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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

गांव के बूते गांव के विकास का मॉडल

भारत गांवों का देश है, लिहाज़ा जब तक ग्रामीणों के जीवन में बदलाव नहीं आएगा, तब तक देश भी नहीं बदलेगा। तिलोनिया के बेयरफुट कॉलेज ने बदलाव की इसी दरकार को जमीं पर उतारा है

जब मैं राजस्थान परिवहन निगम की बस से तिलोनिया उतरा तो मुझे वहां कुछ भी खास नजर नहीं आया। मेरी आंखों के सामने एक धूल से सना और एक सोया-खोया गांव था, जो आसपास के दूसरे गांवों से थोड़ा भी अलग नहीं था। भेड़ों-बकरियों के झुंड, चाय की दुकान, रेत से खेलते कुछ बंजारों के बच्चे और दूर की एक छोटी पहाड़ी से झांकती सूर्य की किरणें। साफ है कि आंखों के सामने कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसे देखकर नजरें ठहर जाएं। अलबत्ता तिलोनिया का मॉडल है भी ऐसा नहीं, जिसकी शिनाख्त भौगोलिक रूप से हो। यह मॉडल तो है, टिकाऊ ग्रामीण विकास और ग्रामीणों के जीवन में आई जागरुकता और सशक्तिकरण का, जिसका सारा श्रेय जाता है तिलोनिया के नायाब बेयरहाउस कॉलेज को।

1949 में चीन की स्वाधीनता के साथ माओत्से तुंग ने ऐसे लोगों की जरूरत पर जोर दिया था जो ग्रामीण चीन की हालत में सुधार ला सकें। कुछ ही समय में वहां प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों का दस्ता खड़ा हो गया, जो बुनियादी स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने में जुट गया। इन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को बेयरफुट डॉक्टर नाम दिया गया। इन बेयरफुट डॉक्टरों की मदद से कुछ ही समय में ग्रामीण चीन का कायापलट हो गया। राजस्थान में बेयरफुट डॉक्टरों को लेकर प्रयोग शुरू करने का श्रेय प्रसिद्ध समाजसेवी बंकर राय को है। राय जब 20-22 साल की उम्र के थे, तभी उन्हें यह लग गया कि ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सेवा को लेकर कुछ ऐसा करना होगा, जो यहां की स्थितियों को देखते हुए पूरी तरह कारगर हो।

1972 में राय ने राजस्थान के विभिन्न इलाकों का भ्रमण शुरू किया और वहां सूखे को लेकर हालात का जायजा लिया। अपने इस अनुभव के बाद उन्होंने राजस्थान के ग्रामीण अंचल में एक केंद्र की स्थापना का निर्णय किया। इस तरह जन्म हुआ सामाजिक कार्य और अनुसंधान केंद्र का। इसी केंद्र को आज लोग 'बेयरफुट कॉलेज’ के तौर पर जानते हैं। इस केंद्र के बारे में राय बताते हैं, 'यह केंद्र इस मान्यता को पूरी तरह खारिज करता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में एक-एक मुद्दे पर अलग से सोचा जाए। दरअसल, यहां के जीवन के बारे में समेकित तौर पर सोचने की जरूरत है। मसलन, यहां जो एक परचून की दुकान भी होती है तो वहां घरेलू जरूरत के सामान के साथ खाद-बीज का भी वितरण होता है। यही नहीं गर्भनिरोधक दवाओं से लेकर वहां के जीवन से जुड़ी तमाम सूचनाएं लोगों को मिल जाती हैं। दिलचस्प है कि दुकानदार खुद ग्राम परिषद का सदस्य भी होता है। कह सकते हैं कि उस दुकान पर बैठा व्यक्ति गांव की तमाम समस्याओं और दरकारों का खुद में समाधान है।’

