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शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

यादों का इंद्रधनुष

प्राण जैसे खलनायक जो एक बेहतरीन इंसान थे, प्रतिभा के धनी किशोर कुमार जैसे खिलंदर दोस्त या फिर मीना कुमारी जैसी बेहद संवेदनशील अदाकारा के कई किस्से मशहूर हैं-कुछ कही, कुछ अनकही। बता रहे हैं असीम चक्रवर्ती

प्राण

खलनायक की नायकी

पिछले दिनों प्राण साहब की मृत्यु के बाद फिल्मोद्योग के उन सभी लोगों की आंखें नम हो गईं, जिनकी तरफ कभी न कभी उन्होंने मदद का हाथ बढ़ाया था। अपनी एक्टिंग से लाखों दर्शकों के दिलों में रहने वाले प्राण अपनी सहृदयता के लिए भी बहुत लोकप्रिय थे। खास तौर से इंडस्ट्री के स्पॉटब्यॉय, लाइटमैन, सहायक आदि के तो दिल में वे रहते थे। यह किस्सा इंडस्ट्री के एक बहुत पुराने लाइटमैन चंदन ने

इस संवाददाता को सुनाया था। एक बार प्राण साहब इंडस्ट्री से जुड़े एक समारोह में मुख्य अतिथि बन कर महालक्ष्मी गए। महालक्ष्मी से उन्हें आर. के. स्टूडियो शूटिंग के लिए जाना था। वहां मौजूद कुछ वरिष्ठ टेक्नीशियनों ने, जिन्हें भी उसी शूटिंग में जाना था, मन ही मन यह तय कर लिया था कि समारोह समाप्त होने के बाद वह प्राण साहब के साथ हो लेंगे। लेकिन समारोह खत्म होने के बाद प्राण साहब ने उनकी तरफ  देखा भी नहीं। वह अपने कुछ परिचित लाइटमैन और स्पॉटब्यॉय से बातें करने लगे। बातों के दौरान ही उनमें से एक स्पॉटब्यॉय ने बताया कि वे सभी भी वहीं जा रहे हैं, जहां प्राण साहब की शूटिंग है। बस, प्राण साहब ने उन सभी को यह कहते हुए कि रास्ते में बातें करेंगे, झट से उन्हें अपनी गाड़ी में बिठा लिया। वरिष्ठ साथी उनका मुंह ताकते रह गए। यहां तक की अपने सहायक को भी उन्होंने ऑटो से आने को कह दिया। इंडस्ट्री के छोटे कामगारों के प्रति प्राण साहब की यह सहज आत्मीयता उनकी महानता का सिर्फ  एक छोटा-सा उदाहरण है।

मीना कुमारी

सहायक के लिए बदला सीन

बेहद भाव प्रवण अभिनेत्री मीना कुमारी की अदाकारी ही नहीं उनकी सहृदयता के भी कई किस्से मशहूर हैं। फिल्म 'फूल और पत्थरÓ का एक वाकया है। छायाकार नरीमन ईरानी मीना जी पर एक पेचीदा दृश्य फिल्मा रहे थे। शॉट कुछ ऐसा था कि मीना जी को एक संवाद बोलते हुए छत की रेलिंग पर झुक कर खड़े होना था। फिर संवाद बोलते हुए वापस आना था। ईरानी तीन एंगल से इस शॉट को ले रहे थे। इसीलिए उनके सहायक को कटिंग करने के लिए बार-बार रेलिंग के बाहर खड़े होना पड़ रहा था। शॉट खत्म होने के बाद उसे पीछे से आना था। जहां पैर फिसलने और गिरने का पूरा खतरा था। संजोग से यह सीन कई बार री-टेक हुआ। मीना जी ने उस सहायक से पूछा  आप हर बार शॉट खत्म होने के बाद पीछे से क्यों आ रहे हैं। उस सहायक ने मीना जी को समझाया, 'यदि वह ऐसा नहीं करेगा,तो कैमरे में आ सकता है। मीना जी तुरंत रेलिंग के पास जा कर नीचे झांकने लगीं। और अचानक कुछ सोच कर वो डर गईं। फिर मीना जी उस सहायक से उसके परिवारजनों के बारे में पूछने लगी। छायाकार नरीमन ईरानी और निर्देशक रल्हन मीना जी की इस स्वभाव से चिर परीचित थे। सभी जानते थे कि मीना जी इस वक्त उसके परिवार वालों के बारे में सोचने लगी हैं। अगर उसे कुछ हो गया तो उनका क्या होगा? यह सारे खयालात उनके मन में चल रहे है। बेहद भावुक दिल की मीना जी के लिए यह सब आम बात है। अक्सर दूसरों के बारे में सोच कर वो इस तरह भावुक हो जाया करती थीं। मीना जी ने तुरंत फिल्म के निर्देशक ओपी रल्हन से कहा,' रल्हन, यह शॉट तो बहुत रिस्की है। आप इस शॉट को थोड़ा चेंज कीजिए, वरना इस बेचारे को बहुत गहरी चोट लग सकती है।Ó रल्हन भला मीना जी का आग्रह कैसे टाल सकते थे। उन्होंने वह शॉट बदल दिया। इस बार वह शॉट एक टेक में ओके हो गया। बाद में पैक-अप होने के बाद मीना जी ने उस सहायक को बुलाकर उसके बच्चों की मिठाई के लिए 100 रुपए बतौर ईनाम भी दिया।

