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रविवार, 23 सितंबर 2018

गांधीवादी मूल्यों के जीवंत वाहक

एक पारंपरिक ब्राह्मïण परिवार से आने वाला युवक कैसे स्कैवेंजर्स की मुक्ति को अपना जीवन संकल्प बना लेता है। डॉ. पाठक का जीवन इसकी मिसाल तो है ही वे गांधीवादी मूल्यों के निर्वहन के जीवंत उदाहरण भी हैं

मोहन दास करमचंद गांधी 'हरिज़न’ में इस बात का जिक्र भावनाओं से ओत-प्रोत होकर करते हैं-'लोगों का प्यार मेरे जीवन में अस्पृश्यता की समस्या कहीं पहले लेकर आ गया। मेरी मां का कहना था कि 'उस बच्चे को तुम छू नहीं सकते, क्योंकि वह अछूत है।’ मैंने अपने आप से सवाल किया 'क्यों नहीं?’ और उसी दिन से मेरा 'विद्रोह’ आकार लेने लगा।’ ऐसा ही एक अनदेखा सा साम्य बाद के वर्षों में बिहार प्रांत के रामपुर बघेल गांव में एक कुलीन मैथिल ब्राह्मïण परिवार में घटित हो गया। उस नन्हे बालक विन्देश्वर को उसकी दादी ने बारंबार समझाया था कि उसके घर सूप-डगरा बेचने वाली इन औरतों को उसे गलती से भी छूना नहीं है। एक सवाल जो बापू ने अपने अंतर्मन से पूछा था 'क्यों नहीं?’ ठीक वही सवाल नन्हे विन्देश्वर ने भी मजबूती से दोहराया-'क्यों नहीं?’ और उसने मौका पाकर भागकर वैसी एक दलित औरत को छू ही लिया, ओफ्फï! घर में फिर क्या कोहराम मचा, खूब पिटाई हुई, उस कड़कती ठंड में उसे नहलाया गया, उसके मुंह में रेत, गोबर व गंगा जल जबरन डाला गया और शुद्घि के तमाम उपक्रम साधे गए। पर नन्हे विन्देश्वर का बाल मन लगातार यही सवाल पूछता रहा कि '...यह कैसी शुद्घि है, जब हमारी आत्मा ही अपवित्र रह जाए।’ यही बालक जब बड़ा होकर अपनी आगे की पढ़ाई के लिए पटना पहुंचा तो यही बचपन के संस्कार उसके अंदर अकुलाहट बनकर यदा-कदा उन्हें परेशान करते रहे।

एक क्रांति का जन्म

यह बात सनï् 1968 की है, विन्देश्वर पाठक अपनी पढ़ाई पूरी कर बिहार गांधी शताब्दी समारोह कमेटी में काम करने आए। इस कमेटी का गठन इस उद्देश्य से हुआ था कि अगले वर्ष यानी सनï् 1969 में गांधी जी के जन्म के 100 वर्ष पूरे होने के उत्सव को धूमधाम से मनाया जाना था। इस कमेटी के महासचिव सरयू प्रसाद ने विन्देश्वर पाठक को यह जि मेदारी सौंपी कि वे गांधी के सपनों को साकार करने की दिशा में पहल करें और वैसे स्कैवेंजर्स भाई-बहन जो सदियों से मानव मल को सिर पर उठा रहे हैं और उसका खुले हाथों से निष्पादन कर रहे हैं, उन्हें इस अमानवीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने का कार्य करें। और उसी दिन से विन्देश्वर पाठक शुष्क शौचालय का वैकल्पिक डिजाइन ढूंढने में जुट गए।

