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बुधवार, 18 जुलाई 2018

गिरमिटिया भारतवंशियों को मुक्ति का स्वाद

गांधी ने न सिर्फ भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व किया, बल्कि उनकी प्रेरणा से दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस और फीजी जैसे कई मुल्क फिरंगी दास्ता से मुक्त हुए

यह जानना बड़ा ही दिलचस्प है कि महात्मा गांधी ने न सिर्फ पराधीन भारत के स्वाधीनता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई, बल्कि गिरमिटिया भारतवंशियों द्वारा आबाद कई अन्य द्वीपों, देशों की आजादी की मशाल भी प्रज्ज्वलित की। एक तरह से देखा जाए तो एक बंटे-बिखरे बड़े परिवार के मुखिया की तरह उन्होंने गिरमिटिया बनकर लाए गए वृहत्तर भारतीयों के सुख-दु:ख का सदा ख्याल रखा। ऐसे ही दंड द्वीपों में एक था मॉरीशस। मॉरीशस के लेखक मित्र राज हीरामन बताते रहे और मैं रोमांचित होता रहा...।

 मॉरीशस तभी से गांधी जी नज़रों में समाया था, जब वे केवल मोहन दास करमचंद गांधी हुआ करते थे। यद्यपि मॉरीशस में उनका आगमन सन् 1901 में हुआ था, (वह भी इत्तेफाकन) पर 22 मई 1896 को ही यह द्वीप उनकी चर्चा में आ गया था। उनकी कई पुस्तकों में मॉरीशस के उल्लेख हैं। सबसे पहले डरबन (दक्षिण अफ्रीका) में उन्होंने मॉरीशस में मतदान के अधिकार पर लिखा। पुन: उसी वर्ष 21 दिसंबर को भी लिखा।

वस्तुत: 1901 में उनके जहाज 'नौशेरा’ ने पोर्टलुई बंदरगाह पर लंगर डाला था। वे यहां के कुछ लोगों से मिले थे और उन्होंने कई जगहों का दौरा भी किया था। लौटते हुए मॉरीशस के भारतवंशियों को उन्होंने कुछ हिदायतें दी थीं, उनमें मुख्य थीं-

1.अपने बच्चों को शिक्षित करो।

2.उन्हें राजनीति की ओर आने को प्रेरित करो।

3.भारत के रुख को देखते रहो।

24 दिसंबर 1901 को कलकत्ते के कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने पुन: मॉरीशस का जिक्र किया, 'हमारे भाई-बंधु यहां से अफ्रीका, जंजीबार, मॉरीशस, फीजी, सिंगापुर आदि देशों में गए। क्या उनके पीछे हमारे भारतीय मिशनरी, वकील, डॉक्टर और प्रोफेशनल्स भी गए? आज उनकी सेवा यूरोप के लोग कर रहे हैं। यूरोपीय मिशनरी उनको धर्म सिखा रही है।’ उन्होंने उपस्थित लोगों से दक्षिण अफ्रीका जाकर अप्रवासी भारतीयों की देख-रेख करने तथा उनके दुख दर्द को कम करने की इच्छा व्यक्त की थी।

3 सितंबर 1893 को 'इंडियन ओपिनियन’ अखबार में उन्होंने मॉरीशस मे आई महामारी पर लेख लिखा था।

26 जून 1915 को उन्होंने भारत के एक महान स्वाधीनता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले को दक्षिण अफ्रीका में आकर सेवा कार्य करने की प्रार्थना की थी। यह भी कहा था कि वह सीलोन और मॉरीशस होते हुए दक्षिण अफ्रीका पहुंचें, ताकि अपनी आंखों से अप्रवासी भारतीयों की दयनीय दशा देख-परख सकें।

7 जनवरी 1911 को इंडियन ओपिनियन में वे लिखते हैं-'मॉरीशस में आप्रवासी भारतीयों की स्थिति दयनीय हैं। वो गुलामी की हालत में जी रहे हैं, इस तरह की गुलामी खत्म हो जानी चाहिए।’