बेयरफुट कॉलेज ग्रामीण स्तर पर एकीकृत तरीके से काम करने की एक ऐसी शैली है, जिसमें वहां के जीवन के तमाम पक्ष समाहित होते हैं। इस तरह देखें तो भूजल, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, महिला सशक्तिकरण, कृषि से जुड़ी सेवाएं, ग्रामीण आजीविका, उपयुक्त तकनीक, पशुधन और सूचना प्रसार तक तमाम किस्म के काम एक साथ किए जाते हैं। बेयरफुट आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कुछ मार्गदर्शक मूल्य तय किए गए हैं। इसके मुताबिक समानता, सामूहिक निर्णय, विकेंद्रीकरण, आत्मनिर्भरता और आत्मसंयम सरीखे मूल्यों को आगे रखकर ही कोई भी काम करना है। बेयरफुट कॉलेज से पिछले चार दशकों से जुड़े रामकरण जी अपने चश्मे को ठीक करते हुए जब अपने काम करने के तरीके और अनुभव के बारे में बताते हैं, तो उनकी बातों में ये सारे आदर्श नजर आते हैं।

वे कहते हैं, 'हमारा ध्येय हमेशा गांव के सबसे गरीब आदमी के कल्याण के लिए काम करना और उसे सशक्त बनाना है। यह बहुत जरूरी है कि हम एक सादगी भरा जीवन जिएं। गरीब आदमी भी अपने अनुभव और ज्ञान के साथ खुद के और सबके विकास में हाथ बंटा सकता है, बशर्ते लोगों के बीच किसी तरह का विभेद न हो, उनकी योग्यता का कोई क्रम न हो।’ रामकरण जी इन दिनों जल संचयन के काम में जुटे हैं। वे सामुदायिक स्तर पर काम करने वाले व्यक्ति हैं। यहीं नहीं, बेयरहाउस कॉलेज में उनकी उपयोगिता यह है कि वे जटिल और चुनौतिपूर्ण स्थितियों के बीच भी सकारात्मक ऊर्जा के साथ काम करते हैं और हर मुश्किल का उनके पास एक सीधा-सरल समाधान है।

 

आसान समाधान, व्यापक प्रभाव

तिलोनिया भ्रमण के दौरान हमारा पहला पड़ाव बना कबाड़ से जुगाड़ केंद्र। यहां रद्दी कागज, रबड़, मोमबत्ती आदि से दीया, बधाई कार्ड, वाल हैंगिंग और कागज के थैले बनाए जाते हैं। इनमें से ज्यादातर सामान की बिक्री गांव में या करीब के शहर में होती है। बुनाई, जरदोज़ी, ब्लॉक प्रिंटिंग और बढ़ईगिरी जैसे काम में भी यहां लोग हाथ बंटाते हैं। ये सारे हुनर ग्रामीणों में स्वाभाविक तौर पर होते हैं, जिन्हें वे आसानी से अपनी आमदनी के स्रोत में बदल लेते हैं।

बिद्दाम देवी जो एक रंगीन कपड़े से कुछ बना रही हैं, उसने घूंघट नहीं काढ़ा है। यह दृश्य इसीलिए चौंकाता है, क्योंकि राजस्थानी महिलाओं के लिए घूंघट काढऩा सामान्य बात है। बिना ऊपर निगाह किए वह बताती है, 'वह यहां 20 साल से ज्यादा समय से काम कर रही हैं। मैंने इस काम में कई महिलाओं को दक्ष बनाया है।

आज ये सभी अच्छी कलाकार हैं और स्वतंत्र व आत्मनिर्भर तरीके से इस खूबसूरत काम को कर रही हैं।’ थोड़ा ठहर कर वे बताती हैं, 'औसतन 4000-5000 रुपए महीने मैं हर महीने कमा लेती हूं। कई बार आमदनी इससे ज्यादा भी हो जाती है।’ इस तरह के कलाकार यहां जो कुछ भी बनाते हैं, वे तिलोनिया बाजार में तो बिकते ही हैं, बेेयरफुट हाउस कैंपस में बने इंपोरियम में भी इनकी बिक्री होती है। अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए ग्रामीण शिल्प के ये नमूने ऑनलाइन भी बिक्री के लिए मौजूद हैं।

 