सुलभ का उदïभव

विन्देश्वर पाठक ठीक वैसी ही सामाजिक क्रांति के उदघोष को तत्पर थे कालांतर में जैसी अलख अब्राहम लिंकन, राजा राममोहन राय व ज्योतिबा फूले जैसे समाज सुधारकों ने जगाई थी। तब विन्देश्वर पाठक के हाथ डब्ल्यूएचओ की एक पुस्तक 'एक्सक्रीटा डिस्पोज़ल फॉर रूरल एरियाज़ एंड स्मॉल क यूनिटीज़’ लग गई, लगे हाथ उन्होंने राजेंद्र लाल दास की एक हिंदी पुस्तक से भी प्रेरणा ली और वर्षों के गहन अध्ययन और अनुसंधान के उपरांत उन्होंने 'टू-पिट-पोर फ्लश सिस्टम’ की ऐसी युगांतकारी सुलभ तकनीक अन्वेषित कर डाली जो मैनुअल स्कैवेंजिंग में कार्य में लगे हजारों वाल्मीकियों के लिए एक वरदान के मानिंद थी। इससे मानव मल का 'ऑन साइट’ निष्पादन संभव था। इस तकनीक में स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को मद्देनजर रखते हुए दो गड्ढïे किए जाते हैं, जिसमें एक गड्ढïे का फौरी इस्तेमाल होता है और दूसरे को 'स्टैंड-बॉय’ रखा जाता है, जब पहला गड्ढïा भर जाता है तो मल-मूत्र इक_ïा करने के लिए दूसरे गड्ढïे को खोल दिया जाता है, और दो वर्षों के उपरांत पहले गड्ढïे में जमा मानव मल बैक्टीरिया की मदद से मैन्योर परिवर्तित हो जाता है, जो न केवल कीटाणु मुक्त होता है, बल्कि दुर्गंध रहित भी होता है। इस मैन्योर का इस्तेमाल सीधे खेतों में खाद के तौर पर हो सकता है। सुलभ ने अपने को सिर्फ इस तकनीक के अन्वेषण, विकास और प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा अपितु व्यावहारिक तौर पर सुलभ शौचालयों का बड़े पैमाने पर निर्माण भी किया। आज भारत में 13 लाख से ज्यादा घरों में सुलभ शौचालय का इस्तेमाल हो रहा है। सुलभ के प्रयासों से भारत में 8 हजार 500 से भी ज्यादा सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण हुआ है जो 'पे एंड यूज़’ की अवधारणा पर चल रहे हैं। आज भारत में सवा करोड़ से भी ज्यादा लोग रोज़ाना सुलभ शौचालय का इस्तेमाल कर रहे हैं। सुलभ ने मानव मल परिशोधन की जो नई तकनीक विकसित की है, उस बॉयो गैस प्लांट से बिजली भी पैदा होती है, और इससे उत्सर्जित बॉयो गैस को हम बहुविध उपयोगों में ला सकते हैं, यथा खाना पकाने, रोशनी के लिए, पानी गर्म करने और सर्दियों में हाथ सेंकने में। बॉयो गैस प्लांट द्वारा उत्सर्जित जल को सेट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर विभिन्न कार्यों में लाया जा सकता है। यह उत्सर्जित जल एक अच्छे खाद का काम करता है और इसे साफ-सफाई के काम में लाया जा सकता है, यहां तक कि इसे हमारी जीवन दायिनी नदियों से सीधे प्रवाहित किया जा सकता है, क्योंकि इसमें बीओडी की मात्रा 10 से भी कम होती है।

कल्याण योजनाएं

 सुलभ इंटरनेशनल ने न सिर्फ शौचालयों के निर्माण को मूत्र्त रूप दिया है, बल्कि 1 लाख 20 हजार से

ज्यादा मैनुअल स्कैवेंजर्स को सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा से मुक्त कराया है, और उन्हें विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षणों में दक्ष बनाकर आजीविका अर्जित करने में मदद की है, स्कैवेंजर्स बच्चों को गुणवत्ता योग्य शिक्षा देने के लिए नई दिल्ली के पालम-द्वारका इलाके में अंग्रेजी माध्यम के सुलभ पब्लिक स्कूल की नींव भी डाली गई है, जहां स्कैवेंजर्स और सामान्य बच्चों का अनुपात 60:40 है। सनï् 1988 से पहले इन स्कैवेंजर्स के मंदिर प्रवेश पर भी अघोषित पाबंदी थी, डॉ. विन्देश्वर पाठक अपने प्रयासों से इन्हें प्रसिद्घ नाथद्वार मंदिर में लेकर गए।

अलवर-टोंक मॉडल

राजस्थान के दो शहरों अलवर व टोंक को डॉ. पाठक ने अपने महती प्रयासों से 'स्कैवेंजिंग मुक्त’ शहर में शुमार करवा दिया है। डॉ. पाठक ने अपनी 'नई दिशा’ संस्था के माध्यम से सर्वप्रथम सिर पर मैला उठाने के कार्य में जुटी इन महिलाओं को विभिन्न ट्रेड में वोकेशनल टे्रनिंग दिलवाई, इन्हें प्रति माह 2 हजार रुपयों का वजीफा दिया। और इन्हें सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर तथा पापड़, बडिय़ां, अचार, मसाला आदि के उत्पादन में दक्ष बनाया। सुलभ द्वारा प्रशिक्षित इन दलित महिलाओं का समूह सामाजिक क्रांति की एक नई इबारत लिखने में मसरूफ है। डॉ. पाठक के अथक प्रयासों की बदौलत ये महिलाएं देश-विदेश की यात्रा कर आई हैं। न्यूयॉर्क में रैंप वॉक किया है, गंगा में डुबकी लगाई है और बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए हैं। आज ये दलित महिलाएं इस कदर समाज की मुख्यधारा में शामिल हो गई है कि कल तक वह जिन परिवारों के घर शुष्क शौचालयों की सफाई करती थीं, आज उनके पर्व, त्यौहार, शादी समारोह में शिरकत कर रही हैं, सामाजिक परिवर्र्तन का सचमुच में यह एक नया सूत्रपात है।

विधवाओं को नया जीवन

डॉ. पाठक ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं के कारवां को आगे बढ़ाया, कि देशभर में खास कर वृंदावन में विधवा औरतों की स्थिति बद से बदतर हो रही थी और उनका जीवन परिस्थितिजन्य  संत्रास की भेंट चढ़ गया लगता था, वैसे वक्त में सुप्रीम कोर्ट ने 'नालसा’(नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी) से कहा कि 'वे सुलभ इंटरनेशनल से पूछे कि क्या वह इन विधवा औरतों की देखभाल की जि मेदारी ले सकता है?’ दो कदम आगे बढ़कर डा. पाठक और सुलभ इन औरतों की जिंदगी में एक नई सुबह लेकर आए हैं।