गांधी जी स्वतंत्रता प्राप्ति की चिनगारियां इधर-उधर बिखेरते जा रहे थे, यहां तक कि अखबार के 'टाइप्स’ तक पर उनकी नजर थी- 'मॉरीशस में तो अच्छे अखबार निकालने के लिए सहयोगियों की कमी है।’ वह अखबार उनके द्वारा भेजे गए डॉक्टर मगनलाल मणिलाल निकाल रहे थे। डॉक्टर मगनलाल मणिलाल के कार्य को वे निकट से देखते रहे थे। 24 अक्टूबर 1911 ट्रांसवॉल (दक्षिण अफ्रीका) में मगनलाल की प्रशंसा में उन्होंने गोखले को लिखा- 'डॉक्टर ने मॉरीशस में बहुत अच्छी जन-सेवा की है। वहां के गरीब आप्रवासियों का दिल जीतकर वे उनके मित्र हो गए हैं।’ भारत में जो नवजागरण की लहर चल निकली थी उसके तहत राजा राम मोहन राय और स्वामी दयानंद ने बहुपत्नीत्व से मुक्ति के लिए प्रयास चलाए थे, वही चिंता गांधी जी को मॉरीशस के संदर्भ में भी साल रही थी। 14 दिसंबर 1912 को वहां बहुपत्नीत्व से संबंधित कानून भी पारित हो चुका था। गांधी जी ने 8 जुलाई 1914 को इसके विरुद्ध लिखा था। उन्हीं दिनों पंडित तोताराम सनाढ्य का एक अनुरोध-पत्र उन्हें प्राप्त हुआ था कि फीजी में गिरमिटिया मजदूरों की दशा बद से बदतर होती जा रही है। उनकी मुक्ति के लिए कृपया कोई प्रयास करें। गांधी जी स्वत: तो नहीं जा सके पर उन्होंने मदनलाल मणिलाल डॉक्टर को फीजी भेजा। इस तरह सुधार की तीसरी चिंगारी जो दक्षिण अफ्रीका और मॉरीशस के अतिरिक्त तीसरे दंड द्वीप में फैली, वह भी गांधी जी के प्रयासों से ही संबलित थी। 1948 की अपनी चिर समाधि तक उन्हें न सिर्फ मॉरीशस याद रहा, बल्कि याद रहा फीजी, याद रहे सभी देशों के दुर्दशाग्रस्त गिरमिटिया भारतवंशी।

गांधी जी का हस्तक्षेप एक विशुद्ध भारतीय हस्तक्षेप था, जिसका सुपरिणाम यह रहा कि ये देश धीरे-धीरे आज़ाद होते गए। आज़ाद होकर न सिर्फ एक-एक कर वहां की राजनीतिक सत्ता पर भारतवंशी काबिज होते गए, बल्कि उन्होंने भारतीय भाषा, संस्कृति को भी बचाए रखा। मॉरीशस और सुरीनाम में अगर भोजपुरी आबाद थी तो फीजी में अवधी। मुक्ति की चाहना की आग एक जगह लगाई थी जो छिटकते-छिटकते सारे दंडद्वीपों में फैलती गई। कृतज्ञ भारतवंशियों ने भी गांधी जी को श्रद्धापूर्वक याद रखा। 1968 के 12 मार्च को मॉरीशस स्वतंत्र हुआ तो उनके इसी अहम योगदान को देखते हुए 12 मार्च की स्वाधीनता दिवस की तिथि उनके 'दांडी मार्च’ से ली गई। एक आलोक था जो फैल रहा था न सिर्फ भारत में बल्कि जहां-जहां भी भारतवंशी थे, सर्वत्र!

मॉरीशस के संदर्भ में कुछ साक्ष्यों को कोई कैसे नज़रअंदाज कर सकता है।

 1968 से 1969 तक, एक वर्ष तक गांधी जी की जन्मशताब्दी पूरे मॉरीशस में मनाई जाती रही।

 1969 में मॉरीशस के डाक विभाग ने गांधी जी पर टिकट जारी किया।

 लावांचीर गांव (पूर्व) में 'गांधी भवन’ का निर्माण हुआ, 

 देश के कई भागों में गांधीजी की आवक्ष प्रतिमाएं लगाई गईं हैं।

 1970 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 'मोका’ में 'महात्मा गांधी संस्थान’ की नींव रखी जो गांधी दर्शन के संप्रसारण का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

 1970 में वाक्चा में 'गांधी खादी विद्यालय’ खुला, जहां चरखा आज तक जिंदा है और जिंदा है खादी भी।

 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की भारत में मृत्यु हुई तो शोक संतप्त मॉरीशस में भारतवंशियों ने आधे दिन की दफ्तर की छुट्टी ले रखी थी और अपने दुकानें भी बंद कर दी थीं।

आखिर वह दिन आया जब गांधी जी की अस्थियां मॉरीशस पहुंचीं और लोगों ने अश्रुपूरित नयनों से उन्हें विदा किया। 



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