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गुरुवार, 24 मई 2018

महात्मा गांधी और हिंदी

भले ही गांधी हिंदी के साहित्यिक मिजाज और समाज से उस हद तक जुड़ नहीं पाए, फिर भी उन्होंने हिंदी के सिवा किसी अन्य भाषा को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के बारे में कल्पना भी नहीं की  

हिंदी साहित्य सम्मेलन के कर्णधार गुट ने उन्हें इन्दौर अधिवेशन के लिए सभापति चुना था। उसके अध्यक्ष पद से बोलते हुए अपनी भावना को महात्मा गांधी छुपा नहीं पाए-

'इस मौके पर अपने दुख की भी कुछ कहानी कह दूं। हिंदी भाषा राष्ट्रभाषा बने या न बने, मैं उसे छोड़ नहीं सकता। तुलसीदास का पुजारी होने के कारण हिंदी के प्रति मेरा मोह रहेगा ही। लेकिन हिंदी बोलने वालों में रवींद्रनाथ कहां हैं? प्रफुल्ल चंद्र राय कहां हैं? जगदीश चंद्र बोस कहां हैं? ऐसे और भी नाम मैं बता सकता हूं। मैं जानता हूं कि मेरी अथवा मेरे जैसे हजारों की इच्छा मात्र से ऐसे व्यक्ति थोड़े ही पैदा होने वाले हैं। लेकिन जिस भाषा को राष्ट्रभाषा बनना है, उसमें ऐसे महान व्यक्तियों के होने की आशा रखी ही जाएगी।’

अंग्रेजी भाषा के महत्व से वे इंकार न कर पाते, 'इच्छा न रहते हुए भी हमको अंग्रेज़ी पढ़नी ।’  नेहरू जी की धारणा भी यही थी। यद्यपि दोनों ही महापुरुषों ने इस सच्चाई से आंखें चुराईं कि अंग्रेजी का प्रताप इसीलिए नहीं है कि वह समृद्ध है बल्कि इसीलिए है कि सारा कारोबार अंग्रेजी के माध्यम से होता था, न सिर्फ शासन-प्रशासन, अर्थतंत्र, शिक्षा बल्कि कांग्रेस का कामकाज भी। रवींद्र, प्रफुल्ल चंद्र या जगदीश चंद्र बोस के होने मात्र से बात बननी होती तो बांग्ला कब की राजभाषा बन गई होती। इस तथ्य को गांधी जी अनदेखा कर गए।

यहीं पर निराला गांधी जी की राय से आहत हुए। उन्हें लगा, यह हिंदी साहित्यकारों की साधना, जिसमें उनकी स्वयं की साधना भी शामिल थी, का घोर अपमान है।

गांधी जी जब लखनऊ आए तो खुद को रोक न सके निराला। हालांकि निराला को वहां भी उनसे मिलने न देने के बहाने गढ़े गए। फिर भी जैसे-तैसे निराला उपेक्षा का व्यूह भेदन करते हुए गांधी जी तक पहुंच ही गए। पहुंचते ही, जैसा कि निराला का स्वभाव था, अपने वेदांत के ज्ञान का प्रयोग करते हुए हिंदी की उपेक्षा के संदर्भ में उनसे कहा कि 'मैं आपसे निवेदन करने आया हूं कि आप हिंदी की कुछ चीजें सुन या जान लें फिर कोई धारणा बनाएं।’ गांधी जी ने कहा, 'मैं गुजराती बोलता हूं, लेकिन गुजराती का साहित्य भी बहुत कुछ मेरी समझ में नहीं आता ।’  स्पष्ट बात गांधी जी कर रहे थे। निराला उन्हें कहां छोडऩे वाले थे, 'मैंने गीता पर लिखी आपकी टीका देखी है। आप गहरे जाते हैं और दूर की पकड़ आपको मालूम है।’

'मैं तो बहुत उथला आदमी हूं, ‘गांधी जी बचने की कोशिश करते रहे, निराला उन्हें घेरने की...., बोले, 'आपके अभिभाषण में हिंदी के साहित्य और साहित्यिकों के संबंध में जहां तक मुझे स्मरण है, आपने एकाधिक बार पं. बनारसीदास चतुर्वेदी का नाम लिया है, सिर्फ..... इसका हिंदी के साहित्यिकों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, क्या आपने कभी सोचा?’

'मैं तो हिंदी कुछ भी नहीं जानता।‘ गांधी जी बाले।

निराला ने कहा, 'फिर आपको क्या अधिकार है यह पूछने का कि हिंदी में रवींद्रनाथ कहां हैं?’

'मेरे कहने का मतलब कुछ और था।‘

'यानी आप रवींद्रनाथ जैसा साहित्यिक हिंदी में नहीं देखना चाहते, प्रिंस द्वारकानाथ ठाकुर का नाती या नोबेल पुरस्कार प्राप्त मनुष्य देखना चाहते हैं?’

