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सोमवार, 23 जुलाई 2018

मोहल्ला क्लीनिक में स्वागत है

सरकारी अस्पतालों पर काम का बोझ ज्यादा है, तो निजी अस्पताल खर्चीले हैं। गरीबों की इन दोनों समस्याओं का समाधान दिल्ली सरकार द्वारा शुरू किए गए मोहल्ला क्लीनिक में उपलब्ध है। लेकिन इसकी अहमियत केवल दिल्ली तक नहीं है, देश के अन्य राज्य भी इसका लाभ उठा सकते हैं

दिनेश केवट एक सब्जी विक्रेता हैं। पिछले सप्ताह वे तीन बार बेहोश हो गए, इसके बावजूद वे सरकारी अस्पताल में जाने को तैयार नहीं हुए। लेकिन आठवीं कक्षा में पढऩे वाली उनकी पुत्री को इलाके में स्थित मोहल्ला क्लीनिक के बारे मेंं पता था। इसके बाद क्या था, वे आजादपुर क्लीनिक पहुंच गए। डाक्टर ने उनकी जांच-पड़ताल की और उन्हें खून जांच कराने के लिए कहा। कुछ ही मिनटों में उनका वहीं पर खून जांच भी हो गई और इसके बाद उन्हें दवा लिख दी गई। दवा भी वहीं पर मिल गई। यह सब कुछ 20 मिनट में हो गया। यानी एक ही छत के नीचे परामर्श, दवाओं और परीक्षण का मुफ्त लाभ उठा सकते हैं। दिनेश की तरह करीब 15 लाख मरीज पिछले एक साल में दिल्ली के 106 मोहल्ला क्लीनिकों से लाभांवित हो चुके हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, प्रत्येक क्लीनिक एक मोहल्ला के लिए है यानी करीब दस हजार आबादी पर एक क्लीनिक। जाहिर है इसका उद्देश्य आम आदमी को राहत प्रदान करना है, जो साधन-संपन्न न होने के कारण इस व्यवस्था में हाशिए पर हैं। 

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था का ढांचा चरमरा चुका है। 1.3 अरब की आबादी वाले देश में महज 9.29 लाख डाक्टर हैं। यहां डाक्टर और मरीज का अनुपात अपेक्षा के अनुरूप नहीं हैं। यानी 1674 मरीज पर एक डाक्टर। भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 22 प्रतिशत और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 32 प्रतिशत डॉक्टरों की कमी है। यह उस समय और महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां चिकित्सा व्यय राज्य के बजाए व्यक्ति द्वारा ज्यादा वहन किया जाता है। ऐसे में एक गरीब मरीज के लिए मुश्किल ज्यादा होगी। उसकी जेब में इतना दम नहीं होगा कि वह निजी अस्पतालों में जा सके, जबकि सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ ज्यादा है। वहां अगर पहुंच है, तो आसानी से बेहतर इलाज मिल सकता है, वरना धक्का खाते रहने के लिए अभिशप्त होंगे। इन्हीं परिस्थितियों में दिल्ली का मोहल्ला क्लीनिक अपनी प्रासंगिकता साबित करता है। वह न केवल दिल्ली, बल्कि देश के अन्य राज्यों के सामने एक उदाहरण पेश कर रहा है।

दिल्ली ने पेश किया उदाहरण

इन्हीं परिस्थितियों में दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक की जरूरत महसूस की गई, जहां एक ही जगह पर मरीजों के लिए सारी सुविधाओं की व्यवस्था है-जांच-पड़ताल से लेकर दवा तक। दिल्ली सरकार के मुताबिक एक मोहल्ला क्लीनिक की स्थापना में डिस्पेंसरी की तुलना में कम लागत आती है। डिस्पेंसरी के लिए पांच करोड़ खर्च होता है, तो मोहल्ला क्लीनिक मात्र 20 लाख रुपए में तैयार होते रहे। ज्यादातर मोहल्ला क्लीनिक किराए के मकान में चलाए जा रहे हैं। इस प्रकार काफी बचत होती है। डाक्टरों को अनुबंध पर रखा गया है, जिन्हें प्रति मरीज 30 रुपए दिए जा रहे हैं। हर रोज एक क्लीनिक में 80-100 मरीजों का इलाज होता है और उन्हें 20-30 मिनट से ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता। इन क्लीनिकों में 200 जांच और प्रारंभिक परीक्षण कराने की क्षमता है। डाक्टर कनव कहोल द्वारा विकसित चिकित्सा उपकरण 'स्वास्थ्य स्लेट     के कारण जांच की प्रक्रिया काफी आसान हो गई है। मेडिसिन एटीएम में लगे सेंसर नुस्खे को परखने और दवा वितरण को पारदर्शी और कार्य-कुशल बनाते हैं। दवा तो मुफ्त में ही मिलती है, मरीज की समस्या का ब्यौरा भी बायोमेटिक पहचान के साथ इंटरनेट पर डालने की व्यवस्था है। चिकित्सा क्षेत्र में यह काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे कहीं भी देखा जा सकता है। इस प्रकार मोहल्ला क्लीनिक में तकनीक का उपयोग खर्च कम करने और उसे व्यवस्थित करने के लिए वरदान की तरह है।

मिलने लगी प्रशंसा

मोहल्ला क्लीनिक को अभी से अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा मिलने लगी है। मेडिकल जर्नल 'लांसेट     में इस पर की गई टिप्पणी से यही प्रतीत होता है। हाल ही में दिल्ली यात्रा पर आए लंदन के शाथम हाउस के सीनियर फेलो राबर्ट येट्स के मुताबिक मोहल्ला क्लीनिक सरकार द्वारा वित पोषित प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच स्वास्थ्य ढांचे को बेहतर बनाने के लिहाज से अच्छा है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के अनुसार भारत में अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य ढांचे को इससे निपटने लायक बनाना होगा। साधारण आदमी के लिए और समस्या हो सकती है, क्योंकि उसका स्वास्थ्य बजट और बढ़ जाएगा। ऐसे में मोहल्ला क्लीनिक की प्रासंगिकता बढ़ जाएगी, क्योंकि यह सस्ता भी है और आपके दरवाजे पर भी उपलब्ध है।



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