किशोर कुमार

शैलेंद्र से बेतक्कलुफ दोस्ती

गायक, अभिनेता....और भी न जाने क्या-क्या... बहुमुखी प्रतिभा के धनी जीनियस किशोर कुमार और जनकवि शैलेंद्र की गहरी मित्रता के बारे में सोचना भी कई लोगों को अटपटा लगेगा। बात सच भी है, कहां किशोर जैसे मस्त-मौला, तो कहां शैलेंद्र जैसे धीर-गंभीर शख्स। मगर बहुत कम लोगों को पता होगा कि दोनों बहुत अच्छे दोस्त भी थे। वैसे शैलेंद्र से कई फिल्मवाले गहरा लगाव रखते थे। जिनमें देव साहब भी थे। बात 'गाइडÓ के गानों के रेकॉर्डिंग के समय की है। एक दिन काम पूरा होने के बाद देव साहब ने कहा-आज पार्टी करते हैं। किशोर सहित सारे लोग तैयार हो गए ,मगर शैलेंद्र ने असहमति व्यक्त की। वजह यह बताया कि आज घर में कुछ मेहमान आनेवाले हैं। किसी ने कुछ नहीं कहा, मगर किशोर दा को कुछ शंका हुई। उन्होंने देव साहब से कुछ खुसर-फुसर की-मुझे संदेह है, हमेशा की तरह यह आज भी कोई बहाना बना रहा है, इसके घर में कोई मेहमान नहीं आनेवाला है। बहरहाल इसके बाद सब अपने-अपने घर जाने के लिए निकल पड़े। मगर शैलेंद्र जैसे अपने घर पहुंचे उसके कुछ देर बाद उनका पीछा करते हुए किशोर दा वहां पहुंच गए। वजह यह बताई कि वहां से गुजर रहे थे, सोचा भाभी और बच्चों का हाल-चाल भी पूछ लूं, और आने वाले मेहमान से भी मिल लूं। शैलेंद्र्र कुछ नहीं बोले। चाय का दौर चला। लेकिन किशोर जाने का नाम नहीं ले रहे थे। जब रात होने लगी ,तो शैलेंद्र ने मजबूरी में उन्हें रात के भोजन के लिए भी कहा। किशोर ने कहा,' आया हूं ,तो भाभी के हाथ का बना खाना खाकर ही जाऊंगा।Ó शैलेंद्र क्या कहते,खामोशी से किशोर की हरकतों को बर्दाश्त करते रहे। और किशोर थे कि उनकी मस्ती का कोई अंत नहीं था। इस तरह से रात के जब 1 बज गए ,तो किशोर खुद शैलेंद्र्र पर तरस खाकर बोले,'अच्छा मैं चलता हूं। रात काफी हो गई है, तुम सब सोने को जाओ। तेरा मेहमान तो आया नहीं,अगली बार जब आएगा तो मिल लूंगा।Ó इसके बाद फिर कभी शैलेंद्र ने मेहमान का बहाना नहीं बनाया।



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