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सोमवार, 16 जुलाई 2018

गांधीवाद के ताने-बाने से शक्ल पाता राष्ट्र

हमारी राजनैतिक साख का ताना-बाना अगर गांधी के सत्य, अहिंसा व सदाचार से बुना जाए तो वास्तव में एक नए, ओजस्वी और उदयमान भारत की कल्पना को साकार किया जा सकता है

अमेरिकी भौतिक विज्ञानी फ्रिट्जॉफ काप्रा ने 21वीं सदी के विहान को वैश्विक पूंजीवाद और नेटवर्क सोसाइटी के अभ्युदय के तौर पर देखा था। इस संदर्भ में उन्होंने टिकाऊ समाज रचना की भी बात की थी। आज जब ये बातें हकीकत में सामने आ रही हैं और हमारे चारों तरफ घटित हो रही हैं तो इसके साथ हमारे समाज और पड़ोस में हिंसा की भी एक खतरनाक प्रवृति जोर पकड़ रही है। जिस तरह इस्लामिक स्टेट और कुछ दूसरी कट्टरपंथी जमातें बर्बर हिंसा को अंजाम दे रही हैं और सभ्य कहा जाने वाला यूरोपीय समाज अरबी शरणार्थियों को घर वापस भेजने पर तुला है, उसकी आखिर कोई क्या व्याख्या करेगा? किसी के लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि एक ऐसे दौर में जब मानवता अपने विकास के नए क्षितिज को स्पर्श कर रहा है, तो उसी दौरान हिंसा का यह क्रूरतम रूप आखिर कैसे प्रकट हो रहा है। चिड़चिड़े ख्याल और निराशा से भरे लोग कह सकते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है, ऐसा तो पहले से होता रहा है। शायद इसका जवाब या समाधान धर्म, जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्र की परवाह किए बगैर मानव केंद्रित सामाजिक परिवर्तन की दिशा और तमाम परिस्थितियों में अहिंसा और सत्य की खोज में निहित है।

इसके लिए कई लोग अनुकरण की उम्मीद के साथ दलाई लामा की तरफ देख रहे हैं, तो कई को 1964 में नोबेल सम्मान लेते वक्त मार्टिन लूथर किंग जूनियर के भाषण में मौजूदा संकट का समाधान दिखता है। इस मौके पर उन्होंने अमेरिकी अश्वेतों के लिए कहा था कि 'उन्हें अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए अहिंसक रास्ता अपनाना होगा।Ó इसी तरह एक और नोबेल शांति सम्मान पाने वाली वंगारी मथाई ने गांधी विचार से प्रभावित होकर टिकाऊ विकास के लिए ग्रीन बेल्ट संघर्ष खड़ा किया था। दुर्भाग्य से गांधी को उनके अपने ही वतन में भुला दिया गया है। युवाओं के लिए तो गांधी महज पाठ्यपुस्तक का हिस्सा भर हैं, जिसे वे सरसरी तौर पर पढ़ भर लेते हैंै। 

चाहें तो हम इस बात पर बहस कर सकते हैं कि 21वीं सदी में गांधी की क्या प्रासंगिकता है। विकेंद्रित प्रशासन, कार्बन उत्सर्जन में कमी और टिकाऊ विकास को लेकर उनके विचार पर जरूर बात होनी चाहिए। नासमझ उपभोक्तावाद और भौतिकवादी जोर के बीच गांधी की चिंता निश्चित तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती को लेकर सबसे ज्यादा होती।

अच्छी बात यह है कि गांधी को लेकर एक उम्मीद उभरी है। भले काफी सतही तौर पर राजकुमार हिरानी की फिल्म 'लगे रहो मुन्नाभाईÓ ने नई पीढ़ी का साक्षात्कार गांधी के साथ कराया। उनकी 15 मिनट की एक छोटी फिल्म 'माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथÓ बच्चों को गांधी की दुनिया से दिलचस्प तरीके से परिचित कराती है। इसी तरह ईमानदारी को लेकर उनकी सात मिनट की फिल्म बिना उपदेश दिए बच्चों को बहुत कुछ सिखाती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे स्कूली दिनों में गांधी 'कैटलÓ शब्द शिक्षक की चैतावनी के बावजूद नकल करके अपनी कॉपी पर लिखने को तैयार नहीं हुए। इन छोटे प्रयोगों के जरिए ने हिरानी काफी खूबसूरती से नई उम्र के लोगों को गांधी के समातावादी मूल्य और अहिंसावादी निष्ठा से परिचित कराने में सफल रहे।

हिरानी की यह कामयाबी इस मायने में मेरे सामने एक तस्वीर पेश करती है कि हम राजनीति को गांधी के मूल और कृत्य के साथ कैसे जोड़ें। जाहिर तौर हमें तल्खी, जोर आजमाइश की राजनीति से आगे निकलना होगा। हमारी संसद लोकतंत्र को जीवंत बनाने का बड़ा जरिया बन सकती है, पर यह निजी और राजनीतिक रंजिश का गढ़ बन गई है। इसे हमें बदजुबानी से लेकर असभ्य बहस का हिस्सा बनाने से रोकना होगा। गांधी हमें इस गड्ढ़े से निकाल सकते हैं। उनके मूल्य जन-प्रतिनिधियों के साथ युवाओं का सही मार्गदर्शन कर सकते हैं। सही मायनों में गांधी के विचारों का अनुशरण हमारी आज की पीढ़ी को जीवन के प्रति सम्यक दृष्टिकोण अपनाने को प्रेरित कर सकता है, हमारी राजनैतिक साख का ताना-बाना अगर गांधी के सत्य, अहिंसा व सदाचार से बुना जाए तो वास्तव में एक नए, ओजस्वी और उदयमान भारत की कल्पना को साकार किया जा सकता है, चूंकि गांधीवाद महज एक विचार नहीं, जीवन दृष्टि है और इसको जी कर या इससे गुजर कर एक समभाव-समरस राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है बधाई के पात्र हैं नरेंद्र मोदी कि वे जब-जब भ्रष्टाचार मुक्त शासन, अंत्योदय, खादी को प्रश्रय या स्वच्छ भारत की बात करते हैं तो वे कहीं न कहीं गांधी के आदर्शों को ही शासकीय आचरण में उतारने की पहल कर रहे होतें हैं। निश्चित तौर पर यह गांधी को व्यावहारिक जीवन में उतारने की सराहनीय कोशिश है, जिसका स्वागत होना चाहिए



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