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मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

छोटे बच्चे बड़ी कविता

जिस तरह दुनिया में सूचना का शोर बढ़ा है, इससे युवाओं का सृजनात्मक परिदृश्य बिगड़ गया है। ऐसे में दिल्ली स्थित 'स्लैम आउट लाउड’ नामक एनजीओ ने युवाओं की सृजनात्मकता को बचाए रखने के लिए एक दिलचस्प तरीका खोज निकाला है

'मुस्लिम आकाश हैं और हिंदू धरा, लेकिन वे ये नहीं समझ पाते कि एक दूसरे के साथ मिलकर ही वे एक बेहतर धरती का निर्माण कर सकते हैं।’ 11 वर्षीय नीतीश जैसे ही स्वरचित कविता पढ़ता है, वह अपनी विशिष्टता के गौरव से ओत-प्रोत हो उठता है। नीतीश एक सरकारी स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ता है। उनके पिता आजादपुर सब्जी मंडी में अदरक बेचते हैं। वह अपने परिवार के साथ दिल्ली के एक गांव भरोला में रहता है। भरोला में घुसते ही आपको एक समुदाय के बीच कोलाहल की शोर सुनाई देती है। यह शोर यहां की सार्वकालिक पहचान भी बन चुकी है, जो हर किसी का ध्यान आकर्षित करती है। खेलते बच्चों के समूह और सिगरेट पीने के साथ ही आने-जाने वालों पर फब्तियां कसते किशोरवय युवक सहज ही देखे जा सकते हैं। बच्चों और युवकों की बात छोडि़ए, यहां के बुजुर्ग भी सरेआम तास खेलते दिख जाते हैं। नीतीश इसी माहौल में अपने माता-पिता और तीन भाई-बहनों के साथ रहता है। उसके पास एक ही कमरा है, जिसका रसोई से लेकर डाइनिंग रूम, लिविंग रूम और बेड रूम के रूप में इस्तेमाल होता है। पूछने पर नीतीश ने स्वीकार किया, 'मैं चाहे घर पर रहूं या स्कूल जाता रहूं, दोस्तों के साथ खेलता रहूं या फिर टीवी देखता रहूं, मैं हमेशा अपने चारों ओर घट रही घटनाओं पर नजर रखता हूं और उसके बारे में सोचता रहता हूं।’ उसका कहना है, 'मेरा दिमाग विचारों से भरा रहता है। कभी-कभी तो मैं लोगों के बीच हो रहे झगड़े, अपने देश के किसानों की दुर्दशा तथा अपने चारों ओर घटित हो रही अन्य घटनाओं के बारे में तथा इसके पीछे के कारणों के बारे में सोचता रहता हूं। लेकिन स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए मुझे उपयुक्त माध्यम नहीं मिल पाता है। कविता एक ऐसा माध्यम है, जिसके सहारे मैं कुछ भी यानी सब कुछ लिख सकता हूं।’ गंभीर और मुद्दा आधारित कविता हमेशा से वयस्कों की विशिष्टता मानी जाती रही है। इसी साल 17 सितंबर को दिल्ली के 11 उदीयमान कवियों के साथ नीतीश ने बेंगलुरु में नेशनल यूथ पोएट्री स्लैम के मंच पर काव्य पाठ किया। हिंदू कॉलेज, जादवपुर यूनिवर्सिटी तथा सिंबॉसिस इंस्टीट्यूट समेत देश की कई कॉलेजों की टीमों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इन बच्चों के साथ बेंगलुरु गए गौरव सिंह ने अपना संस्मरण सुनाया। इस मंच ने बच्चों को कविता और कवि के रूप में अपनी क्षमता का अहसास कराया। इसने बच्चों को और बड़ा सोचने, मसलों को गहराई से समझने तथा अपनी आवाज सुनाने के लिए प्रेरित किया है। ये बच्चे किसी खास पाठक वर्ग को खुश करने