जागरुकता की कठपुतली

कठपुतली का खेल ग्रामीण भारत की एक परंपरागत कला है, पर विकास और तकनीक के जोर में यह अनूठी कला दम तोड़ रही है। बेयरफुट हाउस कॉलेज ने इस कला को न सिर्फ फिर से जीवित किया, बल्कि आसपास के क्षेत्र में इसके जरिए वह जागरुकता फैलाने का अहम काम भी कर रहा है। इस काम को यहां तल्लीनता से अंजाम दे रहे रामनिवास जी हमें अपने कठपुतली घर में ले जाते हैं और इस कला के जरिए किए गए विभिन्न जागरुकता अभियानों की तस्वीरें दिखाते हैं। वे गांव के मेले और पंचायत बैठकों में खासतौर पर कठपुतली का खेल पेश करते हैं। उन्होंने कठपुतली कला अपने पिता से सीखी है और आज वे बेयरफुट कॉलेज के कम्युनिकेशन टीम के अहम सदस्य हैं। अपने काम के बारे में अनुभव साझा करते हुए रामनिवास जी बताते हैं, 'कठपुतली के जरिए लोगों को जागरुक तो किया जा सकता है, पर यह काम इतना भी आसान नहीं है। कई मौकों पर स्थानीय परंपरागत रूढि़ के खिलाफ बात करने पर आपको विरोध का भी सामना करना पड़ता है। कई बार खुद मुझ पर गांव के मेले में जूते-चप्पल फेंके गए हैं। खासतौर पर बाल विवाह के खिलाफ और महिला अधिकारों के समर्थन में अभियान चलाने के दौरान हमें खासा विरोध झेलना पड़ा। अलबत्ता मुझे और मेरी टीम को इन अनुभवों ने और सशक्त बनाया।’

इसके बाद हम जिस बड़े हॉल में दाखिल हुए, वह एक तरह इंजीनियरिंग प्रयोगशाला थी। वहां बालिग उम्र की कई महिलाएं सर्किट, मल्टीमीटर, सोल्ड्रिंग आयरन के साथ काम कर रही थीं। जैसे ही 'मास्टरजी’ ने इशारा किया, चिदिबरी और उसकी दो सखियों को छोड़ सारी महिलाएं दोपहर के भोजन के लिए निकल गईं।

 चिदिबरी बोर्ड पर बगैर कैपिस्टर्स को लगाए वहां से नहीं जाना चाह रही थी। वह अफ्रीकी देश मलावी से आई महिलाएं है और फिलहाल तिलोनिया में सोलर लैंप का सर्किट और पैनल बनाने का काम सीख रही है। दिलचस्प था कि वह कुछ अंग्रेज़ी बोल सकती थी। उसने अपने बारे में मुस्कराते हुए अंग्रेज़ी में बताया, 'आपको मेरे गांव तक पहुंचने के लिए कम से कम दो घंटे घने जंगलों के बीच से गुजरना होगा, वह भी तब अगर रास्ते में जंगली जानवरों ने आपकी जान बख्श दी। ‘

उसने आगे बताया, 'मेरे गांव में बिजली नहीं है, पर सूर्य की रोशनी हमें खूब मिलती है। गांव के लोगों ने जब पहली बार सोलर लैंप देखा तो वे काफी उत्साहित हुए। यहां से अपना प्रशिक्षण पूरा करने के बाद मैं अपने गांव में अंधेरे से परेशान होनेवाले सभी लोगों को इस बारे में सिखाऊंगी।’ चिदिबरी, उन 15 महिलाओं की टीम की सदस्या है, जो अफ्रीका से यहां प्रशिक्षण लेने आई हैं। ये सारी महिलाएं यहां सोलर लैंप की तकनीक के बारे में सीखकर अपने-अपने गांव-समुदाय के लोगों को इस बारे में प्रशिक्षित करेगी। इस टीम की महिलाओं को लोग यहां 'सोलर मम्मा’ कहकर पुकारते हैं। इस बारे में शाम को बंकर राय समझाते हैं कि सौर ऊर्जा को मां के तौर पर देखने की परंपरा रही है।  बेयरफुट कॉलेज ने 78 देशों से आई सैकड़ों महिलाओं को अब तक सोलर तकनीक के बारे में प्रशिक्षित किया है। इन देशों में नामीबिया, जिंबाब्वे, मेडागास्कर, अफगानिस्तान, नेपाल, कंबोडिया और फिलिपींस शामिल हैं। इन महिलाओं ने यहां से प्रशिक्षण हासिल करने के बाद 50,000 से ज्यादा परिवारों में सौर प्रकाश फैलाया है। ये महिलाएं यहां छह मास के प्रशिक्षण के लिए आती हैं। बेयरहाउस की तरफ से प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों के समुदायों में सोलर लैंप लगाने के लिए कुछ आर्थिक मदद भी की जाती है। एक अच्छी बात यह भी है कि बेेयरहाउस इम महिलाओं को सोलर कूकर और सोलर वाटर हीटर के बारे में प्रशिक्षित कर रहा है। गौरतलब है कि इनमें बहुत ज्यादा तकनीकी महारथ की जरूरत नहीं पड़ती है।