निराला के इस आरोप पर उपस्थित भद्रजन स्तब्ध रह गए। निराला ने आगे कहा,  'बांग्ला मेरी वैसी ही मातृभाषा है जैसी हिंदी, मैं आपसे आधा घंटा समय चाहता हूं, बांग्ला और हिंदी की कुछ चुनिंदा चीजें सुनाने और उसके विवेचन के लिए।’

'मेरे पास समय नहीं है।’ गांधी जी ने कहा और निराला को सुझाव दिया कि वे अपनी किताबें उनके पास भेज दें।  'आपको हिंदी अच्छी नहीं आती, आप कह चुके हैं।’  इस प्रसंग में निराला ने अपने तत्कालीन विरोधी और गांधी जी के साथ रह रहे पं. बनारसी दास चतुर्वेदी की योग्यता पर भी सवाल करते हुए पूछा, 'यही नहीं, अगर मैं नहीं भूलता तो कवि श्री मैथिलीशरण जी गुप्त के 'साकेत’ की भाषा को भी आपने मुश्किल कहा है।‘

गांधी जी ने स्वीकारा 'हां।‘   

'फिर मेरे 'तुलसीदास’ का क्या होगा?’  

गांधी जी निराला की कविता 'तुलसीदास’ और हिंदी के महाकवि तुलसीदास में गड़बड़ाने लगे।

गांधी जी को प्रणाम कर लौट आये निराला।

निराला ही नहीं, तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती ने भी गांधी जी से ऐसा ही इसरार किया था, पर गांधी जी के पास समय नहीं था। गांधी जी की भाषा-दृष्टि जहां बहुआयामी थी जो साहित्य के साथ ज्ञान-विज्ञान, विचारों को अपनी जद में ले लेती थी, वहीं निराला और सुब्रमण्यम भारती की दृष्टि अपने साहित्य (हद से हद अपनी-अपनी भाषा के साहित्य) मात्र तक सीमित थी, उसमें ज्ञान-विज्ञान शामिल नहीं था, जहां उन्हें बगलें झांकना पड़ता।

गुजरात शिक्षा सम्मेलन के सभापति पद से बोलते हुए गांधी जी ने कहा, ' राष्ट्रभाषा वही भाषा हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो, जो धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में माध्यम बनने की शक्ति रखती हो, जिसके बोलने वाले बहुसंख्यक हों, जो पूरे देश के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो। अंग्रेजी किसी भी तरह से इस कसौटी पर खरी नहीं उतर पाती। लेकिन गांधी जी ने यह भी कहा, 'हम हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाने की बात ही करते रहे और स्वयं हमने अपने जीवन में उसकी उपेक्षा की।‘

यह गांधी जी ही थे जिन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर को भी हिंदी में बोलने के लिए लिए बाध्य किया था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बनारसीदास चतुर्वेदी से कहा था,  हिंदी पढ़ भी लेता, अर्थ भी समझ लेता हूं, किन्तु वह वातावरण, जो शब्दों के साथ लिपटा रहता है, मेरे पल्ले नहीं पड़ता।

यह गांधी जी का ही प्रभाव था कि उन्होंने हिंदी में भाषण दिया। बावजूद इन सबके हिंदी भाषा के मायने में उनका रुख बहुत स्पष्ट रूप से पता नहीं चलता कि वे राष्ट्रभाषा के रूप में किस प्रकार की हिंदी चाहते थे। संभवत: उनकी पसंद उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी या सहज सरल हिंदी थी, तत्सम शब्दों से बोझिल हिंदी नहीं, जबकि बांग्ला में रवींद्रनाथ ठाकुर की भाषा तत्सममयी ही थी।

जिन दिनों काशी में मैथिलीशरण गुप्त के अभिनंदन का सप्ताह मनाया जा रहा था, गुप्त जी का अभिनंदन करने के लिए बड़ी चिरौरी मिनती करके गांधी जी को राजी कराया गया। गांधी जी ने कहा, 'मेरे हाथों द्वारा जो यह भेंट दिलाई गई, वह अच्छी नहीं मालूम हुई। न तो मैं कवि हूं, न मैं हिंदी भाषा को ही अच्छी तरह जानता हूं। मुझे तो किसी छोटे या बड़े की जयंती मनाना भी पसंद नहीं है- यही किसी की जयंती मनाना भी हो तो तब मनाना चाहिए, जबकि वह आदमी न हो।...

प्रेमचंद की मृत्यु पर भी उनका कुछ वैसा ही रुख था। कारण जो भी रहा हो, स्पष्ट है गांधी जी हिंदी के साहित्यिक मिजाज और समाज से जुड़ नहीं पाये थे, बावजूद इसके हिंदी के अलावा किसी और भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

 
 


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