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बुधवार, 19 सितंबर 2018

साकार होगा गांधी के सपनों का भारत

यह अब दुनिया भी मान चुकी है कि भारतीय संस्कृति में स्वच्छता की लंबी परंपरा रही है। हालांकि अतीत के कुछ कालखंडों में पता नहीं कहां से अस्वच्छता की अवधारणा आई या फिर बढ़ती जनसंख्या का दबाव रहा कि हमारी जिंदगी से स्वच्छता की अवधारणा कुछ कमजोर पड़ गई

यह अब दुनिया भी मान चुकी है कि भारतीय संस्कृति में स्वच्छता की लंबी परंपरा रही है। हालांकि अतीत के कुछ कालखंडों में पता नहीं कहां से अस्वच्छता की अवधारणा आई या फिर बढ़ती जनसंख्या का दबाव रहा कि हमारी जिंदगी से स्वच्छता की अवधारणा कुछ कालखंड में कमजोर पड़ी। निश्चित तौर पर आधुनिक भारत में इस समस्या पर सबसे पहले ध्यान महात्मा गांधी ने दिया था। 1901 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को शौचालय की सफाई के लिए प्रेरित किया। जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो उन्होंने स्वयं ही टोकरी, झाड़ू और खुरपी उठा ली। उसके बाद तो जैसे बदलाव की शुरुआत हो गई। गांधीजी ने आजादी के आंदोलन के साथ स्वच्छता का अभियान भी जोड़ दिया। वे कई बार कहा करते थे कि आजादी से पहले स्वच्छता ज्यादा जरूरी है। उन्होंने स्वच्छता को लेकर जन जागरूकता फैलाने की जो पहल की, वैसी पहल भारतीय राजनीति में दूसरी बार फिर तब दिखाई पड़ी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले के अपने पहले भाषण से ही देश को स्वच्छ बनाने का आह्वान किया। फिर, 2 अक्टूबर 2014 को उन्होंने खुद झाड़ू उठाकर जिस तरह 'स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की, उससे भारतीय समाज में स्वच्छता को लेकर नई चेतना पैदा हुई है। इस अभियान की कामयाबी का ही उदाहरण है कि अब सड़क, रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन से लेकर हाट-बाजार तक में छोटे-छोटे बच्चे कचरा फैलाने वालों तक को टोक दे रहे हैं।

यह सोचने का विषय है कि जिस भारतीय संस्कृति में साफ-सफाई एक संस्कार के रूप में रही है, वह आखिर 19वीं सदी में गंदगी का पर्याय क्यों बन गई? मोहजोदड़ो-हड़प्पा की सभ्यता में मिले प्रमाणों से साफ है कि भारतीय संस्कृति में स्वच्छता को लेकर कितनी स्पष्ट अवधारणा रही है। देवी पुराण में शौच के लिए जो विधान बताया गया है, वह आज के नजरिए से भी वैज्ञानिक साबित होता है। देवी पुराण में कहा गया है कि रिहायश से तीर छोडऩे के बाद जहां तीर गिरे, वहां मिट्टी खोदें, घास-पात डालें, शौच करें और फिर घास-पात डालकर ढक दें। शौचालय की थोड़ी चर्चा बुद्ध काल में भी पाई गई है। बौद्ध साहित्य में शौचालय निर्माण से लेकर उसके इस्तेमाल तक की जानकारी दी गई है। मुगलकाल में भी जिस तरह शौचालय का विवरण मिलता है वह साबित करने के लिए काफी है कि भारतीय संस्कृति के हर कालखंड में साफ-सफाई की भावना रही है।

दुर्भाग्य से मौजूदा भारत में अब भी काफी लोग खुले में शौच करने के लिए मजबूर हैं। इस अस्वस्थकर व्यवस्था को रोकने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने अभियान छेड़ा है। स्वच्छ भारत अभियान का मकसद 2019 तक खुले में शौच से मुक्ति हासिल करना है। अगर प्रधानमंत्री की मंशा के मुताबिक 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करना है तो इसके लिए युद्ध स्तर पर काम किया जाना जरूरी है। देखने में यह लक्ष्य हासिल करना कठिन तो है, लेकिन तैयारियों के साथ काम किया जाए तो इसे हासिल भी किया जा सकता है। मेरा मानना है कि अगर बुनियादी व्यवस्था तैयार कर दी जाए तो देश को 2019 तक खुले में शौच से मुक्त किया जा सकता है। इसके लिए हर पंचायत के स्तर पर एक-एक नौजवान का चुनाव किया जाना चाहिए। उसे छह महीने तक शौचालय निर्माण, उसकी देख-रेख आदि की ट्रेनिंग दी जाए तो वह इस अवधि में पूरी तरह प्रशिक्षित होकर शौचालय निर्माण कार्य को अपने हाथ में न सिर्फ ले सकता है, बल्कि उस पर तेजी से काम कर सकता है।

हालांकि जब से नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने हैं तब से स्वच्छता को लेकर लोगों में एक अनुमान के मुताबिक देश को खुले में शौच से मुक्त कराने के लिए करीब साढ़े बारह करोड़ शौचालय की जरूरत है। अगर प्रति पंचायत के हिसाब से दो लाख 51 हजार नौजवानों का चयन किया जाए तो ट्रेनिंग के बाद हर नौजवान प्रति महीने तीस-तीस शौचालय का भी निर्माण करा सकता है। इस तरह हर नौजवान दो साल की अवधि में 720 शौचालयों का निर्माण करा सकता है। इस तरह पूरे देश में करीब 18 करोड़ शौचालय बनाए जा सकते हैं। अब सवाल उठता है कि इसके लिए पैसे कहां से आएंगे? हमारा आकलन है कि एक गांव को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए करीब साठ लाख का खर्च आता है। एक पंचायत में तकरीबन तीन गांव हैं तो इस हिसाब से हर पंचायत के लिए करीब दो करोड़ का खर्च आएगा। एक ब्लॉक में करीब तीस पंचायतें होती हैं, इस लिहाज से हर ब्लॉक को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए 60 करोड़ और इसी तरह एक जिले को करीब 600 करोड़ के खर्च की जरूरत होगी। इसके लिए धन सरकारी स्तर पर भी खर्च किया जा सकता है या फिर दुनियाभर में फैले दो करोड़ के करीब प्रवासी भारतीयों को प्रेरित किया जा सकता है। इसी कड़ी में अपने यहां के उन साधु-संतों, मंदिरों-मठों, गिरिजाघरों, मस्जिदों को प्रेरित किया जा सकता है जिनके पास संपत्ति और संसाधन हैं। भारत में करीब 16,057 कंपनियां हैं, जिनका टर्नओवर पांच करोड़ से ज्यादा है। उनका अपना सीएसआर फंड है। उनको भी इस दिशा में आगे लाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सरकार गांवों में शौचालय बनाने के लिए 12 हजार रुपये दे रही है। आज के दौर में इस राशि से शौचालय बनाना आसान नहीं है। बाकी की रकम के लिए बैंकों से कर्ज देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। अगर पैसा मिल भी जाए तो साढ़े बारह करोड़ शौचालय बनाने का काम बिना गैर-सरकारी संगठनों के पूरा नहीं हो सकता। दो लाख ऐसे एनजीओ हैं जो रिटर्न दाखिल करते हैं। इस काम के लिए इन एनजीओ में से संस्थाओं का चुनाव किया जा सकता है।

 


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