आज इनके आश्रम में फिज्र, टीवी हैं, विभिन्न वोकेशनल ट्रेनिंग में उन्हें प्रशिक्षित किया गया है। सिलाई, कढ़ाई से लेकर माला और अगरबत्ती निर्माण में उन्हें दक्ष किया गया है, अब वे हिंदी, बांग्ला और अंग्रेज़ी जैसी भाषाएं लिख पढ़ सकती हैं, उन्हें सुलभ की ओर से प्रति माह गुजारा भत्ता भी दिया जाता है। उनके स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों का ध्यान रखा जाता है और जब वे इस नश्वर शरीर का त्याग करती हैं तो विधिपूर्वक उनका अंतिम संस्कार भी किया जाता है। सुलभ का यह कल्याणकारी कार्यक्रम वृदांवन से आगे बढ़कर वाराणसी और उत्तराखंड के रूद्र प्रयाग तक जा पहुंचा है। डॉ. पाठक के अभिनव प्रयासों से इन हज़ारों विधवा स्त्रियों के जीवन में उम्मीदों के एक नए सूरज ने जन्म लिया है।

मिशन प्रधानमंत्री और सुलभ

देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आरंभिक उदï्बोधनों में भी शौचालय की महत्ता को देवालय से बड़ा बताया और जब उन्होंने केंद्र की जिम्मेदारी संभाली तो उनकी सरकार की नीतियों में 'शौचालय और स्वच्छता अभियान’ को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि सनïï् 2019 में जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जन्मशती मनाई जाए तब तक देश में खुले में शौच की परंपरा पूरी तरह खत्म कर दी जाए। प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया है कि देश के हर घर और हर स्कूल में शौचालय हो। आज भी भारत के 11 करोड़ घरों में शौचालय नहीं है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए तकरीबन 3.5 लाख करोड़ रुपयों की जरूरत पड़ेगी। इस बाबत सुलभ आंदोलन के प्रणेता डॉ. पाठक का बड़े स्पष्टï तौर पर मानना है कि महात्मा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी के रूप में देश को एक ऐसा नायक मिला है, जो कई मायनों में बापू से भी कहीं ज्यादा क्रांतिकारी हैं और शौचालय निर्माण को लोगों की मुक्ति से जोड़ कर देख रहे हैं। वहीं लगे हाथ डॉ. पाठक इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि अगर वे अपने 'स्वच्छ भारत अभियान’ के मार्फत इन पांच वर्षों में यानी 2019 तक भारत के हर घर में शौचालय बनवा पाने में नाकाम रहते हैं तो इस 'स्वच्छ भारत अभियान’ का हश्र भी यूपीए शासनकाल में चलाई गई निर्मल ग्राम योजना सा हो सकता है। पर आज जिस तरह तमाम कॉरपोरेट घराने शौचालय निर्माण में दिलचस्पी दिखा रहे हैं,ऐसे में मुमकिन है कि प्रधानमंत्री के सपनों को एक मूत्र्त रूप मिल जाए।

दुनिया ने माना लोहा

आज डॉ. विन्देश्वर पाठक और उनके सुलभ आंदोलन की धमक पूरी दुनिया में सुनी जा सकती है। सही मायनों में 'सुलभ स्वच्छता आंदोलन’ शांति व अहिंसा के विजय का परिचायक बन गया है। समता मूलक भारत का जो सपना महात्मा गांधी ने देखा था डॉ. पाठक बापू के इन्हीं आदर्शों पर चलकर शांति, अहिंसा व मानवाधिकार का अलख जगा रहे हैं। बीबीसी होराइज़न ने सुलभ को विश्व के पांच यूनीक इनोवेशन में शुमार किया है। डॉ. पाठक को उनके इन अभिनव प्रयासों के लिए अनेक राष्ट्र्रीय व अंतरराष्ट्र्रीय पुरस्कारों से भी नवाजा गया है, जिसमें अहम हैं-पदïï्मभूषण, इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार, स्टॉकहोम वाटर प्राइज, सेंट फ्रांसिस अवार्ड आदि। 14 अप्रैल, 2016  को न्यूयॉर्क शहर के मेयर ने उनके सम्मान में इस दिवस को 'डॉ. विन्देश्वर पाठक डे’ घोषित कर दिया। रेल मंत्रालय ने उन्हें स्वच्छता अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया है। नालसा (राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण) ने उन्हें अपना सदस्य मनोनित किया। डॉ. पाठक का जीवन, विज़न और उनका मिशन सचमुच इस बात के गवाह है कि कैसे एक साधारण आदमी भी अपने मजबूत इरादों और पाक मंशा के बलबूते एक असाधारण कार्य को अंजाम दे सकता है। सही मायनों में वे जीते-जागते गांधी की ही प्रतिमूर्ति लगते हैं।



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