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मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

शिक्षा के प्रति बहुआयामी दृष्टिकोण

फनलैंड ने अपने देश की शिक्षा पद्धति में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। इसके तहत आल सब्जेक्ट लर्निंग को अलविदा कह दिया गया है। उन्होंने सारे विषयों को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। इस प्रयोग के भविष्य में क्या परिणाम निकलेंगे बता रही हैं- स्फूर्ति मिश्रा

क्या आप कभी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी  में अलजेब्रा, रेखीय समीकरण और द्विरेखीय समीकरण का इस्तेमाल करते हैं? क्या आप कभी सोचते हैं कि गणित का मैट्रिक्स और ऐग्लोरिदï्म सीख कर आप अपनी जिंदगी में उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं? या फिर स्कूल में रसायन शास्त्र के जो नए फॉर्मूले आपका सिर दर्द बढ़ा देते थे वे आज आपके लिए कितने उपयोगी हैं? इन पहेलियों का जवाब फिनलैंड ने अपनी शिक्षा पद्धति में बड़ा बदलाव लाकर दिया है। अब फिनलैंड के स्कूली बच्चों को सभी विषय अलग-अलग पढऩे की जरूरत नहीं है। अब उन्हें सभी विषयों को एक साथ जोड़ कर नए तरीके से पढ़ाया जाएगा। फिनलैंड शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का प्रयोग करने वाला पहला देश है। हालांकि वहां का एजुकेशन सिस्टम काफी बेहतर है, लेकिन वे लगातार इसे और बेहतर बनाने का प्रयास करते रहते हैं। 'इंटर डिसिप्लिनरी एप्रोच ऑफ लर्निंगÓ के माध्यम से फिनलैंड ने शिक्षा पद्धति को नया आयाम दिया है। यह पद्धति सीनियर स्कूल में 16 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों पर लागू होगी। अब उनकी कक्षाओं में गणित, भौतिकी, साहित्य, इतिहास, और भूगोल की अलग-अलग क्लास नहीं होगी।       

बच्चे अब अलग-अलग विषय पढऩे के बजाए 'इंटर डिसिप्लिनरी एप्रोच ऑफ लर्निंगÓ के तहत एक विशेष घटनाक्रम को लेकर उसमें होने वाले तथ्यों का विश्लेषण करेंगे। उदाहरण के तौर पर दूसरे विश्व युद्ध का विश्लेषण इतिहास, गणित और भूगोल के हिसाब से किया जाएगा। 'वर्किंग इन अ कैफैÓ (प्रोजेक्ट बेस्ड लर्निंग इन ग्रुप) के माध्यम से बच्चे अंग्रेज़ी भाषा, अर्थशास्त्र, सामाजिक एवं कम्यूनिकेशन स्किल्स में हाथ आजमाएंगे।  

हालांकि यह पद्धति इटली और फ्रांस समेत कई देशों में सदियों पुरानी है जहां सोलहवीं शताब्दी में पुनर्जागरण हुआ। इसका सबसे उम्दा उदाहरण है 'लियोनार्दो द विंचीÓ का दर्शन जिन्होंने अपने वैज्ञानिक अनुसंधानों में कला और रचनात्मकता को शामिल किया और कलाकृतियों में विज्ञान और तर्क का प्रयोग किया। इसके परिणाम स्वरूप उन्होंने बेहतरीन कलाकृतियों तथा ऐतिहासिक खोजों की सौगात देकर दुनिया को चौंका दिया।   

अगर हम भारत की बात करें तो इस तरह की पद्धति की झलक हमें रवींद्रनाथ टैगोर की प्राकृतिक शिक्षा पद्धति में देखने को मिलती है। उनका मानना था कि सभी विषयों को रटने की वजह से बच्चे सीखने पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्होंने एक पत्र में लिखा, 'हमारे देश के विद्यालयों में जिस तरह के विषय पढ़ाए जाते हैं वे रूखे और अनुपयोगी हैं। हम सिर्फ रटने पर ध्यान देते हैं और सीखने का मजा नहीं ले पाते। इस तरह उन विषयों को पढऩा एक अत्याचार की तरह लगता है। यह मानव की सबसे क्रूर भूल है। हम संग्रहालयों में नमूनों की तरह निष्क्रिय बैठे रहते हैं और पाठ हमारे मस्तिष्क पर ऐसे फेंके जाते हैं जैसे फूलों पर कोई ऊंचाई से पत्थर फेंक रहा हो।Ó

हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह पद्धति पूरी तरह कामयाब रहेगी, क्योंकि इस तरह की पद्धति में विषयों का एक मिश्रण सा बन जाएगा और बच्चों के भ्रमित होने का खतरा बढ़ जाएगा। खास बात यह है कि इस तरह के मॉड्यूल का भविष्य में क्या इस्तेमाल होगा यह जाने बिना बच्चों को हाई स्कूल तक इसी तरह पढ़ाते जाना और भी चिंताजनक है। जबकि विषयों का परिभाषित होना उन्हें वर्गीकृत करने और विभिन्न तरह की सोच रखने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करता है। फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देश विश्वविद्यालय स्तर पर विषयों को जोड़ कर पढऩे की पद्धति का इस्तेमाल करते हैं। उदाहारण के तौर पर फ्रांस के विश्वविद्यालय कई विषयों में डबल डिप्लोमा प्रदान करते हैं। अमेरिका और कनाडा में कला क्षेत्र में स्वतंत्र डिग्री देने का चलन है। ब्रिटेन में,

सेंट एंड्रयूज और यूसीएल (यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन) में स्नातक स्तर पर 'बैचलर डिग्री इन आर्ट्स एंड साइंसेजÓ दी जाती है। तो ऐसे में इसे स्कूल के स्तर पर लागू करने की क्या आवश्यकता है? ऐसे तमाम प्रश्न हैं जिनके उत्तर भविष्य में ही मिल पाएंगे।  

लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि इंटर डिसिप्लिनरी एप्रोच वक्त की मांग है, क्योंकि 21वी सदी में अधिकतर संस्थाओं में कर्मचारियों से यही उम्मीद की जाती है कि वे एक साथ कई विषयों में पारंगत हों। उदाहरण के तौर पर एक पत्रकार को लेखन के साथ वाकपटुता और अलग-अलग विषयों में बहुत अधिक ज्ञान होना चाहिए और साथ ही साथ वह बहुत जल्दी सीखने में भी माहिर हो तभी वह बहुत से विषयों पर लेख लिख पाएगा। या फिर एक इंडस्ट्रियल डिजाइनर को रचनात्मकता के साथ-साथ थोड़ा बहुत मनोविज्ञान, भौतिकी शास्त्र तथा मार्केटिंग स्किल का ज्ञान होना आवश्यक है, तभी वह टिकाऊ इमारतें बना कर उन्हें बेच सकेगा। एक सिटी आर्किटेक्ट को डेटा एनालिसिस, सांख्यिकी, टेक्निकल ड्राइंग, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और कुछ और विषयों का ज्ञान होना चाहिए।

यह तो वक्त ही बताएगा कि शिक्षा के क्षेत्र में फिनलैंड का प्रयोग कहां तक सफल हुआ, लेकिन फिलहाल इससे वहां के लोगों को काफी उम्मीदें हैं।



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