 

सबके लिए शिक्षा

हमारा अनुभव एक बड़े कमरे में संसदीय कार्यवाही को देखने का था। कमरे में संसदीय कार्यवाही शांतिपूर्वक तरीके से चल रही थी। देस के संसदीय अनुभव को देखकर यह सब देखना काफी कुछ देखने पर भी विवश करता है। बाल संसद में नियमित हिस्सा लेने वाले तकरीबन दस साल की उम्र के बच्चों की संसदीय उत्तरदायित्व की गंभीर समझ हैरान करने वाली थी। बाल संसद में चल रही बहस में हिस्सा लेती हुई छठी कक्षा की छात्रा लक्ष्मी कह रही थी कि अगर बच्चे गृहकार्य नहीं करते तो कसूर बच्चे का है, न कि शिक्षक का। इसी तरह उच्च शिक्षा ले रहे छात्रों को चाहिए कि वे अपने खेलने के समय में कटौती कर पढ़ाई पर ध्यान दें।

बाल संसद में लक्ष्मी की बात पर असहमति जताते हुए कई सदस्य अपना सिर हिलाते हैं, जबकि कुछ उसके समर्थन में मेज थपथपाते हैं। लक्ष्मी आगे कहती हैं, 'मैं शिक्षामंत्री से अपील करूंगी कि वे उच्च शिक्षा ले रहे छात्रों के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी करें।’ यह सुनकर शिक्षामंत्री बने 13 साल के भैरव अपने सामने रखे कागज पर कुछ नोट करते हैं। यह दृश्य था, उस बाल संसद का जिसकी कार्यवाही हमारी आंखों के आगे खासी लोकतांत्रिक तरीके से चल रही थी। बेेेयरफुट उन बच्चों के लिए जो दिन में अपने परिजनों के काम में हाथ बंटाते हैं, उनके लिए अलग से सोलर ब्रिज स्कूल चलाता है। इन स्कूलों में सोलर लैंप की रोशनी में पढ़ाई होती है और बच्चों को शिक्षित करने का यह मॉडल तकरीबन 700 गांवों में आजमाया जा रहा है।

 

सामुदायिक रेडियो

अगर आप राजस्थानी महिलाओं के बीच घूंघट प्रथा के खिलाफ लोगों को नहीं जागरूक कर पा रहे हैं तो आपको आरती देवी को सुनना चाहिए। आरती को सुनने के बाद शायद ही कोई होगा जो घूंघट की हिमायत करे। युवा आरती बेेयरफुट के सामुदायिक रोडियो 90.4 एफएम से जुड़ी हैं। इस रेडियो पर आरती और नौरतजी की जोड़ी लोकप्रिय है। आरती खुशी से बताती है, 'गांव में लोग मुझे आरजे आरती कहकर बुलाते हैं। मैंने रेडियो के जरिए खुद अनुभव किया है कैसे लोगों की जिंदगी में परिवर्तन आता है। दिलचस्प है कि यह परिवर्तन शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक हर क्षेत्र में दृष्टिगोचर होता है।’ बेयरफट का यह सामुदायिक रेडियो आमतौर पर 'तिलोनिया रेडियो’ के नाम से जाना जाता है और यह हर दिन 6-7 घंटे तक लाइव चलता है। इसका मुख्य मकसद लोगों को विभिन्न मुद्दों पर जागरूक करना तथा आरटीआई, आधार और जनधन आदि के बारे में सूचनाएं देना है। आखिर में बंकर राय बेयरफट कॉलेज के मॉडल के बारे में बताते हैं कि दुनिया भर में चल रही शिक्षा व्यवस्था गरीब ग्रामीणों तक पहुंचने में विफल रही है, खासतौर पर दक्षिण एशिया में। इससे निजात पाने का एक ही तरीका है कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था की पूरी अवधारणा को ही खारिज

किया जाए और इसकी जगह उस

तरीके के मॉडल पर काम हो, जैसा बेयरफुट ने करके दिखाया है।’



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