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शनिवार, 17 नवंबर 2018

सरकारी लोगों की असरकारी पहल

बाल मजदूरों को उनके मालिकों के चंगुल से आजाद कराने के अभियान तो चलाए जाते हैं, पर ऐसे बच्चों के पुनर्वास को गंभीरता से नहीं लिया जाता। टीम गोंडा ने 'सर्वोदय योजना’ के तहत इस कमी को पूरा करने की एक अनूठी, पर कारगर पहल की है

रेडिमेड पोशाकों की दुकान पर काम करने वाले 14 साल के बाल मजदूर शादाब खान की दुनिया रातोंरात बदल गई। दुकान पर जब वह काम करता था तो उससे रोजाना कम से कम 11 घंटे काम लिए जाते थे। शादाब की जिंदगी में बदलाव की इबारत लिखी टीम गोंडा ने। टीम गोंडा यानी जिले के श्रम और दूसरे विभागों के अधिकारियों का एक समूह। टीम गोंडा ने अपनी अनूठी पहल के तहत बाल मजदूरों को उनके मालिकों के चंगुल से पहले आज़ाद कराने और फिर जिले के सरकारी अधिकारियों को गोद देने की योजना पर काम करना शुरू किया है।

बाल मजदूरी को लेकर इस अनूठी पहल को लेकर पहली बार बात एक महीने पहले जिला श्रम समिति की बैठक में हुई थी। गोंडा के जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन बताते हैं, 'बाल मजूदरी के खिलाफ कोई भी अभियान चलाने में सबसे बड़ी चुनौती यही सामने आती है कि ऐसे में बच्चे को तो उनके मालिकों के चंगुल से मुक्त करा लिया जाता है, पर उनके पुनर्वास को लेकर कोई काम नहीं होती है। इसका हश्र यह होता है कि ज्यादातर बाल मजदूर फिर से काम पर लौट आते हैं और एक बार फिर से शोषण-उत्पीडऩ के दुष्चक्र में फंस जाते हैं। बैठक में कुछ अधिकारियों ने मशविरा दिया कि 'ऐसे बच्चों को जिले के अधिकारियों द्वारा गोद लेकर समाज के सामने एक अच्छा उदाहरण पेश किया जा सकता है।’     

 कैंपेन अगेंस्ट चाइल्ड लेबर (सीएसी) ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि देश में करीब 1.26 करोड़ बाल मजदूर हैं। इनमें सबसे ज्यादा 19.27 लाख यानी 20 फीसद बाल मजदूर अकेले  उत्तर प्रदेश में हैं। यह समस्या गांवों में खेती-किसानी के काम में बच्चों से काम लेने से लेकर शहरों में घरों, गैराजों, रेस्तरां और फैक्टिरियों में अमानवीय तरीके से काम लेने तक फैला है। बाल मजदूरी के खिलाफ शुरू हुई इस कारगर पहल को 'सर्वोदय योजना’ का नाम दिया गया है।

योजना का लक्ष्य है कि बाल मजदूरों को न सिर्फ उनकी दासता से मुक्त कराया जाए, बल्कि उनका सही तरीके से पुनर्वास भी किया जाए, ताकि वे दोबारा इस चंगुल में न फंसें। देवीपाटन जिले के उप श्रम आयुक्त शमीम अख्तर बताते हैं कि सर्वोदय योजना में खासतौर पर इस बात पर ध्यान दिया गया है कि इसमें बच्चों का न सिर्फ सुरक्षित पुनर्वास हो, बल्कि बच्चों के परिवारों को भी आर्थिक तौर पर सुदृढ़ किया जाए, ताकि वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें और बच्चों को स्कूल भेजें न कि काम करने।

जिस तरह से यह योजना चल रही है, उसमें बाल मजदूरों को मुक्त कराने के बाद उसे गोद देने के लिए व्यक्तियों, अधिकारियों और गैरसरकारी संस्थाओं की पहचान की जाती है। पिछले महीने शुरू हुई इस योजना में अब तक नौ बाल मजदूरों को न सिर्फ उनके मालिकों से मुक्त राय गया है, बल्कि कानूनी तौर पर सभी को गोद लेने का काम भी पूरा किया गया है। यह सारा काम 'टीम गोंडा’ के नाम से बने समूह के अधिकारियों द्वार काफी लगन से किया जा रहा है। इस अनूठी पहल में जिस पहले बच्चे को गोद लिया गया, उसका नाम शादाब है और वह 14 साल का है। दिलचस्प है कि शादाब को खुद गोंडा के जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन ने गोद लिया है।

गोंडा नोबेल से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की कर्मभूमि भी है। सत्यार्थी ने सर्कस में काम करने वाले इस इलाके के कई बच्चों को मुक्त कराया है। ऐसे ही एक मुक्ति अभियान में एक बार वे गंभीर रूप से घायल भी हो गए, जब सर्कस मालिकों के गुंडों ने उन पर आक्रमण कर दिया था।

शादाब की मां साफिया बताती हैं, 'डीएम साहब और उनकी पत्नी का सलूक काफी अच्छा था, जब वे मुझे और शादाब को अपने घर पर खाना खाने के लिए बुलाए थे। उन्होंने मेरे बेटे को खाने के लिए महंगे मेवे और नए कपड़े दिए। उन्होंने शादाब को साइकिल भी दी, ताकि वह ट्यूशन पढऩे जाए और नए सत्र में किसी अच्छे स्कूल में उसका दाखिला हो सके।’ दरअसल, शादाब जैसे बच्चों के परिवार खासी तंगी में रहते हैं और निरक्षर हैं। उनके पास बच्चों को स्कूल भेजने के लिए न तो पैसे हैं और न ही कोई वैकल्पिक साधन। नतीजतन, ऐसे परिवारों के बच्चे दस साल की उम्र से काम पर जाने लगते हैं और यह सब उनके मां-बाप की जानकारी और सहमति से होता है। आज शादाब की जिंदगी पहले के मुकाबले पूरी तरह बदल गई है। वह जिलाधकारी निरंजन की पत्नी डॉ. नेहा सिंह से काफी प्रभावित है और बड़ा होकर उनकी तरह डॉक्टर बनकर गांवों के गरीबों की सेवा करना चाहता है। निरंजन बताते हैं कि बाल मजदूरी के खिलाफ इस अभियान की कामयाबी के लिए वे एक ई-डाटा तैयार करने में लगे हैं, ताकि गोद लिए गए बच्चों की परवरिश और उनके विकास पर पूरी निगरानी रखी जा सके। इस ई-डाटा में बच्चे की शिक्षा, विकास और स्वास्थ्य को लेकर हर तिमाही आंकड़े अपडेट किए जाते हैं।

निस्संदेह यह एक छोटी कोशिश है, पर बाल मजदूरों की जिंदगी बदलने वाले इस अभियान के अनूठेपन की तारीफ हर तरफ हो रही है। बड़ी बात इस योजना की यह है कि इसमें बच्चों को तो बाल मजदूरी के चंगुल से बाहर निकाला ही जाता है, उसकी सेहत और तालीम पर भी पूरी नजर रखी जाती है। यह भी कि ऐसा बच्चे के परिवार पर बगैर कोई आर्थिक बोझ बढ़ाए किया जाता है। जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन की इस पहल से प्रेरित होकर कई दूसरे जिलाधिकारी भी इस तरह की योजना अपने जिलों में शुरू करने की सोच रहे हैं। इनमें से कई ने तो श्रम अधिकारियों को इस बारे में जरूरी स्टडी रिपोर्ट भी तैयार करने को कह दिया है।



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