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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

सबसे सुंदर परिवार

बाल कुटीर सिर्फ अनाथ बच्चों का आसरा ही नहीं है। यह एक ऐसा घर है, जिसमें रहने वाले बच्चों की एक ही पहचान है और वह पहचान है उनकी मां यानी अंजना राज गोपाल

 

नोएडा के एक घर 'बाल कुटीर’ के पूजा घर में आरती चल रही थी और मैं 60 बच्चों के साथ उस आरती में शामिल हुई। बच्चों की आंखें आरती की लौ से दमक रही थीं। यह नोएडा का सबसे बड़ा परिवार है। इस परिवार में कुल  60 सदस्य हैं और यह घर है उन बच्चों का जो अनाथ हैं, जिनकी किसी को जरूरत नहीं। इस परिवार की मुखिया हैं इन सब की मां अंजना राज गोपाल।

 

पहला बच्चा रजत

अंजना एक पत्रकार थीं। करीब 26 साल पहले अंजना शाम को अपने दफ्तर से लौट रहीं थीं। तभी आईटोओ के पास उन्होंने फलवाले को एक बच्चे को पीटते देखा। गंभीर स्वभाव की अंजना ने बच्चे को बचाया और पूछा कि किसका बच्चा है। उन्हें पता चला कि ये बच्चा अनाथ है। अंजना उसे अपने साथ घर ले आईं और नया नाम दिया रजत अंजना राजगोपाल। अब अंजना एक बेटे की मां थीं। रजत के घर में आने के साथ ही बाल कुटीर की नींव पड़ी। रजत आज 29 साल का हो गया है। वह बोल और सुन नहीं सकता, लेकिन जब मैं उससे मिली तो उसके चेहरे पर एक फख्र का भाव था। वो समझाने की कोशिश कर रहा था कि ये मेरा घर है। ये मेरी मां है और मैं सबका बड़ा भाई हूं। रजत एक एनजीओ में टीम लीडर के तौर पर काम करता है।

 

परिवार बढ़ता गया

अंजना ने अपने जीवन को इन्ही बच्चों के नाम समर्पित कर दिया। धीरे-धीरे बीतते समय के साथ इनका परिवार भी बड़ा होता गया। कई और बच्चे यहां रहने लगे। कुछ सड़कों पर भीख मांगते थे। कुछ झुग्गियों में रहते थे तो कुछ को पुलिस ने अंजना की परवरिश में भेजा। फिर एक दिन एक नन्हीं-सी परी ने अंजना के घर में दस्तक दी। इस परी का नाम था मीरा। एक लड़की को पालना आसान नहीं होता। लड़की के आने के साथ ही कई तरह की जिम्मेदारियां जुड़ जाती हैं। अंजना ने मीरा को खुले मन से अपनाया। आज मीरा का अपना परिवार है वो सेक्टर 40 नोएडा में अपने बच्चों और पति के साथ रहती है। वो कहती हैं कि आज मेरे दो बच्चे हैं, एक लड़का और एक लड़की। जब इन दोनों को संभालने में ही परेशान हो जाती हूं तो न जाने मम्मी कैसे इतने सारे बच्चों को संभलती होंगी। मेरा खुशहाल जीवन उनकी वजह से है। मीरा नोएडा में अपने पति के साथ मिलकर किराने की दुकान चलाती है। मीरा के अलावा छह और लड़कियों की भी अभी तक शादी हो चुकी है। आज इस परिवार में कुल 60 बच्चे हैं जिन में से 40 लड़कियां और 20 लड़के हैं। अनिष्का सबसे छोटी है और उसकी उम्र सिर्फ 5 साल है।

   

रास्ते और मुश्किलें

एक छोटे-से परिवार को चलाने में कितनी परेशानियां आती हैं किंतु अंजना का परिवार काफी बड़ा था और वो अकेली। मुश्किलें तो हर किसी के रास्ते आती हैं। अंजना को भी इस परिवार को चलाने में काफी संघर्ष करना पड़ा। वे कहती हैं कि मेरा परिवार बढ़ रहा था और कमाने वाली सिर्फ मैं अकेली थी, कई बार खाते में सिर्फ 500 रुपए होते थे फिर भी सब ठीक से ही चलता रहा। जब भी जरूरत पड़ी किसी न किसी ने मदद कर दी। अंजना ने मुश्किल से मुश्किल समय में भी किसी के आगे झोली नहीं फैलाई। उन्हीं की मदद ली जिन्होंने अपनी मर्जी से मदद करनी चाही। अंजना गर्व से कहती हैं, 'अब तो मेरे बच्चे भी कमाने लगे हैं। वे मेरी पूरी मदद करते हैं।’

