यहां के जीवन में जो गूंज देखी, उसने मुझे अपने अंदर के दोष को स्वीकारने में मदद की। अब हर सुबह मैं अपने को बदलने के लिए जागती हूं और मैंने हर दिन को एक चुनौती के रूप में लेना शुरू कर दिया है।’

छोटी यात्राएं

अपने काम में महीनों डूबने की तन्मयता ने आकाश और अंजलि को अपनी असलियत पहचानने में मदद की है। लंबी अवधि के इन कार्यक्रमों के अलावा बहुत-सी छोटी अवधि के कार्यक्रम हैं, जो युवाओं को जागरुक बनाने के काम पर केंद्रित हैं। जागृति यात्रा 450 युवा यात्रियों को 8 हजार किलोमीटर की रेल यात्रा पर ले जाती है, जो 15 शहरों से गुज़रती है। इस दौरान ये यात्री देश भर के उद्यमियों, स्वयंसेवकों और बदलाव लाने वाले लोगों से रूबरू होते हैं। आईआईएएम, अहमदाबाद के डॉ. अनिल गुप्ता की शोध यात्रा लोक आविष्कारों की खोज करते हुए सहभागियों को ग्रामीण भारत से रूबरू कराता है। वास्तव में इन्हीं यात्राओं में से एक के दौरान रवि गुलाटी ने सिस्टम की गैर-बराबरी पर प्रश्न करना शुरू किया, हालांकि वह खुद भी उसी व्यवस्था का हिस्सा थे। अंतत: उन्होंने 'मंजिल’ की स्थापना की, जो दिल्ली के खान मार्केट इलाके में वंचित बच्चों को पढ़ाने का काम करती है।

'यूथ अलायंस’ नामक संस्था ग्राम्य मंथन, ओएनयूएस जैसे कार्यक्रम चलाती है, जो विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए युवाओं को प्रशिक्षित करते हैं और सहानुभूतिपूर्ण नेतृत्व का हुनर विकसित करने में उनकी मदद करते हैं। इसके संस्थापक प्रभाकर भारतीय सामाजिक क्षेत्र को लेकर लोगों के रुख के बारे में एक मजेदार बात बताते हैं, 'सामाजिक क्षेत्र के बारे में लोगों की धारणा है कि यहां आपको पैसे नहीं मिलते। लोग अब भी यही मानते हैं कि यह कुर्ता-झोला वालों का काम है, जिसमें कमाई नहीं है। समय बदल गया है, इसीलिए यह क्षेत्र भी बदल गया है। आज हमें बेहतर तनख्वाह मिलती है और इस काम में लगे लोग बेहतर जीवन जीते हैं। हालांकि यह कारपोरेट जगत की बराबरी नहीं कर सकता, लेकिन समय बदल रहा है। बल्कि कहें कि इसे बदलना होगा।’ यह समाज की वर्तमान धारणा के बिल्कुल उलट है, जो सामाजिक कार्य को महज जन कल्याण के रूप में देखता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अरविंद विजय कहते हैं, 'यह सिर्फ  जन कल्याण नहीं है, जो इन युवाओं को प्रेरित करता है। वे जो काम कर रहे हैं, उसमें उनके होने का उन्हें कारण दिखाई पड़ता है।’ सामाजिक क्षेत्र में काम करने गए अपने कई विद्यार्थियों के वह 'मेंटर’ रहे हैं, 'संतुष्टि एक बहुत बड़ा कारक है, लेकिन उन्हें प्रेरित करने वाला यह अकेला कारक नहीं है। जिस तरह का चुनौतीपूर्ण काम वे करते हैं, उसमें उन्हें विकास की संभावना दिखती है। नेतृत्व विकास के क्षेत्र में बढ़ते शोध बताएंगे

कि सफल नेतृत्व निर्माण में भावोत्तेजक समझ का क्या योगदान रहा है। बाकी किसी भी क्षेत्र के मुकाबले सामाजिक क्षेत्र में आपको अपने भावोत्तेजक समझ को विकसित करने के ज्यादा मौके मिलते हैं।’ समय बदल रहा है, और हमारे  देश के युवा भी। आने वाले वर्षों में भारत को  अपनी जनसंख्या का लाभ उठाने की जरूरत है और यह इस पर निर्भर करेगा कि समाज निर्माण में युवाओं की भागीदारी कितनी है। समाज में बदलाव की जो कल्पना वे करेंगे, उसके नतीजे लंबे दौर

में देखने को मिलेंगे। यह बदलाव न केवल उनके काम के प्रभाव स्तर पर, बल्कि समाज की सोच

के स्तर पर भी दिखेगा। समतामूलक समाज का सपना बहुत दूर की कौड़ी नहीं लगता। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ये अर्जुन फल की बहुत ज्यादा चिंता किए बिना अपना काम करते रहेंगे।



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो