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शनिवार, 26 मई 2018

जनता का अपना खाता

शून्य बैलेंस के साथ खोले गए जन-धन खातों का असली अर्थ लोगों को विमुद्रीकरण के बाद समझ में आया। कभी उपयोग में नहीं लाए गए लाखों खाते आज मालामाल हैं

आठ नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपए के नोटों के प्रचलन पर रोक लगा दी, तो बिहार के बक्सर जिले की मनिया देवी के हाथ-पांव फू ल गए। उन्होंने अपने परिवार वालों से कुछ रुपए छिपाकर बचाए थे। उन्हें न केवल अपनी बचत का पता घरवालों को चलने की चिंता थी, बल्कि उसे उन पैसों के भी हाथ से निकल जाने का खतरा महसूस होने लगा। लेकिन सरली देवी शांत थीं। उस पर नोटबंदी का असर नहीं था। कारण यह था कि उसने जन-धन खाता खुलवा रखा था। उसके पास पांच-पांच सौ के दो नोट थे। वह उसे आसानी से अपने खाते में जमा कर सकती थीं और किसी को पता भी नहीं चलता कि उसके पास कितने पैसे थे। यह जन-धन खाते का ही कमाल था। इसी के साथ जन-धन का मजाक उड़ाने वालों के मुंह पर ताला जड़ गया।

जब जन-धन खाता खुला था, तब किसी को अहसास नहीं था कि भविष्य में उसकी और कितनी अहमियत हो सकती है। अब भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि इसकी भविष्य में क्या उपयोगिता होगी। लेकिन पहली नजर में अब यह साफ  झलकने लगा है कि यह आम आदमी के सशक्तिकरण से लेकर भ्रष्टाचार निवारण में मोदी सरकार का बड़ा हथियार बनने जा रहा है। जब जनवरी 2014 में मनमोहन सरकार ने नोटबंदी का प्रस्ताव किया था, तब वह इस दिशा में आगे नहीं बढ़ पाई थी। इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन आम आदमी के बैंक खाता न होना एक कारण जरूर था। केंद्र की सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी ने सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक पहुंचाने की मंशा के तहत 2014 में जन-धन खातों की योजना तैयार की। सरकार की योजना है कि जन धन खातों में सीधे तौर पर सब्सिडी आदि का पैसा जाए, चाहे वो एलपीजी सब्सिडी का पैसा हो या फि र मनरेगा के भुगतान का। इससे निजी बचत को प्रोत्साहन तो मिल ही रहा है, बदलती आर्थिक परिस्थितियों में इसका विभिन्न प्रकार से उपयोग हो सकता है। क्योंकि भारत का राष्ट्रीय बचत करीब 28 प्रतिशत है जबकि भारत के मुकाबले चीन का राष्ट्रीय बचत दोगुना यानी करीब 48 प्रतिशत है। जनधन योजना का यह एक अहम और सबसे जरुरी पहलू है कि इसके सहारे राष्ट्रीय बचत में इजाफा हो। क्योंकि जैसे-जैसे राष्ट्रीय बचत का ग्राफ  बढ़ेगा देश का विकास भी उसी हिसाब से गतिशील होगा। जन-धन खाते बहुत हद तक सरकार की कैशलेस स्कीम को आगे बढ़ाने में सहायक हो रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह गरीब मजदूरों को शोषण से बचाने का एक हथियार बन सकता है। यह जन-धन खाते का ही कमाल था कि नोटबंदी के बाद गरीबों के पीछे काली कमाई करने वाले चिरौरी कर रहे थे। सरकार अब इस प्रयास में है कि मजदूरी का पैसा मजदूरों के खाते में डाला जाए।

जनधन योजना के तहत अब तक 25 करोड़ से ज्यादा खाते खुल चुके हैं। ज्यादातर खाते सरकारी बैंकों में खुले, तो कुछ निजी क्षेत्र के बैंकों में। हालांकि बिना धन राशि जमा किए खाता खोला जा सकता था, लेकिन बैंकिंग प्रणाली से दूर रहने वाली जनता ने इसके प्रति भारी उत्साह दिखाया और इसके हजारों करोड़ रुपए खुद ही जमा करा दिए। सरकारी आंकड़ो के मुताबिक आठ नवंबर को इसमें 45,000 करोड़ रुपए से ज्यादा जमा थे। ज्यादातर खातों में कुछ न कुछ पैसे थे। नोटबंदी के बाद दस दिनों के अंदर इसमें करीब 29,000 करोड़ रुपए जमा हुए। मतलब कि जन के धन की सुरक्षा के लिए खुले खातों में अब धन ही धन है। सरकार ने बैंक खाते खोलने का जितना लक्ष्य रखा, उससे कहीं ज्यादा खाते खुल चुके हैं। नोटबंदी के बाद जनधन खातों के खुलने का सिलसिला और तेज हुआ है उम्मीद है कि 2017 में जनधन खातों की संख्या में इजाफा होगा। बैंकों की यह शिकायत थी कि इन खातों में धन की कमी है और उनमें लेन-देन नहीं होता। लेकिन नोटबंदी के बाद बदले हालात में बैंकों की यह शिकायत दूर होने के आसार बढ गए हैं। तब बैंकों के लिए भी यह बोझ नहीं रहेगा। धन रहित खातों की संख्या में जितनी कमी आएगी, जन-धन योजना उतनी ही सफलता की ओर बढ़ेगी। जन-धन योजना की इन्हीं विशेषताओं की वजह से विश्व बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसकी सराहना कर चुकी हैं।



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