 

शिक्षा एक बड़ी जरूरत

खाना-कपड़े और घर के बाद जो सबसे जरूरी होता है वो है शिक्षा। अब अंजना के सामने चुनौती थी अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था कराने की।

वे जानती थीं कि अनाथ बच्चों का स्कूल में दाखिला कराना आसान नहीं होगा। तो इन बच्चों के लिए उन्होंने एक स्कूल खोल लिया। इसका नाम रखा गया 'सांई शिक्षा संस्थान’। इस स्कूल की शुरुआत 80 बच्चों से हुई थी और आज इस स्कूल में करीब 400 बच्चे हैं।

 

शिक्षा सफलता की कुंजी है

जब राजेंद्र बाल कुटीर आया था तो उसकी उम्र केवल 6 साल थी। उसने साईं शिक्षा संस्थान से दसवीं करने के बाद राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान से बारहवीं की परीक्षा पास की। इसके बाद होटल मैनेजमेंट किया और आज गुरुग्राम के एक रेस्तरां में काम कर रहा है। पूजा भी राजेंद्र की तरह ही बाल कुटीर में आई थी। आज वो पढ़-लिखकर होमियोपैथी की डॉक्टर बन गई है। 

इनको भुला नहीं सकते

राम प्रकाश पिछले 20 साल से बाल कुटीर से जुड़े हैं। वो कहते हैं कि जिन बच्चों को अपनी गोद में खिलाया है वे अब बड़े हो गए हैं। जब वे मुझे भइया बुलाते हैं तो मुझे बहुत खुशी होती है। यहां आने से पहले राम प्रकाश ऑटो चलाते थे। एक दिन अंजना ने एक हफ्ते के लिए इसका ऑटो बुक किया तब से वो अंजना के साथ जुड़ गए। वो कहते हैं कि वो हफ्ता पिछले 20 साल में खत्म ही नहीं हो सका। अब तो मेरे जीवन के साथ ही खत्म होगा। राम प्रकाश अब बच्चों के लिए खाना बनाते हैं। सेवा लाल भी पिछले 20 साल से यहीं रहते हैं और बच्चों के कपड़े धोते हैं। इसके अलावा वो घर से सामान लाने जैसे छोटे-मोटे काम भी करते हैं। सेवा लाल कहते हैं कि अब यही मेरा घर है कहीं और तो मेरा मन ही नहीं लगता।

 

कुछ कदम और भी

अंजना 'बाल संसार’ के नाम से व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी चलाती हैं। ये पाठ्यक्रम उन बच्चों के लिए है जिन्होंने कभी कलम पकड़ी ही नहीं या फिर कभी स्कूल भी नहीं गए। बाल संसार में दाखिले के लिए बच्चों में सिर्फ सीखने की ललक चाहिए होती है। किसी भी उम्र के बच्चे यहां आते हैं पढ़ाई लिखाई सीखते हैं और अपने उम्र के दूसरे बच्चों के बराबर सीखकर मुख्यधारा से जुड़ जाते हैं। इसके अलावा मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों के लिए काम करती है 'वात्सल्य वाटिका’। यहां बच्चों को पेंटिंग, ड्रॉइंग, गायन और नृत्य की शिक्षा दी जाती है ताकी वे कुछ काम करके अपनी जीविका खुद कमा सकें। साईं वोकेशनल ट्रेनिंग में वो बच्चे काम सीखने आते हैं जो बारहवीं के बाद किसी प्रोफेशनल कोर्स के लिए आगे नहीं जा सकते। वे यहां से टेलर्रिंग, अंग्रेज़ी बोलना, कंप्यूटर कोर्सेज और ब्यूटीशियन जैसे काम सीखते हैं और आगे अपना कैरियर बनाते हैं। अंजना के मन में भविष्य के लिए बहुत सी योजनाएं हैं। अंजना वह सब करना चाहती हैं जिससे बेसहारा बच्चों की जिंदगी में कुछ सुधार आ जाए।



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