के लिए नहीं लिखते हैं। बच्चों की कविताओं से उनकी पवित्र सोच और सरलता प्रतिबिंबित होती है। स्लैम आउट लाउड जिज्ञासा लाब्रू के साथ मिलकर गौरव ने एक साल से भी अधिक समय तक इन बच्चों को न केवल संभाला, बल्कि प्रशिक्षित करने के साथ उत्साहित भी किया है। स्लैम आउट लाउड एक ऐसा संगठन है, जो उपेक्षित समुदाय के बच्चों की आवाज को अभिव्यक्ति का माध्यम बताता है। ये दोनों एक सरकारी बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय में 'टीच फॉर इंडिया’ के शोधार्थी थे। यह वही समय था, जब वे उन बच्चों को पढ़ा रहे थे तभी उन्होंने महसूस किया कि कविता में इन बच्चों के जीवन बदलने की असीम क्षमता है। जिज्ञासा कविता को हमारी शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण कारक मानती हैं। अपने आकलन के मुताबिक उनका कहना है कि हमारे समाज में, स्कूलों में लगने वाली कक्षा स्मरण कौशल को दक्ष बनाने तथा अंक हासिल करने की कभी न खत्म होने वाली इच्छाएं सृजित करने पर केंद्रित होती है। हम अपने बच्चों पर इससे भी आगे निकलने का दबाव डालते हैं और इस धुन में भूल जाते हैं कि सही मायने में बचपन किसलिए होता है। वास्तविकता में हम जिन चुनौतियों (वैश्वीकरण, प्राकृतिक बदलाव, लैंगिकता आदि) का सामना करते हैं ये सारी चीजें स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली चीजों से काफी अलग हैं। हमारे बच्चों में संवेदना ठहर-सी गई है। उनके पास चीजों की परख और आत्मावलोकन का वक्त नहीं बचा है। स्लैम आउट लाउड में कविता केवल अभिव्यक्ति का ही शक्तिशाली अस्त्र नहीं मानी जाती, बल्कि बच्चों के जीवन में सही विचार और खुशी लाने का माध्यम भी मानी जाती है। संस्था का ध्यान बच्चों के लिए एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना है, जहां वे बाहरी दुनिया से संवाद स्थापित करने में सफल हों। यह संगठन 9 से 16 साल के बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजित करता है, जहां बच्चों को सामथ्र्यवान बनाने के लिए कविता को एक अस्त्र के रूप में उपयोग किया जाता है। ये कार्यक्रम खुले विचार, सहिष्णुता, संवेदना, सम्मान और विविधता को स्वीकार करने के मूल्य के साथ साक्षरता और जीवन कौशल सीखाने पर केंद्रित होते हैं। वैसे स्लैम आउट लाउड की शुरुआत तो नई दिल्ली से हुई है, लेकिन अब यह पांच राज्यों में फैल चुकी है। 12 महीनों के अपने प्रयास के दौरान इसने जिन 2000 से अधिक बच्चों को प्रभावित किया है, उनमें से 80 प्रतिशत बच्चे निम्न आय वर्ग समुदाय के हैं। स्लैम आउट लाउड ने जिजीविषा नाम से एक फेलोशिप शुरू करने की पहल की है। इसके माध्यम से सरकार स्कूलों और कम आय वाले निजी स्कूलों के बच्चों को कविता की कला से अवगत कराने के लिए अभ्यासरत कवियों को मंच उपलब्ध करा रहा है। नेशनल यूथ पोएट्री स्लैम में अपना प्रदर्शन करने वाले 12 बच्चे अपने शिक्षक द्वारा चुने जाएंगे। कविता के रंग भावना या सामाजिक मुद्दों पर कविता के लिए एक खास स्तर की अभिव्यक्ति की जरूरत पड़ती है। जब चंदा ने अलगाव के दर्द पर अपनी ही लिखी कविता, 'जो चले गए वो मेरे थे’ या फिर खुशबू ने 'आज कल के रोग है लोग!’ गाया तो हर कोई कविता की पारंपरिक अवधारणा पर प्रश्न उठाने को विवश हो गया। चंदा ने याद कर बताया, 'मैंने किसान की आत्महत्या पर खबर देखी और सोचने लगी कि उन किसानों को कितना दर्द होता होगा, जो अपने सामने फसलों को बर्बाद होते देखते हैं, लेकिन उसे बचाने के लिए कुछ कर नहीं सकते। इसी घटना ने मुझे इस तरह की कविता लिखने को प्रेरित किया।’ खुशबू पड़ोसी की कहानी से प्रेरित हुई। 'मेरे पड़ोस के घर में एक किन्नर का जन्म हुआ था। उसके माता-पिता बहुत खुश थे। एक-डेढ़ साल तक उन्होंने अपने बच्चों को सबसे अधिक प्यार किया।’ यह कहानी बताते वक्त उसका गला रूंध गया। लेकिन पड़ोसी उनके निर्णय पर सवाल खड़े करने लगे। लोगों के ताने से आजिज आकर अंत में उन्हें अपने बच्चे को किन्नरों के एक समूह के हवाले करना पड़ा। इस घटना ने तो उसे हिला कर रख दिया। चंदा और खुशबू दोनों ही महज 13 साल की हैं। अभी तक वयस्कों के आधिपत्य वाले कविता के क्षेत्र में बच्चों की सक्रिय भागीदारी ही स्लैम आउट लाउड की परिकल्पना है। अपने परिवेश को समझने के लिए बच्चों और वयस्कों के नजरिए में मौलिक अंतर है। पक्षपात की परतें सालों से इतनी मोटी हो गई हैं कि हमारे दिमाग की रचनात्मकता प्रदूषित हो चुकी है, जबकि बच्चे अपनी रचनात्मकता को शुद्ध रखना पसंद करते हैं। नई सोच के साथ स्लैम आउट लाउड बच्चों के सामाजिक दृष्टिकोण को बदल रहा है। कविताएं अछूत जात-पात, छुआछूत, मन से भुला के आगे बढ़ो, कंधे से कंधा मिला के। खत्म कर दो लोगों के मन से छुआछूत चलो अब चलें, हम एकता के रास्ते। लोगों के मन से ये धब्बा हटा के, ऊँची जाति, नीची जाति सबको मिटा के चलो अब चलें, हम एकता के रास्ते। जब से ये हमारा संसार बना है तब से ये लोगों के मन में बसा है बहुत हुआ अत्याचार, कम भी करना है चलो अब चलें, हम एकता के रास्ते जात-पात, छुआछूत, मन से भुला के आगे बढ़ो, कंधे से कंधा मिला के। -खुशबू, आयु-12 वर्ष, ग्रेड-6 सर्वोदय कन्या विद्यालय, आदर्श नगर किसान किसान है एक मसीहा देता हजारों जिंदगियां। नहीं समझते लोग इन्हें कर देते बोझ और बड़ा। खूब बहाते ये पसीना पर लोग ना पोंछे इनका पसीना। वे बेचारे सुबह हैं उठते इंतजार वे करते कि सूरज,बारिश खेत को खाना क्यों नहीं देते। गमछा बन जाए कफन इनका जब बेचारे पानी से भाप बनते॥ आसमान है इनका पानी छिनता फिर ना कोई उपाय बचता। चलो-चलो भई जल्दी चलो अकाल आने वाला है। मदद करो भई मदद करो किसान जाने वाला है। हरियाली फैलाओ, हरियाली फैलाओ वरना धरती फीकी पड़ जाएगी। मदद करो भई मदद करो तभी मुश्किलें आसान बन पाएंगी। एक नहीं, दो नहीं, हजारों में किसान मरे नहीं मिल रहा इन्साफ इनका मैं नहीं, तुम नहीं, सब मिलकर इंसाफ दिलाएं किसान है एक मसीहा देता हजारों जिंदगियां। -नीतीश, आयु-11, ग्रेड-6


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